प्रतिभा अमावस्या की गहन काली रात्रि में भी बिना पूर्णिमा के भी प्रकाशित हो जाती है !जो समय के साथ प्रकाशित होते हैं और ख्याति तथा महत्ता प्राप्त करते हैं बे समय के बाद अज्ञात होकर दफ़न हो जाते हैं !भारत का श्रेष्ठ तत्तवज्ञान उपनिषदों में व्यक्त हुआ है !किन्तु जिन ऋषियों को तत्त्व दर्शन हुआ उन्होंने अपने नाम प्रकाशित नहीं किये हैं !जितना गम्भीर और महत्त्व पूर्ण कालजयी ज्ञान आज भारत में है उसके प्रकाशक बे ऋषि हुए हैं जिन्होंने अपने नाम और चित्रों को प्रकाशित नहीं होने दिया !पदमश्री से अलंकृत ये ककछा तीन तक विद्या प्राप्त ऐसे ही व्यक्ति हैं जिन्होंने नाम के लिए काम नहीं किया बल्कि काम से इनका नाम स्वतः प्रकाशित हो गया !पुरुष्कार पाने वालों की इस भारी भीड़ में इन नाग महोदय को बिना किसी प्रयत्न के चुन गया यह उत्तम प्रक्रिया है !ऐसे बहुत से ज्ञात अज्ञात विद्वान भारत में है जो पुरुष्कार प्राप्त के योग्य हैं किन्तु बे पुरुष्कार प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करते हैं बल्कि उदासीन रहते हैं !यह अच्छी शुरुआत है !इसको जारी रहना चाहिए !
Thursday, 31 March 2016
Wednesday, 30 March 2016
भारत की संस्कृति त्याग की और सर्वसमावेशी अनादिकाल से रही है -----------विनोबा जी ने लिखा है की भारत की भूमि की महिमा इसीलिए गायी गयी है क्योंकि यह त्याग भूमि है ! बहुत से इतिहासकार यह कहते हैं कि इस त्याग बृत्ति के कारण ही भारत को बहुत नुक्सान भूत काल में उठाना पड़ा है ! यदि भोग बृत्ति होती तो लोग ज्यादा पुरुषार्थ करते और बिधर्मियो के षड्यंत्र और छल कपट के शिकार नहीं होते ! और भारत को इतनी लम्बी गुलामी को भी नहीं भुगतना पड़ता ! और ना ही भारत में इतना धर्म परिवर्तन होता ! और ना ही भारत की वैदिक धर्म संस्कृति का व्यापक विनाश होता ! किन्तु विनोबा जी का कथन है कि हम बिलकुल इसका उलटा मानते हैं ! हम मानते हैं कि हजारों साल से हजारों जातियां भारत में आकर समाती रहीं उन सबके परिणाम स्वरुप भारत में जो जीवन बना ,उस से भारतीय समाज टिका रहा यह त्याग के कारण ही संभव हो सका ! भारत की संस्कृति आरण्यक संस्कृति है इसका अर्थ है -----त्याग प्रधान संस्कृति ! सारे संसार में यह भावना है कि मानव आत्मा एक ही है ! किन्तु भारत में इस विचार का क्रियान्वन और पोषण ऋषियों मुनियों द्वारा हुआ और राजाओं ने भी इसको संरक्छण दिया ! गीता में भी भगवान् श्री कृष्ण ने कहा कि जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण अनेकों प्राणियों में विभाग रहित एक ही आत्मा को देखता है वही श्रेष्ठ ज्ञान है १८(२०) ! इसीलिए भारत में त्याग और वैराग्य की भावना और सर्वधर्म सम्भाव की भावना विश्व के अन्य देशों से अधिक दिखती है ! विनोबा जी ने एक उदाहरण देकर समझाया है ! कि एक बार चर्चा चली कि भारत की संस्कृति ग्रामीण कही जायेगी या नगरीय ?तब रवींद्र नाथ ने कहा था कि भारत की संस्कृति न ग्रामीण है और ना नगरीय वह आरण्यक है ! घने जंगलों के मध्य भारतीय संस्कृति फली फूली फली और विकसित हुई है ! भारत के धर्मग्रन्थ भी जंगलों में ही लिखे गए हैं ! भारत का प्रत्येक मनुष्य चार आश्रणों का पालन निष्ठां पूर्वक करता था ! मनुष्यो की १०० वर्ष की आयु को चार भागों में विभाजित किया गया था ! २५ साल कि आयु तक ब्रह्मचर्य की साधना के साथ विद्या का अध्ययन और ज्ञान अर्जन ! २६ साल से ५० बर्ष तक वैवाहिक और ग्रहस्थ जीवन ! तत्पश्चात ५० से ७५ साल तक वानप्रस्थ और ७५ से १०० बर्ष कि आयु सन्यास का जीवन भारतीय जीते थे राजा महाराजा भी राज्य त्यागकर बन में प्रस्थान कर अंतिम जीवन भोग विलास से मुक्त होकर सन्यासी का जीवन जीते हुए कठोर साधना कर देह त्याग करते थे ! रवींद्र नाथ ने कहा है भारत की संस्कृति आरण्यक संस्कृति है !गांधीवादी कहते है कि भारत की संस्कृति ग्रामीण संस्कृति है ! और आजकल लोग कहरहे हैं कि हमारी संस्कृति शहरी संस्कृति हैं ! इसीलिए दिल्ली को पेरिस बनाया जा रहा है ! स्मार्ट सिटीज का निर्माण किया जा रहा है ! और ग्रामीण संस्कृति का विनाश किया जा रहा है ! किन्तु भारत का सर्वश्रेष्ठ तत्त्व ज्ञान जंगल में ही लिखा गया और विकसित हुआ था ! पाणिनि ने व्याकरण शिष्यों को जंगल में ही सिखाया ! बादरायण ने ब्रह्मसूत्र जंगल में हे लिखे ! हमारे संपूर्ण प्राचीन और अर्वाचीन ऋषियों ने ततवज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्तिजंगलों में ही तपस्या करके प्राप्त की ! सभी ऋषियों के आश्रम भी जंगल में होते थे जहाँ से आत्मज्ञान का अविरल प्रवाह होता था !आश्रम किसी धनवान या राजा महाराजा के धन से नहीं चलाये जाते थे !बे पूरीतरह स्वाबलम्बी और आत्मनिर्भर होते थे !त्याग और तपस्या का रूप और स्वरुप उन आश्रमों में दृष्टिगत होता था !
Tuesday, 29 March 2016
नसीरुद्दीन सह का कथन पाकिस्तान के आम मुसलमान की दृष्टि से सही हो सकता है
!क्योँकि मुसलमान यह नहीं चाहता कि हिन्दू मुस्लिम में वैमनष्यता रहे !
किन्तु पाकिस्तानी चरम पंथी मुसलमानो की दृष्टि से जो हिन्दुओं के लिए गहरी
घृणा रखते हैं ! 1 और जो पाकिस्तानी हिन्दुओं पर भीअत्याचार करते हैं ! और
हिंदुस्तान में आतंकवादी भेज कर यहाँ आतंकवादी हमले कराते है ! तथा जिनके
हमलों के कारण यहाँ हजारों निर्दोष लोगों की जाने गयी है !इन तमाम घटनाओं
को देख कर यह कैसे कहा जा सकता है कि हिंदुस्तान
में पाकिस्तान के खिलाफ वैर भाव विकसित किया जा रहा है !नसीरुद्दीन को
पाकिस्तान का बच्चों को पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम भी देखना चाहिए जिसमे
हिन्दुओं के बारे में मुस्लिम बच्चों को असत्य और नफ़रत से भरी बातें सिखाई
जाती हैं !पाकिस्तान के चरमपंथिओं की यह कोशिश है कि मुसमानों में हिन्दुओं
के प्रति इतनी गहरी नफरत पैदा कर दी जाय की कभी सौहाद्र पूर्ण सम्बन्ध
स्थापित ही न होने पाएं !नसीरुद्दीन शाह के मुस्लिम पाकिस्तान के प्रति सहन
भूति का एक कारण और भी हो सकता है कि वह एक मुस्ललमान है !और उनको इस्लाम
का चरम पंथी चेहरा न समझ में आता हो इसलिए उनको लगता हो की पाकिस्तान
हिंदुस्तान का हिमायती है जबकि हिंदुस्तान पाकिस्तान के प्रति वैर भाव रखता
है !इस तरह का विचार व्यक्त करने वाले नसीरुद्दीन पहले मुस्लमान नहीं हैं
!सारे जहाँ से अच्छा लिखने वाले अल्लामा इक़बाल भी बाद में विश्व इस्लाम बाद
के पैरोकार बन गए थे !उन्होंने कहा था !अये आवे मौज गंगा वह दिन है याद
तुझको ,उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा? !चीनी अरब हमारा हिन्दोस्तान
हमारा ,मुस्लिम हैं हम बतन हैं सारा जहां हमारा ! यही वह ख्वाब है जिसको
प्राप्त करने के लिए मुस्लिम देशों के चरम पंथी और इस्लामिक संगठन और बोको
हराम जैसे संगठन क्रूर हिंसा का खेल खेल रहे हैं !और जो हिंदुस्तान
पाकिस्तान की हर बेजा हरकत को शक्तिशाली होते हुए भी बर्दाश्त कर रहा है
उसको नसीरुद्दीन कहते हैं की हिंदुस्तान में पाकिस्तान के विरुद्ध वैर भाव
बढ़ाया जा रहा है ?
