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कर्मफलभोग
------कर्मफल भोग के सम्बन्ध में कई प्रकार के आख्यान महाभारत में दिए गए
हैं !उन्ही आख्यानों में युधिस्ठर और मार्कण्डेय ऋषि का भी कर्मभोग फल के
विषय में आख्यान है !सभी पांडव बड़े कष्ट में अपना बनबास काल काम्यक बन में
बिता रहे थे !वहां पर भगवान श्री कृष्णा नारद जी और मार्कंड़य ऋषि पांडवों
से भेंट करने पहुंचे !युधिस्ठर ने मार्कंड़य ऋषि से कहा कि हमारे मन में
दीघर्काल से यह इक्छा थी कि हमें आपकी सेवा और सत्संग का सुअवसर मिले !
ब्रह्मन हम सब अपने सुख और वैभव से वंचित होकर सब प्रकार के कष्ट जंगल में
भोग रहे हैं !और दुराचारी धृतराष्ट्र पुत्रों को सब प्रकार के सुख
ऐशबर्यऔर समृद्धि प्राप्त है ! इसलिए हमारे मन में यह विचार उठता है कि शुभ
और अशुभ कर्म करने वाले जो मनुष्य हैं बे अपने कर्मों के फल किस प्रकार
भोगते हैं ?कर्मों का फल मनुष्य इसी लोक में इसी शरीर से भोगता है या
मृत्यु के बाद परलोक में भोगता है ?मार्कंड़य ने कहा विवेकी मनुष्य कर्मों
का कुछ फल प्रारब्ध बस प्राप्त करते हैं ! और कुछ कर्मो का फल उन्हें उनके
उद्द्योग और पुरुषार्थ से प्राप्त होता है ! कुछ कर्मो का फल अकस्मात्
प्राप्त होता है ! कोई मनुष्य संसार में ही परम सुख पाता है परलोक में नहीं
प्राप्त करता है ! किसी को परलोक में ही परम कल्याण की पाप्ति होती है !
संसार में नहीं प्राप्त होती है ! किसी को संसार में और परलोक में भी दोनों
स्थानो में भी परम सुख की प्राप्ति होती है ! और किन्ही लोगों को ना तो
परलोक में उत्तमसुख मिलता है और ना संसार में भी सुख कि प्राप्ति होती है !
जिनके पास बहुत संपत्ति समृद्धि पद प्रतिष्ठा आदि होती है ! बे अपने शरीर
को ही बैभव कीर्ति और प्रतिष्ठा प्रदान कराने में तथा प्रकार प्रकार के
इन्द्रियजन्य भोगों की तृप्ति में ही जीवन पर्यन्त लगे रहते हैं ! इसलिए
ऐसे मनुष्यों को सिर्फ संसार में ही सुख मिलता है ! परलोक में उनको सुख की
पप्ति नहीं होती है ! जो लोग संसार में कामनाओ को त्याग कर योग साधना करते
हैं ! तपस्या में संलग्न रहते हैं ! और निष्काम भाव से स्वाध्याय करते हैं !
तथा प्राणियों की हिंसा से दूर रहकर इन्द्रियों को संयम में रखते हुए अपना
जीवन जीते हैं ! उन्हें संसार में सुख की प्राप्ति नहीं होती है ! बे
परलोक में ही परमकल्याण के भागी होते हैं ! जो लोग कर्त्तव्य बुद्धि से
स्वधर्म का पालन करते हैं !और न्याय से ही धन संपत्ति का उपार्जन करते हैं
! और यथा समय विवाह बंधन में बंधकर याग यज्ञ ईश्वर भक्ति तथा सत्कर्मो के
आचरण करते हैं ! उन्हें संसार में भी परम सुख की प्राप्ति होती है ! और
परलोक में भी उन्हें उत्तम सुख प्राप्त होते हैं ! जो मूर्ख मनुष्य ना
ज्ञान के लिए ना तप के लिए और ना दान के लिए ही प्रयत्न करते हैं ! और ना
धर्म पूर्वक गृहस्थ धर्म का ही पालन करते हैं ! बे ना तो सुख पाते हैं और
ना ही उत्तम धर्म युक्त भोग ही भोगते हैं ! उनके लिए ना तो संसार में सुख
है और ना परलोक में ही सुख है ! युधिस्ठर तुम सभी पांडव पराक्रमी और धैर्यं
बान हो ! तुम में अलौकिक ओज भरा है ! तुम सभी शूरवीर तथा तपस्या और
इन्द्रिय संयम और उत्तम आचार व्योहार में सदा तत्पर रहने वाले हो ! इन
सत्कर्मों के फलस्वरूप तुम इस लोक में भी कुछ समय पश्चात राजलक्ष्मी को
प्राप्त करोगे और मृत्यु के बाद तुम सभी को परलोक में भी परम गति की
प्राप्ति होगी ! इसलिए तुम अपने मन में किसीभी प्रकार की शंका को स्थान ना
दो ! तुम्हारा वर्तमान कष्ट तुम्हारे भविष्य के सुख का सूचक है !कभी कभी
अनीति और अधर्म से भी मनुष्यों को ऐशबर्य धन संपत्ति बैभव की प्राप्ति होती
है ! किन्तु वह स्थायी नहीं होती है !और अंत में जड़ मूल से नष्ट हो जाती
है !यही परिणाम अधर्मी धृतराष्ट्र पुत्रों का अंत में होगा ! और तुमको
स्थिर राजलक्ष्मी की प्राप्ति होगी और तुम्हारी कीर्ति इसलोक और परलोक
दोनों स्थान में स्थिर और स्थायी रहेगी !महाभारत युद्ध के बाद यही परिणाम
आया !इसलिए कल्याणकामी मनुष्यों को अधर्म और अनीति से प्राप्त सम्पती वैभव
आदि की प्राप्ति से बचना चाहिए और सदा स्वधर्मनिष्ठा का पालन करते हुए
सत्कर्मो का अनुष्ठान करते रहना चाहिए !
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