Wednesday, 8 June 2016

कथा -----प्रेटोरिया में प्रथम दिन ------१८९३ का प्रेटोरिया स्टेसन १९१४ के स्टेसन से बिलकुल भिन्न था ! मुझे स्टेसन पर कोई भी सेठ अब्दुल्ला का आदमी रविवार होने के कारण लेने नहीं आया था ! में सोचने लगा कि कहाँ जाऊं होटल में जगह मिलाने की आशा नहीं थी मेने टिकट कलेकटर से किसी छोटे होटल का पता पूंछा किन्तु उसने मेरी कोई मदद नहीं की ! उसके बगल में एक अमेरिकन हब्शी सज्जन खड़े हुए थे 1 उन्होंने मुझ से कहा आप मेरे साथ चलें में आपको एक छोटे से होटल में ले चलता हूँ उसका मालिक अमेरिकन है और में उसे अच्छी तरह जानता हूँ ! वह आपको होटल में जगह दे देगा ! बे मुझे जॉन्स्टन के फैमिली होटल में लेगए ! जॉन्स्टन ने कहा में आपको एक रात के लिए होटल में जगह दे देता हूँ किन्तु आपको भोजन अपने कमरे में ही करना होगा ! यद्द्पि मेरे मन में काले गोरे का कोई भेद नहीं है किन्तु मेरे अधिकतर ग्राहक गोरे हैं यदि में आपको भोजनग्रह में भोजन दूंगा तो बे बुरा मान जाएंगे और हो सकता है कि बे चले भी जाएँ ! मेने कहा में आपकी कठिनाई समझ सकता हूँ मुझे आप खुसी से मेरे कमरे में भोजन दी जिए 1 जब मैं कमरे में भोजन का इंतजार कर रहा था तो मेने वेटर के बजाय जॉन्स्टन को आते देखा उन्होंने कहा आप भोजनग्रह में भोजन कर सकते हैं मेरे गोरे ग्राहकों को कोई आपत्ति नहीं है 1 आप यहाँ जब तक रहना चाहें यहाँ रहें गोरों की तरफ से कोई रूकाबट नहीं होगी ! मेने मन ही मन भगवान् को धन्यबाद दिया और जॉन्स्टन का उपकार मानकर भोजन गृह मैं  निश्चिन्त होकर भोजन किया ! दूसरे दिन में अब्दुल्ला सेठ के अंग्रेज वकील बेकर से मिलने गया बे मुझ से प्रेम पूर्वक मिले !उन्होंने मुझ से मेरे बारे मैं कुछ बातें पुंछी 1उन्होंे कहा मुकदद्मा लम्बा है और पेचिदीयों से भरा हुआ है 1मिकददमे के लिए बहुत बड़े बड़े और योग्य बेरिस्टर खड़े किये गए हैं !इसीलिए बेरिस्टर के रूप मैं आपकी बहुत अधिक आवष्यकता नहीं पड़ेगी किन्तु   मुझे यह फायदा मिलेगा कि मैं अपने मुबिक्कल की बात आसानी से समझ सकूंगा !    

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