भारत में सभी धर्मों का स्वागत हुआ --------ईसा के ७०,८० साल बाद संत टामस केरल में आये उनका प्रेम से स्वागत हुआ ! बे माता मेर्री को भी साथ लाये भारतीयों ने माता मेर्री का पार्वती के रूप में समझा ! फिर मुसलमान आये बे एक नयी धर्म संस्कृति लेकर आये ! राजाओं के आने के पहले उनके फ़कीर आये थे !उनके साथ समाजिक समानता की बात आई ! तेरह सौ साल पहले ईरान से पारसी आये उन्हेंभी भारत ने प्रेम से आश्रय दिया ! इसी तरह भारत में यहूदी भी आये मुंबई की और जो यहूदी आये उन्हें बनी इजराइल कहते हैं ! उनके पहले ग्रीक भी आये थे उन्हें यवन कहते हैं ! मुग़ल आये ! चीनी भी आये,! जीयो और जीने दो इस आधार पर ये सारे अलग अलग धर्म भारत में रहे ! इस तरह से सेकंडों जमाते भारत में आश्रय पाकर रह रहीं हैं ! तिब्बत से लोग चीन के डर से भाग कर आये हैं बे भी भारत में बस गए हैं ! भारत का अर्थ ही बन गया है सबका भरण पोषण करने वाल देश ! भारत ने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया ! जिस वक्त भारत में शक्तिशाली राजा और सम्राट थे ! विद्या, अध्यात्म शिल्प कला धन सम्प्सत्ति और ऐश्वर्य के शिखर पर शक्ति संपन्न भारत था तब भी भारत के द्वारा किसी दूसरे देश पर आक्रमण करने का एक भी उदाहरण नहीं है !मै सब संसार की तरफ मित्रता की निगाह से देखूं ताकि संसार भी मित्रता की दृष्टि से हमारी तरफ देखे यह सन्देश भारत को वेदों ने दिया है ! उसी को भगवान् बुद्ध ने अपने जीवन में प्रगट किया ! सच्चे भारतका दर्शन गावो में बस्ता है और वहीं उसका दर्शन भी होता है ! किन्तु अब उसका भी विनाश शहरीकरण के कारण हो रहा है ! गाओं का शोषण हो रहा है ! और कृषि का विनाश हो रहा है ! शहरीकरण के कारण एकलाख से अधिक गाओं समाप्त हो चुके हैं ! और गाओं के विनाश का यह सिलसिला अभी भी जारी है ! भारत से विद्या और धर्म का सन्देश लेकर जो भारतीय चीन, जापान ,लंका ,तिब्बत ब्रह्मदेश ,और मध्य एशिया में गए बे अपने साथ तलबार या कोई अस्त्र ,शस्त्र लेकर नहीं गए थे ! बे केवल ज्ञान प्रसार के लिए गउे थे ! कुछ व्योपारी भी व्यापार करने के लिए गए थे ! भारत अपनी सत्ता दूसरे देश पर चलाना तो चाहत ही नहीं था परन्तु उसने कभी वैचारिक हमला भी दूसरे देशों की धर्म संस्कृति परम्परा पर नहीं किया और ना ही बलात .लोभ .लालच और भय से धर्म परिवर्तन कराया हे ! केवल विचार समझाकर ही संतोष रखा ! भारत की यह खूबी हमारे लिए बहुत गौरव की बात है ! प्राचीन काल में भारत के लोग दूर दूर तक यात्रा किया करते थे !जिस तरह से विदेशी लोग भारत में आये उसीप्रकार से भारतीय भी विदेशों की यात्रा करते थे ! किन्तु बे विदेशों से भारत में आने वालों की तरह विदेशों में बसते नहीं थे ! विश्व में भारत जैसी पवित्र सुख दायक भूमि कहीं भी नहीं है ! और ना ही किसी देश ने भूमि को माता का दर्जा दिया गया है ! और ना ही भूमि की माता की तरह पूजा की है ! भगवान् श्री राम जब लंका में रावण का बध करके लौटते हैं तब बे अपने भाई लकछमन से कहते हैं कि यद्द्पि लंका स्वरणमयी है किन्तु वह मुझे रुचिकर नहीं लगती है मुझे तो अपनी जन्म भूमि ही प्रिय है जो स्वर्ग से भी अधिक आनंद दयाक,महान और सुख कर है ! भारत की वैदिक सनातन परंपरा में भूमि को सर्वोत्कृष्ट पूज्यनीय माँ का दर्जा प्रदान किया गया है इसीलिए इसे भारत माता कहते है ! गांधी जी भी अपने पत्रों में वन्दे मातरम् लिखते थे !
Monday, 28 March 2016
भारत पर है विश्व को ज्ञान प्रदान करने की जिम्मेदारी ---------- आचार्य विनोबा भावे ने भारत का अर्थ करते हुए कहा है कि इस देश को भारत खण्ड कहते हैं इसका अर्थ होता है सबका भरण पोषण करने वाला ! अब हम स्वतंत्र है और हमारे पास अवसर है कि हम सारे विश्व का ज्ञान भरण करें ! लम्बे संघर्ष के बाद भारत स्वतंत्र हुआ है ! इसीलिए अब हमारी बुद्धि भी स्वतंत्र होनी चाहिए ! और सम्पूर्ण विश्व का निश्चित अचूक और सम्यक मार्गदर्शन भारत को करना चाहिए ! इतनी ऊंची उड़ान भारत को भरना चाहिए !अपने पूर्वजों के द्वारा दी गयी विरासत का हम स्मरण तो करें लेकिन उसका अभिमान ना करें ! वेद विश्व मानव की बात करता है ! पृथ्वी के सब मनुष्यों का एक परिवार है यह कहते हुए कहा है वसुधैव कुटुंबकम कुटुंब नहीं कुटुकम्बकम कहा ,मतलब छोटा कुटुम्ब ! पृथ्वी के अलावा जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है वह सम्पूर्ण मिलकर पूर्ण कुटम्ब होगा ! इसीलिए संसार छोटा कुटुंब है ! इस प्रकार की एक व्यापक दृष्टि हमारे दिव्यदृष्टि संपन्न ऋषियों ने हमें दी है ! इस देश की दृष्टि कभी विस्तार वादी नहीं रही ! यहाँ दुनिया के सभी लोगों और धर्मों का प्रवेश हुआ ! सर्व रक्छन् की दृष्टि यहाँ हमेशा विदयमान रही है ! गीता में श्री कृष्ण ने कहा है परस्पर भावयन्तः -------यह दृष्टि मनुष्यों के साथ पशु पकछियों के साथ भी रही ! भारत की दृष्टि अनादि काल से सर्वसमवेशिक रही है ! गांधी जी के साथी मिस्टर एंड्रूज कहते थे कि गिलहरी जैसे भारत में अहिंसक ,मांस भक्छन् ना करने वाले भारतीयों के पास आकर फुदकने लगाती है ! वैसे मांश भकछी लोगों के पास नहीं आती है ! लोकमान्य तिलक जब मंडाले में जेल में सजा काट रहे थे ! तब चिड़ियाँ आकर उनके कन्धों और सर पर बैठ जाती थी और उनके आस पास फुदकती रहती थी ! यह देख कर जेल के अधीकछक ने उनसे कहा कि ये चिड़ियाँ हमारे आते ही क्यों उड़ जाती हैं और आपके पास फुदकती रहती हैं ! लोकमान्य ने उत्तर दिया में इन चिड़ियों को खिलाता हूँ और आप इनको खाते हैं इसिलए बे आपसे दूर भागती हैं ! भारत में नाग की भी पूजा होती है ! भारत के महासागर में संसार भर की नदियां मिली है ! इसीलिए भारत के अनादि ग्रन्थ ऋग्वेद में विश्व मानुष शव्द आया है ! यह शव्द ऋषियों को इसीलिए सुझा की हम संकुचित नहीं हैं परम व्यापक हैं ! इसी को भारतीय दर्शन कहते हैं इसके अनुसार आचरण और जीवन बनाने में चाहे जितना समय लगे ,चाहे युग बीत जाएँ लेकिन भारतीय दर्शन तो यही रहेगा ! भारत के रोम रोम में समन्वय समाया हुआ है ! भारत दुनिया के लिए एक आदर्श है ! भारत की धर्म संस्कृति वैश्वानर संस्कृति है ! दुनिया में जितनी विविधता है वह सारी भारत में है भारत छोटे रूप एक विश्व ही है ! भारत की संस्कृति सबको अपने में समा लेने वाली संस्कृति है ! इसलिए भारत का राष्ट्रवाद अंतर राष्ट्रवाद जैसा है ! भारत विश्व राष्ट्रवादी है ! भारत वासियों को विश्व व्यापक होने के लिए अहिंसा शक्ति का निर्माण करना चाहिए !भारत हिंसक शक्ति का अग्रदूत ना कभी रहा है और ना होगा ! भारत वासियों पर यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्तव है कि बे हिंसा का अति सीमित उपयोग हिंसक आक्रमणों के प्रतिरोध के लिए ही करें ! किन्तु भारत में रहने वाले सभी धर्म हिंसा को दिल दिमाग और कर्म से त्यागकर विश्व के सामने क्रियाशील अहिंसक ज्ञान का उदाहरण प्रस्तुत करें यही भारत भूमि की ऋषि प्रणीत विरासत है ! और इसी विरासत के हम उत्तराधिकारी हैं ! और इसका पालन करने की हमारी जिम्मेदारी है ! सम्पूर्ण विश्व को हिंसा मुक्त करने का ज्ञान सिर्फ भारत की वैदिक और श्रमण संस्कृति के पास ही सुरक्छित और संरकछित है !
Sunday, 27 March 2016
दुर्लभं भारते जन्म -------------हमारा यह भारत देश परम पवित्र है ! ऐसा हमारे सभी धर्म ग्रन्थ बताते हैं और इस पवित्र भूमि में तपस्या और साधना से सिद्धि प्राप्त ऋषियों ने भी यही बात कही है ! यहां की मिटटी के कण कण में और यहां की हवा के अणु परिमाण में अनिवरचनीय आनंद और चमत्कार भरा हुआ है ! जिसका अनुभव अन्य देशों की भूमिमे नहीं होता है ! इस देश के निवासियों के चेहरों में और पशु पक्छियों अदि में जिस सौंदर्या ,पवित्रता माधुर्य और गाम्भीर्य का दर्शन होता है उसे देखते रहने के लिए इस भारत भूमि में जन्म लेने के लिए सभी जीव जन्तु लालायित रहते हैं ! भारत में ही सर्वप्रथम मानव धर्म का उदय हुआ और यहीं ऐसे राज्य धर्मका प्रचलन हुआ कि यहाँ के राजा भी ऋषितुल्य व्योहार करते थे और राजऋषि कहलाते थे ! सदाचार की उत्तम करुणा और अहिंसा प्रधान जीवनचर्या का अनुपालन इस देश की भूमि पर अनादि काल से होता रहा है ! महाराज शान्तुन के राज्य में इस देश में पशु पकछियों तक का बध नहीं होता था ! इस देश में अहिंसा का प्रारम्भ खेती से हुआ ! खेती में बहुत महान आध्यात्मिक रहस्य छिप हुआ है ! जमीन में दोचार डेन बोकर सहस्त्रों दाने प्राप्त करना यह खेती से ही संभव हुआ और यहीं से मानवों के जीवन में अहिंसा का प्रवेश हुआ ! इसके बाद गो दुग्ध की महिमा ,भगवान् श्री कृष्ण की गो सेवा, कपडे के लिए कपास की खोज, ज्ञानार्जन के लिए समर्पण, तपस्या और दैविक शक्ति की प्राप्ति के लिए राज्य त्याग और सुख वैभव को छोड़कर त्यागमय कठोर जीवन जीने की परम्परा, शौर्य धैर्य प्रजा रकछन का छत्री धर्म शिक्छा पर राज्य सत्ता का अनियंत्रण आश्रमव्यबस्था , सन्यासियों के त्रिदण्ड, .भक्ति मार्ग ,अहिंसक यज्ञ, महीवीर और बुद्ध के समाज सुधार, ग्राम पंचायतों का निर्माण ,,सभी देशों में आवागमन ,किसी भी देश पर अनाक्रमण ना करना और सभी देशों से मैत्री भाव की भावना का विकास ,सभी धर्मों का समान आदर और अनगनित चैतन्य लहरें इस भारत भूमि में उत्पान्न हुई और विकसित हुई ! तुलसीदास ने कहा है भलि भारत भूमि .भले कुल जन्म ! यहां की चप्पा चप्पा भूमिपर संतों के चरण पड़े हैं ! कन्याकुमारी से कैलाश तक अशंख्या सत्पुरुषों ने इस भूमि को अपने चरणों से पवित्र किया है ! जिसने भारत भूमि में जन्म पाया और भगवान् का गुण गाया वह धन्य है ! इसकी धूलि में पड़े हुए कीड़े मकोड़े भेी संतों के चरणों के स्पर्श से पवित्र होकर धन्य हो गए ! ५०० साल पूर्व गुजरात की भूमि में जन्मे नरसी मेहता और असम में जन्मे शंकर देव और माधव देव ने भी भारत भूमि का गुण गान किया है !बे समकालीन थे ! परन्तु ना तो बे एक दूसरे की भाषा जानते थे और ना एक दूसरे को पहचानते थे ! लेकिन दोनों ने ही कहा भारत हमारी पुण्यभूमि है और हमने इसमें जन्म पाया है इसीलिए हम धन्य हैं ! रामायण हिमालय से कन्याकुमारी तक सम्बन्ध जोड़ती है और महाभारत द्वारिका से असम तक इस तरह भारत की पूर्व पश्चिम और उत्तर दक्छिन की एकता सर्व मान्य है !
