Tuesday, 28 June 2016

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भीष्म पितामह ने युधिस्ठर के प्रश्नो के उत्तर में महिलाओं के आदर सत्कार और गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए मोक्ष की प्राप्ति में महिलाओं के योग दान के सम्बन्ध में भी विस्तार से कई आख्यानों में बताया है !युधिस्ठर ने पूंछा कोई ऐसी पुरुष हो जो गृहस्थ आश्रम में पत्नी सहित संयम नियम के साथ रहता हो और समस्त सांसारिक बंधनो को जीत चूका हो और संपूर्ण द्वन्दोसे दूर रह कर उन्हें धैर्य पूर्वक सहन करता हो ! तो उसका मुझे परिचय दीजिये !क्योँकि ऐसा गृहस्थ दुर्लभ होता है ! भीष्म ने कहा की महर्षि देवल की सुवर्चला नाम की एक पुत्री थी जो प्रकांड विद्वान थी ! जब वह विवाह योग्य हो गयी तब उसके पिता को उसके विवाह की चिंता हुई ! सुवर्चला ने अपने पिता से कहा कि मेँ उसी युवक से विवाह करुँगी जो मेरे प्रश्नो का उत्तर देगा और मेरे अनरूप होगा ! इसीलिए आप ऋषि पुत्रों को आमंत्रित कीजिये में अपने लिए बर का चयन स्वयं करुँगी ! देवल ने ऋषि पुत्रों को आमंत्रित किया सुबर्चला ने उनसे कहा की मेरा पति वही हो सकता है जो अँधा भी हो और आँखवाला भी हो यह प्रश्न सुनकर सभी ऋषि कुमार सुबरचला को भला बुरा कहते हुए चले गए ! इसके बाद श्वेत केतु नाम के एक ऋषि पुत्र ने सुबरचला के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि में अँधा हूँ यह यथार्थ है ! जिस परमात्मा की शक्ति से जीवात्मा सदा यह सबकुछ देखता है ! ग्रहण करता है ! स्पर्श करता है ! सूँघता है बोलता है !निरंतर बिभिन्न वस्तुओं का स्वाद ग्रहण करता है ! तत्त्व का मनन करता है और बुद्धि द्वारा निश्चय करता है ! वह परमात्मा ही आँख कहलाता है !जो इस आँख से रहित है वह प्राणियों में अँधा कहलाता है ! अर्थात वह आँखवाला भी होकर अज्ञान के कारण कुछ नहीं देखता है ! जिस परमात्मा के भीतर ही यह संपूर्ण जगत व्योहार में प्रवृत्त होता है ! यह जगत जिस आँख से देखता है, कान से सुनता है, त्वचा से स्पर्श करता है, नासिका से सूँघता है, रसना से रस लेता है एवम जिस भौतिक आँख से यह देख कर सब वर्ताव करता है ! उस से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है इसीलिए में अंध हूँ ! कार्य कारण रूप परमात्मा का चिंतन करता हुआ में सदा शांत भाव से उन्ही पर निर्भर रहता हूँ !सुबरचला ने अपने प्रश्न का यथार्थ उत्तर सुनकर स्वेत केतु का वरण किया और अध्यात्म दृष्टि से गृहस्थ जीवन जीते हुए अंत में मोक्ष की प्राप्ति की ! !इसीलिए प्राचीन भारत में महिलायें पुरष की कृपा और दया से नहीं अपने गुणों ,विद्वात्ता और शील से आदर और प्रतिष्ठा की पात्र थी !ऐसी अनेक महिलाओं की श्रेष्ठता के आख्यान महाभारत ग्रन्थ में हैं !

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