किसी दूसरे की वस्तु की लेने की इक्छा ना करना ,सदा गम्भीरता और धीरता रखना ,भय को त्याग देना ,तथा मनो रोगों को शांत कर देना यह मन और इंद्रियों के संयम (दम )का लक्छण है ! इसकी प्राप्ति ज्ञान से होती है !देहाभिमानियों और अहंकार ग्रस्त चित्त वालों को इसकी प्राप्ति होना कठिन है !
२---दान और धर्म करते समय मन और वाणी पर संयम रखना ,अर्थात इस विषय में दूसरों से ईर्ष्या ना करना इसे विद्वान लोग मत्सरता का अभाव कहते हैं ! सदा सत्य का सेवन करने और निष्काम भाव से लोकहित के कार्य करने से ही मनुष्य मत्सरता (ईर्ष्या )से रहित हो सकता है !
२---दान और धर्म करते समय मन और वाणी पर संयम रखना ,अर्थात इस विषय में दूसरों से ईर्ष्या ना करना इसे विद्वान लोग मत्सरता का अभाव कहते हैं ! सदा सत्य का सेवन करने और निष्काम भाव से लोकहित के कार्य करने से ही मनुष्य मत्सरता (ईर्ष्या )से रहित हो सकता है !
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