Saturday, 26 March 2016
भारत की आत्मा में शक्ति का भण्डार भरा पड़ा है यहां से संस्कृति का सर्वांगीण आध्यात्मिक ज्ञान समय समय पर प्रगट होता रहता है ! थकान आना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है ! दिन भर उड़ान भरने के बाद पकछी भी थक जाते हैं और मनुष्य तथा पशु भी थक जाते हैं !और उन्हें भी रात्रि में विश्राम करना पड़ता है !थका हुआ भारत फिर से जागा और उसने परतंत्रता की बेड़ियों को समाप्त कर दिया और भारत समाज सुधार में लग गया ! स्वातंत्र्य के अनेक प्रवक्ता भारतीय जन समाज में प्रगट हुए उन्होंने समाज सुधार किये ,धर्म सुधार किये ! ऐसे ही एक प्रवक्ता राजा राममोहन राय थे उन्होंने भारतीयों को जगाया और कहा उठो निद्रा और आलस्य तथा प्रमाद को त्यागो बहुत बुराईयां समाज में आगई हैं धर्म में जड़ता और अंधविश्वास पैठ गया है ! उपनिषद का धर्म कितना उज्जवल था इसलिए धर्म में सुधार करो ! और उन्होंने समाज के कट्टर पंथियों के विरोध के बाद भी सती प्रथा समाप्त कराने में सफलता पायी !जैसे सोने को तपाने से उसमे शुद्धता आती है उसी प्रकार भारत के मनीषियों ने भी परतंत्र भारत में भी सभी धर्मों के प्रेरक समाज निर्माण और रचनात्मक विचार ग्रहण किये और उन्ही विचारों से अंग्रेजो को स्वतंत्रता का महत्त्व समझा कर भारत को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष किया ! दादाभाई नौरोजी रानाडे अदि इसी कोटि के महापुरुष थे ! श्री अरविंदो पश्चिम की सभी संस्कृति को आत्मसात कर गए और विज्ञान ,साहित्य ,काव्य ,राजनीति ,अर्थशास्त्र ,तत्तवज्ञान अदि सभी में प्रवीण हो गए ! इसके बाद उन्होंने उपनिषदों का अध्ययन किया, वेदों पर भाष्य लिखा, गीता पर चिंतन प्रस्तुत किया और अतिमानस का नया योग शास्त्र संसार को दिया ! इस तरह भारतीय संस्कृति को और प्रभावी बनाया ! दो संस्कृतियों के संगम से परिपक्व मधुर फल का निर्माण हुआ ! महात्मा गांधी भी दो संस्कृतियों के संगम थे !उन्होंने पश्चिम का विचार आत्मसात किया और भारत की धर्म संस्कृति की उपासना की ! इस तरह भारत को जगाने का काम अनेक महापुरुषों ने किया ! जिनमे भारत को गुलामी से मुक्त कराने की तीब्र तड़प थी उन्होंने हिंसा का सहारा लिया और पश्चिमी देशों में उत्पन्न नवोदित समाज को बदलने वाला समाजवादी साम्यवादी आयातित विचार ग्रहण किया ! किन्तु जो भारतमाता की महान आध्यात्मिक परंपरा से प्रभावित थे उन्होंने इसी महान परंपरा से धर्म में से धर्मान्धता रूपी कूड़े को निकालने का प्रयत्न ! किया जाग जाने पर बाघ ,सिंह ,गधा ,पशु पकछी अदि जैसे सोते हैं जागने पर बे वैसे ही होते हैं शेर शेर होकर जागेगा और गधा गधा होकर ही जगेगा भारत जागा है तो वह उसी आध्यात्मिक गौरव ,शक्ति और शौर्य के साथ जागा है जिसके साथ और जिस रूप स्वरुप में वह सोया था !
जैसा समाचारों में बताया जा रहा है !उस से यह प्रतीत होता है कि डॉ नारंग की हत्या का साम्प्रदायिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है ! किन्तु यह हत्या मारने वालों की दुष्टता का प्रत्यक्छ प्रमाण है !इन हत्यारों को ना तो कानून से भय है !और ना ही इनमे जरा सी भी मानवता है !इनको मनुष्यों को मार देना इतना सहज मालूम होता है १जितन मुर्गा और बकरा मारना इनको सहज मालूम पड़ता है !इस मामले को कुछ लोग साम्प्रदायिकता का रंग दे रहे हैं !हालाँकि जैसा समाचारों में बताया जा रहा है कि हत्यारों में एक हिन्दू भी है !हिन्दू मुसलिम के झगड़े में अगर कोई मुसलमान मार दिया जाता है !तो उसको साम्प्रदायिकता की चादर उड़ा दी जाती है !और फिर मृतक के परिवार को सुविधाएं देने की झड़ी लग जाती है !इसिलए अब कुछ लोग मुसलिम दवरा मारे गए व्यक्ति को भी साम्प्रदायिक कहने लगे हैं !यह हत्या जो हत्यारों ने डॉ को पीट पीट कर जान से मारने की !उससे डॉ के परिवार पर गम्भीर आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है !सरकार को मृतक के परिवार को भी अखलाख की तरह आर्थिक और अन्य सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए !
व्योपारी अपनी आय व्यय का चिटठा वर्ष के अंत में बनाता है !फिर अगले वर्ष
के लिए ऐसी व्यबस्था का निर्माण करता है 1 जिस से आय में बृद्धि हो और
नुकसान यदि गत वर्ष में हुआ हो तो उसकी भी भरपाई हो जाए !आज कल देश में
बहुत से धार्मिक संगठन सतबृत्ति प्रसार के कार्योँ में संलग्न दिखाई देते
हैं ! किन्तु जैसा अनुभव में आ रहा है! कोई खास सुधार दिखाई नहीं देता है
!बल्कि इन संगठनो में भी दूषित चित्त के लोगों का वाहुल्य मालूम पड़ता है
!इसलिए सुधार की जगह बिगाड़ के दर्शन भी होते है !जब धार्मिक
मंचों से त्याग तपस्या ईश्वर भक्ति सादा पवित्र जीवन के प्रवचन होते हैं
!किन्तु प्रवचन करने बालों के जीवन में उसका दर्शन नहीं होता है !बल्कि
विपरीत भोग मय जीवन का आचरण दिखाई देता है ! तब ऐसे संगठनो में ऐसे लोगों
का वर्चस्व बढ़ जाता है जिनकी कथनी आदर्श युक्त किन्तु करनी कपट युक्त होती
है !इस से ऐसे लोगों का जमघट लगने लगता है जो अपने कर्तव्य कर्म का निर्वहन
तो करते नहीं है !सभी प्रकार के गलत काम करते हैं ! और इन धार्मिक संगठनो
को अपने अन्याय भ्रष्ट आचरण से उपार्जित धन से इन संगठनो के गुरुओं को
दान दक्छिणा देकर पाप से अपने आप को मुक्त समझ लेते हैं ! और फिर पाप कर्म
में लिप्त हो जाते हैं !इस समय ऐसे धार्मिक आयोजनो की भरमार दिखाई दे रही
है १इसिलिये जो वास्तव में सदमार्ग के पथिक हैं ! और सदाचार के अनुरागी
हैं !और भगवन के भक्त हैं 1 उन्हें सिर्फ कथनी से ही प्रभावित नहीं होना
चाहिए !करनी देख कर ही अपनी राय कायम करना चाहिए 1 किन्तु ईश्वर की कृपा और
आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए जितना हो सके अपना आचरण पवित्र करने का
प्रयत्न करना चाहिए और जहाँ कहीं भी ऐसे ईश्वर भक्तों आचार्यों का दर्शन
सत्संग प्राप्त हो उनका संग करके वास्तविक ईश्वर भक्ति प्राप्त करने का
प्रयत्न करना चाहिए !
