गांधी कथा ----- अनुभवों की बानगी ----गांधीजी को डरबन पहुंचे ६,७ दिन हो चुके थे कि इतने में फर्म के वकील की तरफ से पत्र मिला कि मुकदद्मे की पैरवी के लिए या तो खुद सेठ अब्दुल्ला को प्रेटोरिया पहुँचाना चाहिए या किसी और को भेजना चाहिए !गांधीजी 7बें या ८ बें दिन डरबन से रबाना हुए उनके लिए ट्रैन में प्रथम श्रेणी का टिकट कटाया गया ! ट्रैन लगभग ९ बजे रात्रि को नेटाल की राजधानी मेरीतस्बर्ग पहुंची वहां पर एक आदमी गांधीजी के डिब्बे में आया उसने गांधीजी की तरफ देखा और उनके गेहुआं रंग को देख कर परेशान हुआ और बाहर निकल गया और अपने साथ दो अफसरों को लेकर आया ! एक अफसर ने गांधीजी से कहा तुम इस डिब्बे को छोड़ दो और आखिरी डब्बे में जाओ गांधीजी ने कहा मेरे पास प्रथम श्रेणी का टिकट है और मुझे डरबन से इसी डिब्बे में बैठाया गया है ! अफसर ने कहा इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है तुम्हें आखिरी डिब्बे में जाना होगा अगर तुम डिब्बा मेरे कहने से खाली नहीं करोगे तो मुझे पुलिस बुलानी पड़ेगी जो तुमको इस डिब्बे से जबरन निकाल देगी ! गांधी जी ने कहा भले ही सिपाही मुझे डिब्बे से उतारे में स्वयं नहीं उतरूंगा क्योंकि इस डिब्बे में यात्रा करना मेरा कानूनी अधिकार है ! सिपाही आया उसने गांधीजी का हाथ पकड़ा और धक्का देकर नीचे उतार दिया और उनका सामान भी उतार दिया गांधीजी ने दूसरे डिब्बे में जाने से इंकार कर दिया ! ट्रैन चलदी गांधीजी वेटिंग रूम में जाकर बैठ गए ! दक्छिन अफ्रीका में बहुत तेज सर्दी पड़ती है ! गांधीजी को ठण्ड का प्रकोप सहना पड़ा बे रात भर ठण्ड से कांपते रहे ! इस स्थिति में गांधी जी ने अपने कर्तव्य पर विचार किया ! या तो मुझे अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए या बापिस भारत लौट जाना चाहिए या फिर अपमान सहकर भी प्रिटोरिया पहुंचना चाहिए ? गांधी जी को यह बात इस घटना से स्पष्ट हो गयी कि यह रंग भेद महारोग है यदि मुझ में इस रोग को मिटाने की शक्ति हो तो मुझे उसका उपयोग इस महारोग रंग भेद और नसल भेद को मिटने के लिए करना चाहिए ! यह निश्चय करके गांधीजी ने दूसरी ट्रैन से आगे जाने का फैसला किया ! सवेरे गांधीजी ने जनरल मैनेजरको शिकायत का लम्बा तार भेजा !जनरल मेनेजर ने अपने अधिकारियों के व्योहार का बचाव किया किन्तु गांधीजी को बिना किसी रूकाबट के गंतव्य तक पहुँचाने के लिए स्टेशन मास्टर को आदेश दिया ! बहुत से भारतीय व्यपारी गांधीजी से मिलने स्टेशन पर आये उन्होंने अपने ऊपर पड़ने वाले कष्टों की कहानी गांधी जी को बतायी और उनसे कहा की जो उन पर बीती है उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है !जब हिन्दुस्तानी लोग पहले या दूसरे दर्जे के डिब्बे में यात्रा करते हैं तो अधिकारियों की और से रूकाबट खड़ी की जाती है 1 गोरे यात्री भी हिन्दुस्तानियों के साथ यात्रा करना पसंद नहीं करते है और हिन्दुस्तानियो के साथ दुर्व्योहार करते हैं !
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