Thursday, 30 June 2016

लोकतंत्र का धर्म ------- भारत में सनातन ,जैन ,बौद्ध ,सिख धर्मों का जन्म हुआ है !सनातन ,धर्म तथा जैन धर्म ये सर्वाधिक प्राचीन अनादि धर्म है !इस्लाम और ईसाई धर्म ये विदेशी धर्म है !किन्तु अब सभी धर्म स्वदेशी हैं !इसीलिए स्वतंत्र भारत में धार्मिक स्वतंत्रता तो भरपूर है !किन्तु उसको राजनीति से अलग रख गया है !शाशन ,प्रशासन को लिंग ,जाति और धर्म से मुक्त रखा गया है !किन्तु देश की आवश्यकता  के अनुसार दलितों ,पिछड़ों ,और अल्पसंख्यकों ,महिलाओं ,विकलांगों ,स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों आदि को शासन ,प्रशासन ,शिकछन ,संस्थाओं ,संसद ,विधान सभाओं से लेकर ग्राम पंचायतों आदि में आरक्छण प्रदान कर लिंग ,धर्म ,जाति ,आदि के फर्क को स्वीकार किया गया है !आरक्छण की मांग अब सभी जातियां कर रही हैं ! सभी धर्म भारत में धार्मिक आयोजन बहुत भव्यतसे करते हैं !और अवकाश की मांग करते हैं !सार्वजानिक अवकाशों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है !देश में एक और भयानक गरीवी और बेरोजगारी है और दूसरी ओर लाल फीता साही ,कर्त्तव्य ना करने की आदत ,रिश्वत खोरी आदि है !शासन करने की भूख और कर्तव्य भ्रष्ट संविधान की धज्जिया उड़ाने वाले बरसाती कीड़ों की तरह उत्पन्न राजनेताओं के द्वारा आम जन को शासित  होने की मजबूरी भी है !इस सबके कारण लोकतंत्र का धर्म ऐसा दुबक गया है ,कि उसके दर्शन ही नहीं होते हैं ! वास्तबिक  ओर सही रूप में क्रियांबित लोकतंत्र में शाशक और शासित  का भेद समाप्त हो जाता है !भारत में लोकतंत्र के रूप में राजतन्त्र और परिवार तंत्र स्थापित हो गया है !यह लोकतंत्र नाशक रोग देश की सभी राजनैतिक और सामजिक संस्थाओं में प्रवेश कर गया है ! इस कारण देश में सत्ता में बैठे राजनेताओं का गुण गान भगवान् की तरह होने लगा है !इन राजनेताओं के चाटुकार समर्थक सत्ता की रोटी के टुकड़े के लिए अपनी जीभ लप लपाते  हुए मनुष्य होने की अस्मिता का भी त्याग कर देते हैं !जब राजनीति में अनैतिकता ,अन्याय ,भ्रष्टाचार ,लोकतान्त्रिक स्वरुप का नाश हो जाता है !तब देश की सभी व्यबस्था नष्ट भ्रष्ट हो जाती है !यह देश में स्पष्ट दिखाई दे रहा है !सभी छेत्रों में निकृष्ट स्वार्थों का पालन ,पोषण करने में लोग लगे हुएहैं !लोकतंत्र का धर्म संविधान में सन्निहित कानूनों और नियमों के परि पालन से सिद्ध होता है !संविधान को देश की जरूरतों के अनुसार संशोधित किया जा सकता है !किन्तु नागरिकों के मूल अधिकारों और कर्तव्यों को जो कि संविधान की आत्मा होते हैं ,को नष्ट नहीं किया जा सकता है !संविधान में  सामयिक परिस्थिति को द्रष्टगति रख जो आरक्छण आदि के प्रावधान अल्प समय के लिए किये गए थे !उनके समय में अनावश्यक ,अवांछनीय समय विस्तार ने देश में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न  कर  दी है !आरक्छण अब नेताओं और अधिकारीयों की मौज का साधन और देश की ऊर्जा और आत्मविश्वास ,योगयता आदि का नाशक हो गया है !यदि आरक्छण को अनादि काल के लिए लागू कर दिया जाय !तो भी सभी आरक्छण प्राप्त    जातियों के सभी लोग  राष्ट्रपति  प्रधान मंत्री, मंत्री ,सांसद ,विधायक ,कलेक्टर आदि नहीं बन सकते हैं !लोगों को अपनी जीविका की तलाश अपने कामों में ही करनी होगी !यदि देश को सही रूप में लोकतंत्र को स्थापित करना है ! तो देशवासियों को अपने आपको शासन करने की भूख से मुक्त करना होगा !और आमजन को भी लोकतंत्र में आमजन से विशिस्ट जन बने इन लोकतंत्र की आत्मा को नष्ट करने वाले लोगों से मुक्ति पाने का प्रयत्न करना होगा !अन्यथा रोम जलता रहेगा और नीरो चैन की बंशी बजाता रहेगा !

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