भीष्म
ने युधष्ठिर के प्रश्न करने पर उनको जीवन सम्बन्धी विविध प्रश्नो के
उत्तर दिए हैं !युधिस्ठर ने महिलाओं और पुरुषों के सम्बन्ध के अतरिक्त
महिलाओं की विद्वत्ता, आध्यात्मिक उपलब्धियों और अध्यत्मिकज्ञान के सम्बन्ध
में भी अनेक प्रश्न भीष्म पितामह से पूंछे थे !इस सम्बन्ध में एक प्रसंग
महायोगिनी सुलभा और जनक सम्बाद का है ! मिथिलापुरी में प्राचीनकाल में कोई
धर्मध्वज जनक नाम के राजा थे ! उन्हें गृहस्थ आश्रम में रहते हुए ही
संन्यास का सम्यग ज्ञान रूप फल प्राप्त हो गया था ! बे इन्द्रियों का
निग्रह करके शासन करते थे ! सुलभा नाम की एक योगिनी योग धर्म के अनुष्ठान
द्वारा सिद्धि प्राप्त करके अकेली ही पृथ्वी पर विचरण करती थी !उसने अनेक
त्रिदंडी सन्यासियों से मोक्ष तत्त्व की जानकारी के विषय में राजा जनक की
प्रसंशा सुनी ! ये बातें सत्य है या नहीं ? उसके हृदय में जनक के दर्शन का
संकल्प उदय हुआ ! उसने योग शक्ति से अपना पुराना शरीर त्याग कर परम सुन्दर
रूप धारण कर लिया और पल भर में ही जनक की राजधानी मिथिला पहुँच गयी ! उसने
भिक्छा लेने के बहाने जनक का दर्शन किया ! राजा जनक जीवन मुक्त हैं या नहीं
इसका परीक्छण करने के लिए वह अपनी योग शक्ति से राजा की बुद्धि में
प्रविष्ट हो गयी ! और योग बल से उनके चित्त को बांध कर अपने बश में कर लिया
! फिर एक ही शरीर में सुलभा और जनक का संवाद हुआ ! जनक ने अपने गुरु
पंचशिख का परिचय देते हुए कहा कि मुझे सांख्य ज्ञान, योग ,विद्या ,तथा
राजधर्म इन तीन प्रकार के मोक्ष धर्म में गंतव्य मार्ग गुरु से प्राप्त
हुआ है ! उन्होंने मुझे त्रिविध मोक्ष धर्म श्रवण कराया है !,पर राज्य
त्यागने की आज्ञा नहीं दी है ! इस प्रकार विषय भोगों की आसक्ति से रहित हो
मेँ परमपद में स्थित हूँ ! मेरा मोह दूर हो गया है ! में समस्त संसर्गों
का मानसिक रूप से त्याग कर चुका हूँ !इसलिए मेने गृहस्थ धर्म में रहते हुए
ही बुद्धि की निर्द्वन्द्ता प्राप्त कर ली है ! यम नियम आदि का अभ्यास
करने ,काम दोष ,परिग्रह, मान, दम्भ आदि का त्याग करके गृहस्थ भी मोक्ष लाभ
प्राप्त कर सकता है ! तथा कामना दोष होने पर सन्यासी भी मुक्ति से बंचित
हो सकते हैं ! मेरी तो यह धारणा है की गेरुआ वस्त्र पहनना, मस्तक मुड़ा लेना
, तथा कमंडल और त्रिदण्ड धारण करना ये सब उत्कृष्ट संन्यास मार्ग का परिचय
देने वाले चिन्ह मात्र है ! इनके द्वारा मोक्ष की सिद्धि नहीं होती है !
ना निर्धनता में मोक्ष है ! और ना सम्पन्नता में मोक्ष है ! सम्पन्नता और
निर्धनता दोनों ही अवस्थाओं में ज्ञान से ही जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती
है ! इस लिए धर्म अर्थ काम तथा राज्य आदि परिग्रह के इन स्थानो में रहते
हुए भी मुझे आप बंधन रहित पद पर प्रतिष्ठित समझें ! सुलभा ने कहा मेने सुना
था की आपकी बुद्धि मोक्ष धर्म में लगी हुई है ! अतः आपकी मंगल कांक्छणी हो
कर आपके इस मोक्ष ज्ञान का मर्म जान ने के लिए मेँ यहां आई हूँ !जैसे
नगर के सूने घर में सन्यासी एक रात निवास करता है ! इसी तरह आपके इस शरीर
में, मेँ आज की रात रहूंगी ! आपने मुझे बड़ा सम्मान दिया ! अपनी वाणी रूप
आतिथ्य के द्वारा मेरा भली भांति सत्कार किया !अब मै आपके शरीर रूपी
सुन्दर गृह में विश्राम कर कल सुबह यहां से चली जाउंगी ! सुलभा के युक्ति
युक्त वचन सुनकर राजा जनक इसके बाद कुछ भी नहीं बोले !संस्कृत में महिला का
अर्थ महान होता है प्राचीन भारत में महिलएं मात्र ग्रहणी ही नहीं उच्च
कोटि को विदुषी और योगनी भी थी !बे सिर्फ पुरुषों द्वारा ही रक्छित नहीं
थी स्वमेव रक्छित थी !महिलाओं की महानता के ऐसे अनेक प्रसंग महाभारत में
हैं !
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