१---- जो आत्मकल्याण में संलग्न रहता है !वही धीर कहलाता है !जो दुःख में खिन्न नहीं हो उठता है ! और सुख में मतवाला नहीं हो उठता है और सबके साथ समान व्योहार करता है उसी को धीर कहा गया है !
२----आसक्ति से ही भय होता है ! हर्ष ,शोक ,तथा क्लेश की प्राप्ति भी आसक्ति से ही होती है आसक्ति से ही विषय भोगों में अनुराग और प्रेम होता है इन सबसे मनुष्य को महान अनर्थ की प्राप्ति होती है!
३---जैसे ब्रक्छ के खोखले में लगी हुई आग सम्पूर्ण ब्रक्छ को जड़ मूल सहित जलाकर भस्म कर देती है ! उसी प्रकार विषय भोगों के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ तथा मानसिक शांति का नाश कर देती है !
२----आसक्ति से ही भय होता है ! हर्ष ,शोक ,तथा क्लेश की प्राप्ति भी आसक्ति से ही होती है आसक्ति से ही विषय भोगों में अनुराग और प्रेम होता है इन सबसे मनुष्य को महान अनर्थ की प्राप्ति होती है!
३---जैसे ब्रक्छ के खोखले में लगी हुई आग सम्पूर्ण ब्रक्छ को जड़ मूल सहित जलाकर भस्म कर देती है ! उसी प्रकार विषय भोगों के प्रति थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ तथा मानसिक शांति का नाश कर देती है !
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