सूर्य की उपासना अग्नि की उपासना और चन्द्रमा की उपासना अनादिकाल से भारत
भमि में की जाती रही है!एक समय था जब संपूर्ण विश्व का एक ही धर्म सनातन
धर्म था !सनातन धर्म की बुनियाद सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य अपरिग्रह और अस्तेय
है !इन्ही ५ धर्म के आधारों पर ही प्राणिमात्र की रक्षा सुरक्षा और सभी
प्रकार की लौकिक और पारलौकिक व्यबस्थाएं की जाती रही हैं !और इन्ही के
क्रियान्वन के लिए विश्व में भिन्न भिन्न धर्म जन्म लेते रहे हैं !श्रष्टि
का निर्माण करने वाली ईश्वरीय शक्ति की या
ईश्वर की उपासना भिन्न भिन्न धर्म बाले अनेक प्रकार से करते हैं !जो लोग
ईश्वर को नहीं मानते है बे सिर्फ प्रकृति को ही श्रष्टि का कर्ता धर्ता
मानते हैं !कुछ धर्म ईश्वर को निराकार कुछ साकार और निर्गुण निराकार और कुछ
सगुण साकार मानते हैं !वैदिक धर्म जिसका मूल सनातन धर्म है !ईश्वर की
उपासना सभी रूपों में करता है !उसमे प्रकृति की उपासना भी ईश्वर की एक
शक्ति के रूप में होती है !इसीलिए सूर्य आदि की उपासना परमात्मा के प्रकाश
को प्रकाशित यंत्र के रूप में की जाती है !आँखों से दिखने वाले गोल चक्र की
नहीं !भगवान श्री कृष्ण ने गीता १५(१२)कहा है सूर्य में प्रकाशित जो तेज
सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है और जो तेज चद्रमा में है ! तथा जो तेज
अग्नि में है !उस तेज को तू ईश्वर का ही जान !मनुष्य प्रभाव और महत्त्व से
प्रभावित हो जाता है ! अतः मनुष्य पर प्राकृत पदार्थों के प्रभाव और
महत्त्व को हटाने के लिए ही यह रहस्य प्रगट किया गया है ! कि सूर्य की
उपासना नमस्कार बंदगी आदि सूर्य के प्रकृति निर्मित गोले की नहीं बल्कि
उसके अंदर प्रकाशित परमात्मा के तेज की है !सूर्य की उपासना के लिए अनेक
मंत्र और विधियां हैं !पांडव जब साधन हीन अवस्था में बनबास में थे तब सूर्य
की उपासना से ही उनको ऐसी बटलोई प्राप्त हुई थी ! जिसमे बने भोजन के
पदार्थ हजारों आदमियों के भोजन करने के बाद भी समाप्त नहीं होते थे !सूर्य
उपासना का श्रेष्ठ मन्त्र गायत्री मन्त्र है जिसकी विधि सहित उपासना भगवान
राम कृष्णा आदि भी करते थे !ऋषि विश्वामित्र वशिष्ठ आदि भी गायत्री मन्त्र
की उपासना से ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे !आधुनिक काल में भी महर्षि
दयानंद आचार्य श्रीराम शर्मा आदि ने गायत्री उपासना से ही परम सिद्धि
प्राप्त की और जनसामान्य में इस साधना को पहुचाने का भी प्रयत्न किया
!गांधीजी विनोबा मालवीय टैगोर अरविंदो आदि और लाखों मनुष्यों ने गायत्री
साधना से सुख संपत्ति वैभव विद्द्या बुद्धि ज्ञान आदि कीप्राप्ति की और
संसार में अनेक लोकहित के कार्य किये ! और आज भी संसार में सूर्य की तरह
प्रकाशित हो रहे हैं !वैदिक धर्म परमात्मा की शक्ति को सीमित नहीं करता है !
बल्कि सभी प्राकृतिक पदार्थों में एक परमात्मा की शक्ति का ही दर्शन कर
पेड़ों पौधों समस्त जीव धरियोँ में नित्य परमात्मा के प्रकाश का अनुभव करता
है !इसीलिए ईश्वर की उपासना पूजा अर्चा के रूप में ईश्वर की असीम विलक्छण
शक्ति का अवाधित दर्शन वैदिक धर्म में ही होता है !धार्मिक उदारता जैसी
वैदिक धर्म में है वैसी उदारता का दर्शन अन्य धर्मो की उपासना पद्धति में
दिखाई नहीं देता है !
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