कुछ दिन पहले समाचार आयाथा की राजस्थान में एक अतिरिक्त जिलाधीश एक किसान
से तीन लाख की घूस लेते रंगे हाथ पकड़ा गया था! जबकि उसकी प्रतिमाह की
तनख्वाह एक लाख रूपए है! आज समाचार आया है कि गरौठा तहसील में एक कानूनगो
एक किसान से १५००० हजार की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा गया है !पोलिस भर्ती
में हुई धांदली में युवक कई दिन से आंदोलन कर रहे हैं !रिश्वत खोरी और
सरकार के स्तर से होने वाली धांधली का विरोध यह लोकतंत्र को मजबूत करने के
लिए उठाया गया सही कदम है और स्वागत योग हैं !सरकारी अधिकारिओं
कर्मचारिओं के वेतन और सुबिधाओं में असाधारण बृद्धि हुई है! और उनका जीवन
स्तर आमजनता के मुकाबले बहुत ऊँचा पहुँच गया है !बेतन बृद्धि के बाद रिश्वत
खोरी कामचोरी ख़त्म होनी चाहिए थी !किन्तु परिणाम इसका उल्टा हुआ है! वेतन
बृद्धि के साथ इन लोगों ने रिश्वत की राशि भी बढ़ा दी है !कचेर्री में
तहसील में रजिस्ट्री कार्यालय में जहाँ किसानो के काम पड़ते हैं खुले आम
रिश्वत का लेन देन होता है! ऐसे तो शायद ही कोई कार्यालय हो जहाँ रिश्वत
खोरी न होती हो !रिश्वत ने अब लूट का रूप लेलिया है !बर्तमान समय में मेरी
दृष्टि में सच्चे भारत के सपूत बे हैं जो रिश्वत नहीं खाते हैं तथा अनुचित
साधनो से धन संग्रह नहीं कतरे हैं !और बस्तवीक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
बे हैं जो रिश्वत खोरों को पकड़वाते है! और धांदली के विरुद्ध आंदोलन करते
हैं ! क्योँकि इस समय इसी देश सेवा की आवश्यकता है !
Friday, 25 March 2016
भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक विचार सम्पदा से ओत प्रोत है -------प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था !यहां सेकंडों नदियां बहती थी!
1 और हिमालय ,विंध्याचल जैसे पहाड़ तो देश में हैं ही ! नदियां जरूर बहुत सी लुप्त हो गयी हैं ! और गंगा ,जमुना जैसी पवित्र नदियों का जल भी प्रदूषित हो गया है ! इस समय खनिजों की बेशुमार खुदाई से बालू और पहाड़ियों का भी नाश हो रहा है ! ब्रक्छों की अवैध कटाई से जंगलों का भी विनाश हो रहा है आबादी का दबाब भी अनावश्यक रूप से बढ़ रहा है ! इन सब कारणों से पर्यावरण की विकराल समस्या खड़ी हो गयी है ! इस सबके बाबजूद भी जैसा की विनोबा जी ने कहा है कि भारत में जो विचार सम्पदा है वह अदिद्वतीय है ! बे कहते थे कि बे यह बात अभिमान से नहीं कहते थे अगर बे किसी और देश में भी जन्मे होते तो भी बे निष्पक्छपाती होकर यही कहते कि भारत का विचार वैभव अद्द्वतीय है ! भारत की बुनियादी वस्तु आध्यात्मिक विचार सम्पदा है भारत में वैदिक ऋषियों से लेकर आज तक आध्यात्म की एक अखण्ड परंपरा चली आरही है ! दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं हैं जहां अध्यात्म की ऐसी अखण्ड अनादि परंपरा हो ! भाषाएँ बदली बहुत से अपभ्रंश भी हुए किन्तु यहाँ की ज्ञान परंपरा खंडित नहीं हुई 1 यास्काचार्य ने कहा सनातनो नित्य नूतन ----------ऐसी हमारी नित्य नूतन संस्कृति है ! हमारे भीतर कोई शाश्वत आध्यात्मिक ऋषिओं द्वारा प्रणीत शक्ति है जो बदलती नहीं है ! इसिलए स्थल काल के भेदों के बाद भी सांस्कृतिक एकता के दर्शन होते हैं ! जो दर्शन काशी में होता है वही रामेश्वरम में भी होता है ! हमारे जीवन का ढांचा बदला फिर भी हमारी आतंरिक एकता कायम ही रही -------यूनान ,रोम ,मिस्र ,मिट गए जहाँ से कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी ! यह कुछ क्या है ?प्राचीन कल से ही भारत के लोग आध्यात्मिक सन्देश विश्व भर में पहुँचाते रहे हैं !चीन जापान अदि देशों में बुद्ध धर्म पहुंचा ! ज्ञान की विविध शाखाओं का विचार और विकास हुआ ------गणित शास्त्र की शोध हुई ,व्योहार का अध्ययन हुआ, वेदीक्शास्त्र चला ,और वनस्पति शास्त्र विकसित हुआ ,ज्योतिष शास्त्र भी विकसित हुआ , बड़े बड़े महाकाव्य लिखे गए अनेक प्रकार के सुक्छम तत्तवज्ञान के विचार तब निकले जब पृथवी के अन्यदेश ज्ञान के अन्धकार में डूबे हुए थे ! पूर्व के बुद्धिमान वहां पहुंचे इसका उल्लेख बाइबिल में है ! किन्तु कुछ काल ऐसा निकला जब भारत सोता हुआ मालूम पड़ा ! किन्तु अब वह फिर से जाग रहा है ! रामकृष्ण परम हंस ,रवींद्र नाथ टैगोर ,अरविन्द घोष ,विवेकानंद ,लोकमान्य तिलक महात्मा गांधी ,आचार्य विनोबा भावे अदि और इस श्रृंखला में अनेकों आध्यात्मिक ऋषि मुनि और ज्ञात अज्ञात सहस्त्रों आध्यात्मिक साधक भारत की पवित्र धरा धाम पर आध्यात्मिक चेतन जाग्रत करने के कार्य में संलग्न है !भारत फिर से जाग रहा है !
1 और हिमालय ,विंध्याचल जैसे पहाड़ तो देश में हैं ही ! नदियां जरूर बहुत सी लुप्त हो गयी हैं ! और गंगा ,जमुना जैसी पवित्र नदियों का जल भी प्रदूषित हो गया है ! इस समय खनिजों की बेशुमार खुदाई से बालू और पहाड़ियों का भी नाश हो रहा है ! ब्रक्छों की अवैध कटाई से जंगलों का भी विनाश हो रहा है आबादी का दबाब भी अनावश्यक रूप से बढ़ रहा है ! इन सब कारणों से पर्यावरण की विकराल समस्या खड़ी हो गयी है ! इस सबके बाबजूद भी जैसा की विनोबा जी ने कहा है कि भारत में जो विचार सम्पदा है वह अदिद्वतीय है ! बे कहते थे कि बे यह बात अभिमान से नहीं कहते थे अगर बे किसी और देश में भी जन्मे होते तो भी बे निष्पक्छपाती होकर यही कहते कि भारत का विचार वैभव अद्द्वतीय है ! भारत की बुनियादी वस्तु आध्यात्मिक विचार सम्पदा है भारत में वैदिक ऋषियों से लेकर आज तक आध्यात्म की एक अखण्ड परंपरा चली आरही है ! दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं हैं जहां अध्यात्म की ऐसी अखण्ड अनादि परंपरा हो ! भाषाएँ बदली बहुत से अपभ्रंश भी हुए किन्तु यहाँ की ज्ञान परंपरा खंडित नहीं हुई 1 यास्काचार्य ने कहा सनातनो नित्य नूतन ----------ऐसी हमारी नित्य नूतन संस्कृति है ! हमारे भीतर कोई शाश्वत आध्यात्मिक ऋषिओं द्वारा प्रणीत शक्ति है जो बदलती नहीं है ! इसिलए स्थल काल के भेदों के बाद भी सांस्कृतिक एकता के दर्शन होते हैं ! जो दर्शन काशी में होता है वही रामेश्वरम में भी होता है ! हमारे जीवन का ढांचा बदला फिर भी हमारी आतंरिक एकता कायम ही रही -------यूनान ,रोम ,मिस्र ,मिट गए जहाँ से कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी ! यह कुछ क्या है ?प्राचीन कल से ही भारत के लोग आध्यात्मिक सन्देश विश्व भर में पहुँचाते रहे हैं !चीन जापान अदि देशों में बुद्ध धर्म पहुंचा ! ज्ञान की विविध शाखाओं का विचार और विकास हुआ ------गणित शास्त्र की शोध हुई ,व्योहार का अध्ययन हुआ, वेदीक्शास्त्र चला ,और वनस्पति शास्त्र विकसित हुआ ,ज्योतिष शास्त्र भी विकसित हुआ , बड़े बड़े महाकाव्य लिखे गए अनेक प्रकार के सुक्छम तत्तवज्ञान के विचार तब निकले जब पृथवी के अन्यदेश ज्ञान के अन्धकार में डूबे हुए थे ! पूर्व के बुद्धिमान वहां पहुंचे इसका उल्लेख बाइबिल में है ! किन्तु कुछ काल ऐसा निकला जब भारत सोता हुआ मालूम पड़ा ! किन्तु अब वह फिर से जाग रहा है ! रामकृष्ण परम हंस ,रवींद्र नाथ टैगोर ,अरविन्द घोष ,विवेकानंद ,लोकमान्य तिलक महात्मा गांधी ,आचार्य विनोबा भावे अदि और इस श्रृंखला में अनेकों आध्यात्मिक ऋषि मुनि और ज्ञात अज्ञात सहस्त्रों आध्यात्मिक साधक भारत की पवित्र धरा धाम पर आध्यात्मिक चेतन जाग्रत करने के कार्य में संलग्न है !भारत फिर से जाग रहा है !
Thursday, 24 March 2016
मोदीजी केंद्र में और केजरीवाल दिल्ली की सत्ता में पहली बार आये हैं !और दोनों ने ही जनता को विकास के सुनहरे और अतिरंजित स्वप्न परोसे हैं !और दोनों ही अपने जनता के सामने किये वायदे पुरे करने में लगे हुए हैं !मोदीजी अपने वायदों की पूर्ति में बाधा के रूप में कांग्रेस के लम्बे शाशन में किये गए गलत कामों को प्रस्तुत करते हैं !और केजरीवाल केंद्र की सरकार को सबसे बड़ी वाधा अपने वायदा पुरे ना करपाने का कारण बताते हैं !ये अनसुलझी समस्याएं कभी भी नहीं सुलझ पाएंगी !मोदी जी ने केजरीवाल को होली की बधाई देकर परम्परा का निर्वहन किया है !और केजरीवाल ने भी औपचारिक धन्यबाद दिया है !देश में रचनात्मक ,सर्वसमावेशिक सहयोगात्मक राजनीति का उदय और प्रचलन अभी नहीं हुआ है !
