Monday, 13 June 2016

गांधी कथा ---साउथ अफ्रीका में हिन्दुस्तानियों की मुसीबत  (२)-----नेटाल की तरह साउथ अफ्रीका के दूसरे उपनिबेशों में भी हिन्दुस्तानियों के प्रति गोरों की नापसंदगी बढ़ने लगी थी !ट्रांसवाल में हिन्दुस्तानी व्यापारियों का कारोबार बहुत अच्छी तरह चल रहा था !इस कारण गोरे व्यापारियों को उनसे ईर्ष्या होने लगी !समाचार पत्रों में हिन्दुस्तानियों के खिलाफ लेख ,पत्र अदि लिखे जाने लगे !और धारा सभा में यह मांग के गयी कि हिन्दुस्तानियों को ट्रांसवाल से बाहर निकाल दिया जाय और उनका व्यापर बंद कर दिया जाय 1 धारा सभा में जो अर्जियां दी गयी थी उनमें हिन्दुस्तानियों पर मनगढंत झूठे आरोप लगाए जाते थे !उनमें लिखा जाता था----- हिन्दुस्तानी व्यापारी मानवीय सभ्यता को नहीं जानते हैं ! बे बदचलनी से होने वाले रोगों से सड़ रहे हैं ! हर औरत को बे अपना शिकार समझते हैं !उनका विश्वास है की औरतों में आत्मा होती ही नहीं है !गोरों के अखबारों के प्रचार और अर्जियों द्वारा किये जाने वाले आंदोलनों का असर धारा सभा पर पड़ा और धारा सभा में एक बिल पेश हुआ ! और १८८५ में एक बहुत कड़ा कानून पास हुआ ! इस कानून के अनुसार जो हिन्दुस्तानी ट्रांसवाल में व्यापार करने के लिए आकर बसे उसके लिए २५ पोंड देकर अपना नाम दर्ज कराना आवश्यक था !हिन्दुस्तानी ट्रांसवाल में जमीन नहीं खरीद सकता था !और वह मतदाता भी नहीं बन सकता था ! ब्रिटिश सरकार ने १८८६ में इसमें आंशिक सुधार कर २५ पोंड प्रवेश कर को समाप्तकर ३ पोंड कर दिया ,और जमीन बिलकुल न खरीद सकने की जो कड़ी शर्त थी उसे रद्द करके यह शर्त रखी गयी कि हिन्दुस्तानी लोग ऐसे ही लोकेशन या बाढ़े में जमीन खरीद सकते हैं जिसको ट्रांसवाल सरकार उनके लिए पहले से निर्धारित कर दे !किन्तु ऐसे बाड़ों  में भी पूर्ण स्वमित्तव की जमीनें खरीदने के अधिकार सरकार ने हिन्दुस्तानियों को नहीं दिए !ये बाढ़े शहर से बहुत दूर और गन्दी जगहों में सरकार द्वारा निर्धारित किये गए थे जहाँ पानी ,रोशनी और पाखानों की सुविधा नहीं थी !ट्रांसवाल के गोरे हिन्दुस्तानियों को अछूत मानते थे और हिन्दुस्तानियों के स्पर्श  से या उनके पड़ोस में रहने से अपवित्र हो जाएंगे इसीलिए बे हिन्दुस्तानियों को न तो छूते थे ! और ना  ही उनको पड़ोस में बसने देते थे

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