१ जो दुष्कर्म परायण और अशुद्ध अंतःकरण वाले हैं, बे अज्ञानी पुरुष अन्याय पूर्वक मनोवांछित विषय भोगों में विचरने वाली इंद्रियों द्वारा आत्मा ,परमात्मा का दर्शन नहीं कर सकते !
२---परन्तु जब मनुष्य अपने मन के द्वारा इंद्रिय रूपी घोड़ों की बागडोर को सदा पकड़े रहकर उन्हें अच्छी तरह काबू में कर लेता है ,तब उसे ज्ञान के प्रकाश में आत्मा का दर्शन उसी प्रकार होता है जिस प्रकार दीपक के प्रकाश में किसी भी वस्तु की आकृति स्पष्ट दिखाई देती है !
३-----जैसे अन्धकार दूर हो जाने पर सभी प्राणियों के सामने प्रकाश छा जाता है, उसी प्रकार यह निश्चित रूप से समझ लो कि अज्ञान का नाश होने पर ही ज्ञान स्वरुप आत्मा का साक्छात्कार होता है !
४----जैसे जलचर पकछी जल में विचरता हुआ भी जल से लिप्त नहीं होता है, उसी प्रकार मुक्तात्मा योगी संसार में रहकर भी संसार के गुण दोषों से लिप्त नहीं होता है !
२---परन्तु जब मनुष्य अपने मन के द्वारा इंद्रिय रूपी घोड़ों की बागडोर को सदा पकड़े रहकर उन्हें अच्छी तरह काबू में कर लेता है ,तब उसे ज्ञान के प्रकाश में आत्मा का दर्शन उसी प्रकार होता है जिस प्रकार दीपक के प्रकाश में किसी भी वस्तु की आकृति स्पष्ट दिखाई देती है !
३-----जैसे अन्धकार दूर हो जाने पर सभी प्राणियों के सामने प्रकाश छा जाता है, उसी प्रकार यह निश्चित रूप से समझ लो कि अज्ञान का नाश होने पर ही ज्ञान स्वरुप आत्मा का साक्छात्कार होता है !
४----जैसे जलचर पकछी जल में विचरता हुआ भी जल से लिप्त नहीं होता है, उसी प्रकार मुक्तात्मा योगी संसार में रहकर भी संसार के गुण दोषों से लिप्त नहीं होता है !
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