भारतीय संस्कृति ------------------संस्कृति में कुछ अच्छे और कुछ गलत विचार भी चलते हैं ! मनुष्य की एक प्रकृति होती है और एक विकृति भी होती है ! मनुष्य को भूख लगने पर वह खाना खता है यह उसकी पकृति है ! और भूख ना लगने पर भी जब वह स्वाद तृप्ति के लिए आवश्यकता से अधिक खाकर आंधियों और शारीरिक व्याधियों को जन्म देता है यह उसकी विकृति है ! जो मेहनत करके खाते हैं यह संस्कृति है ! और जो जो मेहनत को टालते हैं दूसरे के श्रम से उपार्जित संपत्ति को छल कपट ढोँग पाखण्ड दबंगई ,गुंडागर्दी से लुटते हैं और वैभव प्राप्त कर उसको भोगते हैं यह विकृति है ! चाहे इस प्रकार की विकृति प्राचीन काल से चली आरही हो या आज भी चलती दिखाई दे रही हो वह कभी भी संस्कृति नहीं हो सकती है ! भारत की संस्कृति प्रयोगशील रही है !भारत प्राचीन काल से ही प्रवृत्तिशील रहा है ! यहाँ आध्यात्मिक प्रवृत्ति और बहुत गूढ़ चिंतन चलता रहा है और ुासके लिए बहुत से प्रयोग भी चलते रहे हैं उस से यहां का समाजशास्त्र निर्मित हुआ है ! ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा ,गृहस्थाश्रम के नियम ,बानप्रस्थ का विश्वास ,सन्यास का आदेश ,मासाहार का निषेध कृषि के लिए आदर, शिक्छा पर राजसत्ता क अधिकार ना हो ! कोई भी अपना काम छोड़ कर लालच बश अपने स्वभाव और सामर्थ्य को न देख कर दूसरे के कामों में दाखिल ना हो -----ऐसे अनेक प्रयोग भारत में हुए हैं ! कोई वर्णव्यबस्था के नाम से ,हुए ! कोई आश्रम के नाम से ,कोई योगाभ्यास के नाम से, कोई भक्ति के नाम से कोई तत्तवज्ञान और दर्शन के नाम से, कोई गुण विकास के नाम से ऐसे विविध नाम देकर आध्यात्मिक और जीवन यापन करने सम्बन्धी प्रयोग भारत में बहुत हुए हैं !
Wednesday, 23 March 2016
सरदार भगतसिंह से युवाओं को क्या सीखना चाहिए ?--(१ ) सिद्धान्त के प्रति समर्पित जीवन ज़ीने की कला ----- भगत सिंह मार्क्सवाद से प्रभावित थे !और उसको समाज के आमूलचूल परिवर्तन के लिए नवीन क्रांतिकारी उपाय के रूप में स्वीकार करते थे !बे किसी भी व्यक्ति के अंध समर्थक और अंध भक्त नहीं थे !उनके समय में गांधीजी ,नेहरूजी और सुभाषचंद्र बॉस भारत के राजनैतिक छितिज पर छाये हुए थे !बे इन तीनो महापुरुषों में सर्वाधिक प्रभावित नेहरूजी से थे !उन्होंने अपनी सहादत के ३साल पूर्व एक लेख में सुभाषचंद्र बॉस को भावुक बंगाली कहा था !और बे सुभाष बोस के राष्ट्रवाद को भी स्वीकार नहीं करते थे !बे नेहरूजी को युगांतरकारी मानते थे !और उनकी समाजवादी सोच के समर्थक थे ! जो युवा भगत सिंह को अपना आदर्श मानते हैं !उन्हें भगत सिंह के द्वारा लिखित उनके विचारों का अध्ययन ,मनन और चिंतन करना चाहिए !किसी राजनेता का गुण गान नहीं करना चाहिए !भगत सिंह के समय में सभी नेताओं में देश को स्वतंत्र कराने की धुन सबार थी !बे अपने अपने तरीकों ,साधनों ,सामर्थ्य और विचारों से देश की आजादी के लिए तन मन ,धन ,और जीवन समर्पितकरने के लिए तैयार थे !जिस प्रकार मतविभिन्नता मानवीय स्वाभाव में स्वाभाविक रूप में विद्यमान होती हैं !वह उनमे भी थी !किन्तु देश की आजादी के लिए बे एकमत थे !इसीलिए युवाओं को अपना समय इस व्यर्थ विवाद में नष्ट नहीं करना चाहिए कि देश की आजादी अहिंसा से प्राप्त हुयी या हिंसा हिंसा से ? इस पर भी समय शक्ति को वर्वाद नहीं करना चाहिए कि कौन बड़ा देश भक्त था ! देश की आजादी के यज्ञ में जिन लोगों ने अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार आहुतियां डाली थी बे सभी स्मरणीय और आदर के पात्र हैं !आजादी के बाद नेताओं की दृष्टि ,और विचार ,में परिवर्तन हुआ है ! लोकतंत्र का ढांचा खड़ा हो गया है !किन्तु उसमे अभी लोकतंत्र की मूलबृत्ति उत्पन्ननही हुई है ! लोकतंत्र की मूलभावना को लोकतंत्र में स्थापित करने के लिए युवाओं को काम करनाचाहिए ! इसके लिए जो आवश्यक त्याग ,संयम ,अध्ययन अदि की आवश्यकता हो उसको प्राप्त कर अपने जीवन में उतारना चाइये !अब देश आजाद है !देश में संविधान है !और संवैधानिक व्यबस्था है !इसिलए युवाओं को संवैधानिक व्यबस्था के अंतर्गत ही लोकतंत्र की मूल भाबना के लिए कार्य करना चाहिए !अराजकता किसी भी स्थिति में स्वीकृत नहीं की जा सकती है !अराजकता से रचनाधर्मिता का नाश हो जाता है !और भारत ऐसे विशाल देश में अराजकता से हानि अधिक होगी लाभ लगभग नहीं के बराबर होगा !भगत सिंह की देश भक्ति और आजादी के लिए सहादत को ध्यान में रख कर उनकी जीवन पद्धति का अनुकरण और अनुसरण ना कर उनकी देशभक्ति से समाजनिर्माण ,और लोकतंत्र को सही रूप में स्थापित करने के लिए युवाओं को अपने स्वार्थ ,सुख प्राप्ति की भावना का त्यागकर और किसी भी राजनेता या राजनैतिक दल का अन्ध भक्त ना बनकर देश हित के लिए काम करना चाहिए !
मामला चाहे गाय बध को प्रतिबंधित करने का हो ! या योग की शिक्छा देने का
हो ! या विद्यालयों में सूर्य नमस्कार को जरुरी बनाने का हो ! इस सबको
साम्प्रदायिक दृष्टि से क्योँ देख कर विरोध किया जाता है? !दूध दही घी
मक्खन पनीर खोवा आदि जिसका प्रयोग माशाहारी शाकाहारी सभी करते हैं और
बच्चों से लेकर ब्रद्ध पुरुषों तक को स्वास्थ्य की दृष्टि से जिसकी महती
आवश्यकता है ! उसकी आवश्यकता की पूर्ति कहाँ से होगी? अगर दूध देने वाले
पशुओं को मार कर खा लिया जायेगा ?गाय के दूध की उपयोगिता स्वास्थ्य
की दृष्टि से विज्ञानं ने सिद्ध की है !इसी प्रकार योग और सूर्य नमस्कार
शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा दीर्घ जीवन प्रदान कराने वाली क्रियाएँ है
!इनको साम्प्रदायिक दृष्टि से देखने वालों को इन क्रियायों के समानांतर अगर
कोई और क्रियायों का ज्ञान हो तो उनको प्रस्तुत करना चाहिए ! बेमतलब विरोध
से बचना चाहिए !धर्मनिरपेक्छ्ता का अर्थ यह नहीं है की भारत को अपनी पूर्व
प्रचलित समाज और राष्ट्र को उन्नति चरित्र और स्वास्थ्य प्रदान करने वाली
पद्धतिओं को लागू नहीं करना चाहिए !
आजकल
धर्मनिरपेक्छ्ता के नाम पर विद्द्यार्थिओं को सूर्यनमस्कार योग आदि
विद्दायों को पढने लिखने और सीखने का विरोध मुसलमानो द्वारा किया जा
रहा है! इन दिनों विद्यार्थिओं को आधयात्मिक साहित्य नहीं पढ़ाया जाता है !
भारतीय भासाओं का सर्वोत्तम साहित्य आध्यात्मिक साहित्य है !अगर धर्म
निरपेक्छ राज्य के नाम पर वह कुल का कुल साहित्य निषिद्ध हो जाय ! तो
विद्द्यार्थिओं में नैतिकता कैसे पैदा होगी? और उनका शारीरिक और मानसिक
विकास कैसे होगा !सिखों में करीब करीब हर लड़का जपु जी को पढता है !
लेकिन इन दिनों मुसलमानो के विरोध के कारण जपु जी की तालीम स्कूलों में
नहीं दी जा सकती है ! जपु जी में कहा गया है कुल दुनिया हमारी ही जमात है !
सबके साथ समान भाव रखने की इस से बेहतर तालीम और दूसरी क्या होगी ?रामायण
कुरान गीता जपु जी कुछ भी नहीं पढ़ाया जायेगा तो विद्द्यार्थी आत्मज्ञान से
वंचित रह जाएंगे ! जो मुसलमान सूर्य नमस्कार का यह कह कर विरोध कर रहे हैं
कि इस्लाम में सूर्य नमस्कार का विधान नहीं है ! हिन्दू धर्म में भी सूर्य
को नमस्कार करने की बात नहीं कही गयी है ! किन्तु सूर्य में जो जीवन देने
वाला स्फूर्ति शक्ति और ज्ञान प्रदान करने वाला जो प्रकाश है 1 वह सूर्य का
प्रकाश नहीं है ! वह अल्लाह का प्रकाश है !भगवान कृष्णा ने गीता में
अध्याय १५ नश्लोक १२ में कहा है 1 कि सूर्य को प्राप्त हुआ जो प्रकाश और
तेज संपूर्ण संसार को प्रकाशित करता है ! और जो तेज चद्रमा में है 1 तथा
जो तेज अग्नि में है 1 यह तेज और प्रकाश परमात्मा का है !यह परमात्मा के
प्रकाश से जीवन दायिनी शक्ति राजस्थान या मध्यप्रदेश सरकार ने नहीं दी है
1यह सूर्य नमस्कार ऋषिओं के द्वारा दिया गया मानव जाति के लिए अनुपम उपहार
है 1 यदि मुस्लिम अपने बच्चों को इस अनुपम शक्ति दायी उपहार से वंचित रखना
चाहते हैं ! तो बो सूर्य नमस्कार में शामिल न हों ! किन्तु उनके लिए धर्म
निर्पेक्छ्ता के नाम पर भारतीय विद्द्यर्थिओं को भगवान के इस दिव्य
आशीर्वाद से वंचित नहीं रखा जा सकता है !
