आसन प्राणायाम योग के बहिरंग साधन हैं !योग नहीं हैं ------- जैसे रेल विछाने की पटरी का नक्शा रेल की पटरी नहीं होता या मकान बनाने का नक्शा मकान नहीं होता है !इसी प्रकार योग के साधन योग नहीं हो सकते हैं !योग को प्राप्त करने के लिए योग के साधक को सब और से इंद्रियों , मन और बुद्धि की ब्रत्तियों को रोक कर सर्व व्यापी आत्मा के साथ उनकी एकता स्थापित करना ही योगशश्त्रियों के मत में योग है
२--विद्वानों ने काम ,क्रोध ,लोभ ,भय और स्वप्न ( अत्यधिक निद्रा) ये योग के पांच दोष बताये हैं !इनका पूर्ण रूप से उच्छेद करे !क्रोध को i शम (मनो निग्रह ) से जीते !काम को संकल्प क त्याग द्वारा पराजित करे !तथा सतोगुण के द्वारा निद्रा पर विजय प्राप्त करे !धैर्य का सहारा लेकर विषय भोग और भोजन की चिंता से मुक्त हो जाय !नेत्रों की सहायता से हाथ और पैरों की ! मन के द्वारा नेत्र और कानों की ! तथा कर्म के द्वारा मन और वाणी की रक्छा करे ! अर्थात इन सबको शुद्ध बनाये ! सावधानी के द्वारा भय का और विद्वान पुरुषों के सत्संग से दम्भ ,पाखण्ड और झूठ का परित्याग करे !इस प्रकार सदैव सावधानी पूर्वक आलस्य छोड़ कर इन योग सम्बन्धी दोषों को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए !योग के साधक को चाहिए की किसी को पीड़ा देने वाली हिंसयुक्त ,कठोर वाणी का प्रयोग ना करे ! जो कुछ दिखाई दे रहा है उसका बीज (सबका कारण ) तेजोमय ब्रह्म है है !सम्पूर्ण श्रष्टि उसी ब्रह्म का कार्य है ! सम्पूर्ण चरा चर जगत उस ब्रह्म के संकल्प का परिणाम है ! इस साधना से संपूर्ण श्रष्टि के साथ मित्रता स्थापित करे ! और अपनी बुद्धि ,मन मस्तिष्क को हिंसा ,लोभ ,और भोग से मुक्त करे !
२--विद्वानों ने काम ,क्रोध ,लोभ ,भय और स्वप्न ( अत्यधिक निद्रा) ये योग के पांच दोष बताये हैं !इनका पूर्ण रूप से उच्छेद करे !क्रोध को i शम (मनो निग्रह ) से जीते !काम को संकल्प क त्याग द्वारा पराजित करे !तथा सतोगुण के द्वारा निद्रा पर विजय प्राप्त करे !धैर्य का सहारा लेकर विषय भोग और भोजन की चिंता से मुक्त हो जाय !नेत्रों की सहायता से हाथ और पैरों की ! मन के द्वारा नेत्र और कानों की ! तथा कर्म के द्वारा मन और वाणी की रक्छा करे ! अर्थात इन सबको शुद्ध बनाये ! सावधानी के द्वारा भय का और विद्वान पुरुषों के सत्संग से दम्भ ,पाखण्ड और झूठ का परित्याग करे !इस प्रकार सदैव सावधानी पूर्वक आलस्य छोड़ कर इन योग सम्बन्धी दोषों को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए !योग के साधक को चाहिए की किसी को पीड़ा देने वाली हिंसयुक्त ,कठोर वाणी का प्रयोग ना करे ! जो कुछ दिखाई दे रहा है उसका बीज (सबका कारण ) तेजोमय ब्रह्म है है !सम्पूर्ण श्रष्टि उसी ब्रह्म का कार्य है ! सम्पूर्ण चरा चर जगत उस ब्रह्म के संकल्प का परिणाम है ! इस साधना से संपूर्ण श्रष्टि के साथ मित्रता स्थापित करे ! और अपनी बुद्धि ,मन मस्तिष्क को हिंसा ,लोभ ,और भोग से मुक्त करे !
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