Tuesday, 28 June 2016

झा की.
अभ्युथानम्धर्मस्य -----धर्म का पतन होता है ! तब अधर्म का जन्म और उसका विकास होता है !अधर्म से ही मनुष्यों में मोह ,मूढता और मूर्खता विकसित होती है ! मोह से ग्रस्त व्यक्ति का विवेक लुप्त हो जाता है ! और वह अधर्म को ही धर्म मानने लगता है !उसे व्योहार और परमार्थ में सबकुछ उल्टा ही समझ में आने लगता है ! जैसे गाय और अन्य पशुओं की निर्मम हत्या में उसे माश का उत्पादन दिखाई देता है ! गाय के बध को कानून के माध्यम से रोकने को वह मनुष्य के खाने पीने के अधिकार पर हमला मानता है ! बहुत से गाय को माता मानने वाले और गाय के बध का बिरोध करने वाले तथा कथित गो भक्त गो माता की जय का नारा बुलंद करने वाले गोशालाएं चलाते है ! और गायों के चारा और पालन पोषण के लिए प्राप्त होने वाले पैसे को खुद खा लेते हैं ! !गोचर भूमि पर कब्ज़ा कर लेते हैं !और गायों को कसाईओं के लिए खुला छोड़ देते हैं !मोह ग्रस्त लोग समाज और देश की तमाम संस्थाओं शिक्छा ,स्वास्थ्य, जनकल्याण, मीडिया, राजनैतिक संस्थाओं, धार्मिक आश्रमों ,आदि में प्रवेश कर उनके चरित्र निर्माण और लोकहित के कार्यों को नष्ट कर उनको अपने छुद्र स्वार्थों की पूर्ति का साधन बनाकर देश और समाज का अहित करते हैं !इसी मोह से मूढता का जन्म और विकास होता है ! मूढ़ ब्यक्ति की बुद्धि यह समझने में असमर्थ और अयोग्य हो जाती है कि धर्म का पालन श्रेष्ठ आचरण से होता है और उसके लिए कर्त्तव्य निष्ठां आवश्यक होती है ! वह अपने कर्तव्य का पालन तो करता नहीं है !किन्तु धार्मिक पूजा पाठ प्रवचन धार्मिक आयोजन आदि अवश्य करता कराता रहता है !प्रवचन कराने वाले लोग सड़क और पुल बनाने आदि के कार्यों में अत्यंत घटिया सामग्री के इस्तेमाल कर लोग आम जन जीवन को खतरे में डाल देंगे देते हैं !नेता लोग अपने पद से सम्बंधित उत्तयदायित्वा का निर्बाह नहीं करते हैं !अधिकारी कर्मचारी आदि निर्लज्ज हो कर रिश्बत खोरी करते हैं !व्योपारी नकली घटिया माल बेचते हैं !प्रवचन करने वाले प्रवचनों को अपनी भोग सामग्री और आय का साधन बना लेते हैं लोग धार्मिक आश्रमों और संस्थाओं का निर्माण कर अपने आप को गुरु महात्मा ऋषि और अवतार के रूप में स्थापित करते हैं और ईश्वर को लुप्त कर देते हैं और खुद ही ईश्वर के रूप में अपनी पूजा कराने लगते हैं !यही मूढता है !और इसी मूढता कि परिणति मूर्खता में होती है ! जब व्यक्ति अपनी कर्त्तव्य निष्ठा को भुलाकर धार्मिक आयोजनो से ही पुण्यप्राप्ति और ऐश्वर्या की कामना करने लगता है !तब उसे कभी कभी ऐश्वर्या धन संपत्ति पद प्रतिष्ठा आदिकी पप्ति तो हो जाती है !किन्तु यह जड़ मूल से नष्ट हो जाती है ! स्थायी नहीं होती है ! इस तरह के कथानक धार्मिक ग्रंथों में भरे पड़े हैं !किन्तु मोह मूढता से ग्रस्त इन मूर्खों का ध्यान उन बिनाशकारी धर्म के नाम पर की जाने बाली अधार्मिक क्रियायों पर नहीं जाता है !और ये लोग अपनी इन अधार्मिक क्रियायों से लोगों के मन मष्तिष्क में गहरी घृणा और अविश्वास को जन्म दे देता है !और ऐसे लोग भी भी अधर्म को ही धर्म समझने लगते हैं और धर्म का तिरिष्कार करने लगते हैं ! तथा धर्म के आध्यात्मिक शुद्ध स्वरुप को ना समझ कर धर्म कि आलोचना करने लगते हैं !आज कल जो धर्म के नाम पर जो कार्यक्रम आदि होते दिखाई देते हैं उनमे अधिकाँश में धर्म नहीं हैं होता है ! धर्म परिवर्तन करना कराना ! धर्म के नाम पर क्रूर हिंसा करना लोगों के गले काटना पशु हत्या करना उनका मांश खाकर अपने शरीर को पुष्ट करना !धार्मिक कर्मकांड को ही धर्म मानना और धर्म समझनाआदि अधर्म ही है !इस से ही समाज में मोह मूढता और मूर्खता का विकास हो रहा है !यह धर्म की अधार्मिक धारा है ! जिस से धर्म के वास्तविक स्वरुप अध्यात्म का उदय नहीं हो पा रहा है !और अधर्म की प्रचंड और व्यापक काली धुंद में अध्यात्म दिखाई नहीं दे रहा है

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