Tuesday, 22 March 2016
जल
दिवस----भारत वर्ष में अत्यंत प्राचीन काल से ब्रक्छा रोपण और तालाब
खुदवाने को पुण्य कार्य माना जाता रहा है ! महाभारत में कहा गया है कि
तालाब कुवाँ और ब्रक्छ लगाने वाला मानव दीर्घ आयु सौभाग्य तथा मृत्यु के
पश्चात शुभ गति प्राप्त कर लेता है !! इसलिए राजा लोग राज्यों में बाग
बगीचे लगाते थे ! और बड़े बड़े तालाब खुदवाते थे ! तथा जंगलों का विकास करते
थे ! परिणाम स्वरुप भारत भूमि सभी प्रकार के फलदार ब्रक्छों से भरी हुई थी 1
और तालाबों की देश में भरमार थी ! तथा नदियां पवित्र शुद्ध जलों
से लबा लब भरी रहती थी ! किन्तु स्वतंत्र भारत में बनो का इतनी तेजी से
विनाश हुआ कि जमीन की सुंदरता ही नष्ट हो गयी ! और वसंत होली आदि त्यौहार
जिनमे मौसम के कारण स्वाभाविक उमंग और मस्ती आती थी बे अब सिर्फ शब्दों में
सिमट कर रह गए हैं ! और तालाबों का तो यह हाल हो गया है कि देश के लाखों
तालाब भू मफिओं और दबंग किसानो ने नष्ट कर दिए हैं ! जंगलों का विनाश
राजनेताओं ने खुद और अपने संरक्छण में अधिकारिओं के सहयोग और मिली भगत से
किया और कराया है 1 और अभी भी जारी है ! सारी नदिओं का जल प्रदूषित हो गया
है ! जल पुरुष राजेन्द्र सिंह का कहना है कि देश में कोई नदी बची ही नहीं
है! ! वातावरण बुरी तरह प्रदूषित हो गया है ! और दुःख की बात यह है कि यह
बर्बादी नेताओं और अधिकारिओं की साजिस और सहयोग से हो रही है ! और इस
पवित्र भूमि भारत को इसके उत्तम जल स्रोतों और जंगलों का विनाश तीव्र गति
से किया जा रहा है! जल दिवस को नेता अधिकारी भू मफिओं से तालाब जल ज़मीन और
जंगल मुक्ति के रूप में मनाया जाना चाहिए ---नरोत्तम स्वामी
Sunday, 20 March 2016
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Saturday, 19 March 2016
भगतसिंघ
,राजगुरु ,सुखदेव को गांधी जी ने फांसी से नहीं बचाया -----गांधी जी पर ये
आरोप इस बार प्रेस कंसल के पूर्व चेयरमैन जस्टिस काटजू ने लगाया है ! इसके
अलावा उन्होंने और भी गलत आरोप लगाए थे जिसके लिए राजयसभा में उनके
विरुद्ध सर्व सम्मत निंदा प्रस्ताव पारित हुआ है 1 जहाँ तक भगत सिंह आदि को
फांसी से न बचाने का प्रश्न है उस सम्बन्ध में संपूर्ण गांधी वांग्मय खंड
४५ में संपूर्ण विवरण उपलब्ध है उसका संक्छेप में खुलासा किया जा रहा है!
१९ मार्च १९३१ को वायसराय इरविन से गांधी जी भेंट हुई थी उसमे गांधीजी ने
कहा था कि मेने अखबार में पढ़ा है कि भगतसिंघ आदि की फांसी की तारीख २४
मार्च घोषित की गयी है ठीक उसी दिन कांग्रेस के नए अध्यक्छ करांची पहुचेंगे
और जनता में बड़ी उत्तेजना होगी इस पर इरविन ने गांधी जी को लिखित उत्तर
भेंट वार्ता के बाद भेजा कि मेने इस मामले पर बहुत ध्यान से विचार किया है
1पर मुझे अपने मन में सजा कम करने के औचित्य का कोई ठोस आधार नहीं मिला1
जहाँ तक तारीख का सवाल है मेने कांग्रेस के अधिवेसन के समाप्त होने तक इसे
टालने की सम्भावना पर विचार किया था पर जान बुझ कर मेने उसे इसलिए रद्द कर
दिया की आदेश दे देने के बाद केवल राजनैतिक कारणों से फांसी को स्थगित करना
मुझे ठीक नहीं जंचा !बीच में भी वार्ता चली किन्तु वायसराय ने गांधी जी को
स्पष्ट शब्दोँ में बता दिया था की भगत सिंह और अन्य दो लोगों की मौत की
सजा में कोई रियायत किये जाने की सम्भावना नहीं है फिर भी गांधी जी ने २३
मार्च को वाइसराय को अंतिम पत्र लिखा था प्रिय मित्र --यद्द्पि अपने मुझे
साफ़ साफ़ बता दिया था की मौत की सजा में रियायत दिए जाने की कोई आशा नहीं है
! फिर भी आपने मेरे शनिबार के निबेदन पर विचार करने को कहा था डॉ सप्रू कल
मुझ से मिले और उन्होंने मुझे बताया की आप इस मामले में में चिन्तित है
!और आप कोई रास्ता निकालने का विचार कर रहे हैं ! यदि इस पर पुनः विचार
करने की कुछ गुंजाइश हो तो में आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूँ कि जनमत
इस सजा में रियायत चाहता है यदि सजा हलकी हो जाती है तो बहुत संभव है की
आंतरिक शांति की स्थापना में सहायता मिले यदि मौत की सजा दी गयी तो
निशन्देह शांति खतरे में पड़ जाएगी इस पर वायसराय का उत्तर था किभगत मेने
आपकी हर बात पर दुबारा बड़े गौर से विचार किया है लेकिन मुझे किसी तरह ऐसा
नहीं लगता है की आप जो अनुरोध कर रहे हैं उसे मन्ना ठीक होगा ! और २३
मार्च को ही भगत सिंह और उनके दो साथी शहीद हो गए !गांधी जी ने कहा था भगत
सिंह और उनके दो साथी फांसी पाकर शहीद हो गए हैं ऐसा लगता है मनो उनकी
मृत्यु से हजारों लोगों की निजी हानि हुई है !मेरा निश्चित मत है की सरकार
द्वारा की गयी इस गंभीर भूल के परिणाम स्वरुप स्वतत्रंता प्राप्त करने की
हमारी शक्ति में बृद्धि हुई है और उसके लिए भगत सिंह और उनके साथिओं ने
मृत्यु से भेंट की है !२६ मार्च को पत्र प्रितिनिधियों से भेंट में गांधीजी
ने कहा था की में भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में परिवर्तन
नहीं करा सका इसी कारन नवयुवक मेरे विरुद्ध अपना रोष प्रगट कर रहे हैं
यद्द्पि बे मुझ पर बहुत नाराज थे फिर भी में सोचता हूँ की उन्होंने अपने
क्रोध का प्रदर्शन बहुत ही सभ्य ढंग से किया उन्होंने गांधीवाद का नाश हो
,गांधी वापिस जाओ के नारे लगाए और में उनके क्रोध का सही प्रदर्शन मानता
हूँ में भी उनके साथ उसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न शील हूँ
!अंतर केवल इतना है की मेरा रास्ता उनसे बिलकुल अलग है और मुझे इस में तनिक
भी संदेह नहीं है की जैसे जैसे समय बीतता जायेगा बे यह समझ जायेंगे की
उनका रास्ता गलत था !देश में जहाँ करोड़ों भूखे लोग भरे पड़े हैं ,वहां हिंसा
का सिद्धांत कोई अर्थ नहीं रखता !एटीएम दमन और कायरता से भरे दब्बूपन बाले
इस देश में हमें साहस और आत्मबलिदान का आधिक्य नहीं मिल सकता है !भगत सिंह
के साहस और बलिदान के सम्मुख मस्तक नत हो जाता है !परन्तु में अपने नौजवान
भाईओं को नाराज किये बिना कह सकूँ तो मुझे इस से भी बड़े साहस के दिखने की
इक्छा है में एक ऐसा नम्र ,सभ्य ,और अहिंसक साहस चाहता हूँ जो किसी को चोट
पहुंचाए बिना अथवा मन में किसी को चोट पहुंचाने का तनिक भी विचार रखे बिना
फांसी पर झूल जाये !भगत सिंह को जीवित रहने की इक्छा नहीं थी उसने माफ़ी
मांगने से इंकार किया1अर्जी देने से इंकार किया !भगत सिंह अहिंसा का पुजारी
नहीं था ,पर वह हिंसा को धर्म भी नहीं मानता था !वह अन्य उपाय न देख कर
खून करने को तैयार हुआ था !उसका आखरी पत्र इस प्रकार का था -----में तो
लड़ते हुए गिरफ्तार हुआ हूँ !मुझे फांसी नहीं दी जासकती !मुझे तोप से उड़ा दो
,गोली से मारो !इन वीरों ने मौत के भय को जीता था !इनकी वीरता के लिए
इन्हे हजारों नमन !गांधी जी देश की आजादी और नव निर्माण के लिए भी सत्य
अहिंसा के मार्ग को ही एक मात्र उपाय के रूप में देखते और मानते थे! और
जीवन पर्यन्त उन्होंने इसी मार्ग का अनुसरण किया! और इस मार्ग का परित्याग
किसी भी परिश्थिति में नहीं किया ! इसलिए गांधी जी की सेवाओं का आकलन
करते समय किसी को भी इन्ही दो दृष्टियों को आधार मानकर उन पर टिप्पड़ी करना
चाहिए अन्यथा वह स्वयं भी भ्रमित रहेगा और लोगों को भी भ्रमित करेगा भगत
सिंह और उनके सहयोगियों की मौत की सजा माफ़ करने का प्रयत्न मदन मोहन मालवीय
और डॉ सप्रू ने भी मकिया था !
