Sunday, 19 June 2016

आसान प्राणायाम आदि योग नहीं है !योग की वास्तविक उपलब्धि कराने के लिए बहिरंग योग है !!लेकिन लोग इसी को योग समझ बैठे हैं !और इसी का प्रचार प्रशक्छिण तथा कथित योग गुरुओं और योग केन्द्रों द्वारा दिया जा रहा है !योग परमशक्ति से जोड़ने का साधन है !जिसके लिए चित्त बृत्ति का निरोध आवश्यक है ! इसीलिए महर्षि पातंजलि ने चित्तबृत्ति निरोध को योग कहा है ! और योग का परिणाम परमात्मा में चित्त की स्थिरता बताया है !इसीलिए गीता में पातंजल योग दर्शन में योग का जो परिणाम बताया गया है उसी को योग कहा है ! गीता चित्तबृत्तियों से सर्वथा सम्बन्ध विच्छेद पूर्वक स्वतः सिद्ध सम स्वरुप परमात्मा में स्वाभाविक स्थिति को योग कहती है !आत्मा का परमात्मा के साथ योग नित्य है जिसका कभी भी किसी भी अवस्था में किसी भी परिस्थिति में वियोग नहीं होता है ! शरीर संसार के साथ माने हुए संयोग का वियोग होते ही उस नित्य योग का अनुभव हो जाता है जिस से सम्पूर्ण सांसारिक दुखों की निबृत्ति हो जाती है ! गीता ने दुखों के साथ संयोग के वियोग को ही योग कहा है ६(२३) !और योग की इस स्थति को प्राप्त करने के लिए गीता में निष्काम कर्म योग को जीवन में धारण करने की शिक्छा दी है !आज जो विश्व और भारत में योग केंद्र चल रहे हैं वे ऋषि परम्परा के योग केंद्र नहीं है !भौतिक भोग सामग्री से युक्त भोग केंद्र है !और उन केन्द्रों में भौतिक सुख सुविधा उपार्जन और अतिशय काम भोग और भोजन आदि में अनियमतता बरतने वाले पैंसा बालों का बड़ी बड़ी लाखों रूपया की फीस लेकर उपचार बहिरंग योग की विधि आसान प्राणायाम आदि से किया जाता है !जो योग आश्रम चलाने बाले योग गुरु हैं बे स्वयं भी भौतिक सुखों की प्राप्ति में आकंठ डूबे हुए लोग हैं !और योग शिक्छण के नाम से अकूत धन संपत्ति कमा रहे हैं !कभी कभी समाचार पत्रों में इन योग गुरुओं के बिरुद्ध बलात्कार धोखा धडी के मुकदद्मे भी दर्ज होते रहते हैं !इस सबके बाद भी भारत की इस आदि योग परम्परा का शिक्छण दिया जाना लोकहित में बहुत आवश्यक है !इसका जितना अधिक प्रचार और प्रसार होगा उतना ही ज्यादा लोक कल्याण होगा !अतिशय भोग बाद से ग्रस्त और सत्ता संपत्ति बटोरने के कारण असाध्य बीमारियों से युक्त धनपतियों राजनेताओं अधिकारियों के लिए रोग मुक्ति के साथ यह चित्तबृत्ति सुधार का भी माध्यम बनेगा और धीरे धीरे यह अपने वास्तविक स्वरुप में भी स्थापित हो जाएगा !

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