जो जज्बा और हिम्मत इस्लाम धर्म अत्यंत कट्टरता की हद तक मुसलमानो और उनके मौलवियों मुल्लों और मुफतियों को देता है !यही जज्बा और हिम्मत हिन्दुओं को भी अपने आप में उत्पन्न करना चाहिए !तब न तो उनकी दुर्दशा बांग्लादेश और पाकिस्तान में होगी और ना ही हिंदुस्तान और कश्मीर में होगी !और ना ही उनके मंदिर तोड़े जाएंगे और ना ही उनको बुजदिलों की तरह अपना धर्म परिवर्तन करना पड़ेगा और ना ही पाकिस्तान और कश्मीर से पलायन करके शरणार्थियों की तरह रहना पड़ेगा !भारत में भूमि को मात्र अचेतन जमीन का टुकड़ा नहीं माना जाता है !उसकी उपासना भगवान की तरह की जाती है ! और भारत भूमि को माता का दर्जा सनातन धर्म में दिया गया हैं !एक श्लोाक में कहा गया है !या देवी सर्वभूतेषु पर्वत स्तन मंडिले !विष्णु पत्नी नामतुभ्यम् पादस्परसम छमस्वा में !ये मौलवी और कट्टरपंथी किसी भी दूसरे धर्म की आचार सहिंता का आदर नहीं करते हैं !इसी कारण इनमे बहुत से इस्लामिक संगठन जैसे मानवता विरोधी अत्तंकवादी संगठन क्रियाशील हैं और विश्व शांति के लिए खतरा बने हुए हैं !बहुलताबाद में विश्वास रखने वाले पश्चिमी देश भी अब इनको अपने यहां प्रवेश देने में असमर्थता व्यक्त करने लगे हैं !भारत की अनादि सनातन परंपरा के येघोर विरोधी हैं !इसीलिए ये भारतमाता की जय ना बोलने वाले ओवेसी का समर्थन कर रहे हैं !और जो इंसानियत पसंद जावेद अख्तर और इस्लामिक विद्वान हैं उनका विरोध कर रहे हैं !जो मुसलमान भारत माता की जय बोले रहे हैं !उनको ये मुसलमान मान ने को तैयार नहीं हैं !जो सर्व धर्मसमावेशिक सनातन धर्म है !वह भी इन्हे कांटे की तरह गढ़ रहा है !
Wednesday, 16 March 2016
भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के स्वाभाविक गुण धर्म मन का निग्रह करना ,इन्द्रियों को बश में करना ,धर्म पालन के लिए कष्ट सहन ,बाहर भीतर से शुद्ध रहना दूसरों के अपराधों को छमा करना शरीर ,मन आदि में सरलता रखना ,वेद शाश्त्र आदि का ज्ञान होना ,यज्ञविधि को अनुभव मे लाना तथा परमात्मा का प्रत्यक्छ अनुभव करना आदि बताये हैं ! १८ ( ४२ ) इन सभी आचरणीय गुणों को जीवन में धारण करने के लिए ब्राह्मण आयु ,सत्त्वगुण ,बल ,आरोग्य ,आनंद प्रसन्नता बढ़ाने वाले ,और जीवन पर्यन्त शक्ति और सद्गुण प्रदान करने वाले और ह्रदय को शक्ति प्रदान करने वाले घी दूध सूखे मेवे और फल तथा दुर्गन्ध रहित सब्जियां और सतोगुण की बृद्धि करने वाले भोज्य पदार्थ अल्पमात्रा में संयम पूर्वक ग्रहण करते हैं १७(८) !प्याज लहसुन आदि दुर्गन्ध युक्त पदार्थ हैं ! इनसे सतोगुण का नाश होता है इसीलिए ऐसे सभी खाद्य पदार्थ जो सड़े हुए ,रस रहित ,दुर्गन्धित ,बासी ,जूठे ,और अपवित्र मांश आदि है जो हिंसा और तमोगुण उत्पन्न करते हैं शुद्ध ब्राह्मण उनको नहीं खाते हैं !जो शुद्ध ब्राह्मण है बे ऐसे तमोगुणी भोज्य पदार्थों का स्पर्श तक नहीं करते हैं !प्याज लहसुन ऐसे ही अपवित्र दुर्गन्ध युक्त भोज्य पदार्थ हैं जो शुद्ध और सतोगुणी ब्राह्मणो के लिए वर्जित हैं !
Tuesday, 15 March 2016
२७
जून २००७ को संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा में प्रतिबर्ष २ अक्टूबर को
अहिंसा का अंतर राष्ट्रीय दिवस मनाने के विषय में एक प्रस्ताव पारित किया
गया और सभी सदस्य राष्ट्रोँ संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्थाओं अशासकीय
संस्थाओं और व्यक्तिगत लोगोंको इस दिन को उपयुक्त तरीके से मनाने का आग्रह
किया जिससे हर संभव तरीके द्वारा अहिंसा का सन्देश सर्वत्र संचारित किया जा
सके! गांधी जी की मृत्यु के ६० साल के अंदर ही १३० से अधिक देशोँ ने
अपने को आज़ाद कराया तथ२० से अधिक देशोँ ने दमनकारी जातीय और फासिस्ट शशकोँ
से अहिंसक तरीकोँ से छुट कारा पाया यह सब गांधी जी के अहिसक प्रतिकार की
ही प्रेरणा से हुआ १४७ देशोँ ने गांधी जी के नाम पर डाक टिकेट जारी किये
हैं अनेक देशोँने गांधीजी के नाम की सड़कें है और बहुत से दर्शोँमे लंदन के
अलावा भी गांधी जी की मूर्तियां लगी हुई है अभी मिस्र में जो अहिंसक
क्रांति हुई है उसका प्रेरणा श्रोत भी गांधी जी को माना गया है अमेरिका के
राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था की अगर गांधीजी न होते तो मै अमेरिका का
राष्ट्र पति न होता! न्यूयॉर्क मै केनेडी एयरपोर्ट पर गांधी जी का
कैनवास पर आदमकद चित्र लगा हुआ है जिस पर गांधी जी का प्रेरक जीवन सिद्धांत
लिखा हुआ है! इस तरह के अनेको प्रसंग है !एक और बहुत बढ़ा झूठ गांधी जी के
बारे में फैलाया जारहा है जिसकी चर्चा काटजू भी कर रहे है कि गांधी जी ने
भगत सिंह राजगुरु आदि को फांसी से नहीं बचाया गांधी जी ने पूरा प्रयत्न
किया था उनकी बात ब्रिटिश हुकूमत ने नहीं मानी, इसका पूरा विवरण सम्पूर्ण
गांधी बांग्मय खंड ४५ में उपलब्ध है गांधी जी ने वाइसराय इरविन से १८ फरबरी
१९३१ को भगत सिंह की सजा को माफ़ करने की बात कही थी और कहा था कि इस से
शांति स्थापना में मदद मिलेगी वाइसराय केवल दया के आधार पर सजा घटा या
माफ़ करते हैं, राजनैतिक उद्देस्य से नहीं यह जबाब वाइसराय के सचिव ने
गांधी जी को दिया था !दिल्ली की सार्वजानिक सभा में ७ मार्च १९३१ को गांधी
जी ने कहा यदि ईश्वर ने चाहा तो भगत सिंह और दूसरे लोग फांसी के तख्ते से
लटकने से ही न बच जायेंगे बल्कि रिहा भी हो जाएंगे १९ मार्च १९३१ को
वायसराय से अपनी भेंट में गांधी जीने कहा की मेने अख़बारों में पड़ा है की
फांसी की तारीख २४ मार्च घोषित की गयी है यदि फांसी दे दी गयी तो यह
दुर्दिन ही होगा इरविन ने कहा मेने इस मामले पर बहुत ध्यान से विचार किया
है पर मुझे अपने मन में सजा कम करने के औचित्य का कोई ठोस आधार नहीं मिला
आदेश दे देने के बाद केवल राजनैतिक कारणो से फांसी को स्थगित करना भी मुझे
ठीक नहीं जंचा फिर २३ मार्च १९३१ को फिर पत्र लिखा की यद्द्पि आपने मुझे
साफ साफ बता दिया है की भगत सिंह और अन्य दो लोगोँ की मौत की सजा में कोई
रियायत किये जाने की आशा नहीं है फिर भी अपने मेरे शनिबार के निबेदन पर
विचार करने को कहा था यदि इस पर पुनः विचार करने की गुंजाइस हो तो में आपका
ध्यान निम्न बातों की और दिलाना चाहता हूँ जनमत सजा में रियायत चाहता है,
लोकमत का मान करना हमारा कर्तव्य हो जाता है यदि सजा हलकी हो जाती है तो
आंतरिक शांति की स्थापना में सहायता मिलेगी यदि मौत की सजा दी गयी तो
निशन्देह शांति खतरे में पद जाएगी मौत की सजा पर अमल हो जाने के बाद तो वह
कदम वापिस नहीं लिया जा सकता है !यदि फैसले में थोड़ी सी भी गुंजायस हो तो
में आपसे यह प्रार्थना करूँगा की इस सजा को और आगे विचार करने के लिए
स्थगित कर दें !दया कभी निष्फल नहीं जाती ----आपका मित्र --गांधी
1 गांधी जी की बात तो मानी ही नहीं गयी और भगत सिंह को २३ मार्च को फांसी दे दीगयी २९-३-३१ को गांधीजी ने अपने वक्तव्य में कहा था, सरकार ने फांसी देकर अपना पशु स्वभाव प्रगट किया है लोकमत का तिरस्कार कर सत्ता के मद का प्रदर्शन किया है इस फांसी से यह अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकार की नियत जनता को सच्ची सत्ता देने की नहीं है गांधी जी से हम असहमत हो सकते हैं किन्तु उन पर मनगढंत मिथ्या आरोप लगाने से बचना चाहिए आज भी गांधी जी पर बहुत सी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं और विश्व के अनेक देश लाभान्बित हो रहे किन्तु हम लोग गांधी जी पर अनर्गल आरोप लगाने में लगे हुए है गांधी जी ने अपने जीवन से श्रेष्ट तम त्याग और तपस्या का उदहारण प्रस्तुत किया उनको जो शक्ति प्राप्त थी बो आपकी हमारी दी हुई नहीं थी
टिप्पणीसाझा करें1 गांधी जी की बात तो मानी ही नहीं गयी और भगत सिंह को २३ मार्च को फांसी दे दीगयी २९-३-३१ को गांधीजी ने अपने वक्तव्य में कहा था, सरकार ने फांसी देकर अपना पशु स्वभाव प्रगट किया है लोकमत का तिरस्कार कर सत्ता के मद का प्रदर्शन किया है इस फांसी से यह अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकार की नियत जनता को सच्ची सत्ता देने की नहीं है गांधी जी से हम असहमत हो सकते हैं किन्तु उन पर मनगढंत मिथ्या आरोप लगाने से बचना चाहिए आज भी गांधी जी पर बहुत सी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं और विश्व के अनेक देश लाभान्बित हो रहे किन्तु हम लोग गांधी जी पर अनर्गल आरोप लगाने में लगे हुए है गांधी जी ने अपने जीवन से श्रेष्ट तम त्याग और तपस्या का उदहारण प्रस्तुत किया उनको जो शक्ति प्राप्त थी बो आपकी हमारी दी हुई नहीं थी
Monday, 14 March 2016
गांधी
जी की प्रतिमा का अनावरण आज लंदन के पार्लियामेंट स्कवायर में किया गया और
उसको महान प्रेरणा का सम्मान कहा गया भारत में भले ही गांधी जी के विषय
में अपमानजनक शब्दोँ का प्रयोग किया जाता है और उनकी विफलता का भी तथाकथित
बुद्धि जीवी बड़े मनोयोग से वर्णन करते हैं यद्द्पि गांधी जी को स्वतंत्र
भारत में कुल ५ महीने ही जीवित रहने दिया गया इसलिए वह अपने स्वप्नों के
भारत का निर्माण न ही कर सके किन्तु गांधीजी अपने जीवन काल में भी और
मृत्यु के बाद भी अहिंसक क्रांति के एक अग्र दूत बने रहे
और उन्होंने अपनी आत्मशक्ति से उस समय भी और मृत्यु के बाद भी प्रभावित
किया है और कर रहे है अल्वर्ट आयेंस्टीन ने २७ सितम्बर १९३१ में अपने पत्र
में लिखा था की आपने अपने कार्योँ से यह दिखा दिया है की बिना हिंसा के ऐसे
लोगों के विरुद्ध सफलता पाना संभव है जिन्होंने हिंसा का तरीका नहीं
त्यागा है जार्ज बर्नार्ड शा जब १९३१ में गांधी जी से मिलने आये थे तब
उन्होंने कहा था गांधी की लड़ाई अंग्रेजों के विरद्ध खलनायक की नहीं एक
अहिंसक संत का अहिंसक युद्ध है दलाई लामा ने १९८९ में नोबल पुरुष्कार ग्रहण
करते समय कहा था में इस पुरूस्कार को उस महान संत महात्मा गांधी के प्रति
श्रद्धांजलि के रूप में ग्रहण करता हूँ अन्य नोबल पुरूस्कार से सम्मानित
लोगों में जिन्होंने सार्वजानिक रूप से अपने ऊपर गांधीजी के प्रभाव को
स्वीकार किया है अफ्रीका के बिशप डेसमंड टूटू नेल्सन मंडेला अर्जेन्टीना
के अडोल्फो पेरेज आदि हैं जिन्होंने गांधीजी को मानवता के इतिहास में सबसे
महान व्यक्तिओं में से एक कहा था मदर टेरेसा वर्मा की सुई की कीनिया के
बंगारी मथई अमर्त्यसेन अमेरिका के पूर्व राष्ट्र पति जिमी कार्टर और
वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा ने नोबल शांति पुरुष्कार प्राप्त करते समय कहा था
गांधी जी की अहिंसा की नैतिक शक्ति का जीवन्त प्रमाण आपके समक्छ मै खड़ा
हूँ गांधी जी की मृत्यु के ६० साल के अंदर ही १३० से अधिक देशों ने अपने को
आजाद किया तथा २० से अधिक देशों ने दमनकारी जातीय और फासिस्ट शासकोँ से
अहिंसक तरीकोँ से छूट कारा पाया इन सबने गांधी जी के अहिंसक आंदोलन से
प्रेरणा प्राप्त की यद्द्पि गांधी जी की अहिंसक शक्ति आज भी क्रिया शील है
सिर्फ उसका प्रभाव भारत में दिखाई नहीं देता है और ना ही भारत उनको अपने
आचरण में उतारने को उत्सुक दिखाई देता है क्योँकि गांधी जी का जीवन सत्य
प्रेम त्याग शांति और अहिंसा तथा आदर्शनिष्ठ है जबकि आज भारतीय जीवन में छल
कपट रिश्वत खोरी कमीशन दलबदल हिंसा स्वार्थ असत्य साम्प्रदायिकता पद
प्राप्ति की चेस्टा सभी उचित अनुचित साधनो से संपत्ति इकट्ठी करने की प्रवल
आकांछा और आदर्शवाद की बातें और धूर्तता के काम करने की प्रवृत्ति
व्याप्त है वहां गांधीजी की कथनी करनी की एकता कहाँ टिक सकती है इसलिए
गांधी जी की महान प्रेरणा का न तो हम सम्मान कर सकते हैं और ना ही उसको
धारण कर सकते हैं नरोत्तम स्वामी सिविल लाइन्स झाँसी
महान वैज्ञानिक अल्वर्ट आयनिस्टीन सिर्फ एक वैज्ञानिक ही नहीं थे ,वे एक
आत्मशक्ति संपन्न महामानव भी थे ,बे गांधीजी के बहुत बड़े प्रसंसक थे!
उन्होंने २७ सितम्बर १९३१ को गांधीजी को पत्र में लिखा था ,श्रद्धेय श्री
गांधी , में यह पत्र आपके मित्र द्वारा भेज रहा हूँ ! आपने अपने कार्योँ से
यह दिखा दिया है की बिना हिंसा के ऐसे लोगों के विरुद्ध सफलता पाना संभव
है जिन्होंने हिंसा का तरीका नहीं त्यागा है !हम आशा कर सकते हैं कि आपका
उदाहरण आपके देश की सीमा के बाहर फैलेगा !और एक अंतर्राष्ट्रीय
आदर्श स्थापित करेगा ,जिसका सभी आदर करेंगे ,जिसके द्वारा सभी निर्णय लिए
जायेंगे तथा जो सामरिक झगड़ोँ को बिस्थापित करेगा ! गहन श्रद्धा और आदर के
साथ आपका --अायेिनस्टीन! मुझे आशा है की में एक दिन आपसे मिल सकूंगा !
गांधी जी ने इस पात्र के उत्तर में लिखा था !लंदन १८ अक्टूबर १९३१ प्रिय
मित्र , सुंदरम के हाथ आपका सुन्दर पत्र पाकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई !यह
मेरे लिए बड़ी तसल्ली की बात है कि आपकी दृष्टि में मेरा काम सराहनीय है 1
मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि में आपसे भेंट कर सकूँ और यह भी मेरे आश्रम
भारत में,----------भवदीय, एम के गांधी! गांधी जी की मृत्यु पर आइन्स्टीन
ने कहा था कि आने वाली पीढ़ियां मुश्किल से यह विश्वास करेंगी की हाड़ माष से
युक्त कोई गांधी जी जैसा व्यक्ति भी इस पृथ्वी पर था !
Sunday, 6 March 2016
आज होली है अखवार होली की बधाईओं से भरे पड़े है होली क्योँ मनाई जाती है?
इसकी शुरुआत एरच से हुई या कहीं और से हुई इसके विवेचन भी देखने को मिले
हैं किन्तु होली में प्रकृति का सहयोग नहीं है होली का सम्बन्ध प्रकृति
में होने वाले मदमस्त कर देने वाले बदलाव से जुड़ा हुआ है जब प्रकृति में
मौसम में पेड़ों में लताओं में फूलों में मस्ती उत्पन्न करनेवाला बदलाव
आता है तो ह्रदय में मस्ती और दिमाग में ताजगी और दिल दिमाग में आनन्द और
मस्ती हिलोरें लेने लगती है तब स्वाभाविक मस्ती भरे गीतों
का जन्म होता है किन्तु आज यह स्थित नहीं है बेमौसम बरसात ने ठण्ड बढ़ा दी
है और किसानो की फसल बर्वाद कर दी है किसान आत्म हत्या कर रहे है नेता
लोग बनावटी आंशु बहा रहे हैं दुकानो में मिलावटी खोबा घी आदि से निर्मित
मिठाइयां विक रही है दूध देने वाले पशु काटे जा रहे हैं उनकी संख्या घट रही
है दूध घी की खपत बढ़ गयी है और उसकी पूर्ति नकली दूध से हो रही है जिसको
पीकर बच्चे बूढ़े सभी वीमार हो रहे हैं महगाई के कारण पारम्परिक पकवान भी
सिर्फ पैसे वालों के घरों की शोभा बढ़ा रहे है होली गीत भी गाये जा रहे हैं
किन्तु यह सब प्रदूषित पर्यावरण के कारण सिर्फ शव्दों में दिखाई दे रहा है
दिल दिमाग और शरीर से इसका सम्बन्ध नहीं है होली का रंग बहिरंग है अंतरंग
नहीं है वधायी देने वालों के फ्लेक्स लगे हुए हैं बधाईओं की भरमार है काश
हम होली का सृजन प्रकृति में करते मिलावट रहित दूध घी आदि उपलब्ध करते
भ्र्ष्टाचार मुक्त जीवन जीते अपने आप को महिमा मंडित करने की विनाश कारी
वृत्ति से रहित होकर सादा समाज में घुला मिला जीवन जीने की कला का विकास
करते विकसित समाज का अंग बनने के लिए समाज द्वारा प्राप्त सामर्थ्य को
समाज हित में अर्पित करते और पर्यावरण प्रदुषण को अपने आर्थिक विकास का
माध्यम न बनाकर जल जंगल और ज़मीन को नष्ट न करते तो प्रकृति में होली का रंग
दिखाई देता और उसका उत्साह और मस्ती हम सब में भी दिखाई देती ---नरोत्तम
स्वामी सिविल लाइन्स झाँसी मोब९४५१९३७९१९
Saturday, 5 March 2016
गांधीजी ने गोल मेज परिषद में कहा था भारत के गाओं वस्त्र और भोजन में
स्वाबलंबी हमेशा से रहे हैं किन्तु गुलामी ने उनको गरीवी के गर्त में ढके ल
दिया है महाभारत में उस समय के नगरों गाओं का यथार्थ वर्णन प्रस्तुत किया
गया है आज के बिहार के मगध का राजा जरासंध था जब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन
भीम मगध राज्य की और चले तब के रास्ते में पड़ने वाले गाओं नदिओं और
तालाबों का वर्णन करते हुए व्यास ने लिखा है बे पहले पद्मसरोवर पहुंचे फिर
काल कूट पर्वत को लांघ कर गण्डकी महशोन सदानीरा आदि नदिओं को
पार् करते हुए रमणीय सरयू नदी पार करके पुर्बी कौशल प्रदेश में प्रवेश
किया फिर उन्होंने मिथिला में प्रवेश किया फिर सदा गोधन से भरे पूरे जल से
परिपूर्ण सुन्दर बृक्षों से शसोभित गोरथ पर्वत पर पहुँच कर मगध राजधानी को
देखा वहां पशुओं की अधिकता थी जल की भी सदा पूर्ण सुविधा रहती थी रोग
व्याधि से मुक्त था सुन्दर महलों से भरा पूरा यह शहर बड़ा मनोहर प्रतीत होता
था पूरे शहर के इर्द गिर्द बृक्षों के मनोहर बन थे तथा अत्यंत कठोर ब्रत
का पालन करने वाले सिद्धों यतिओं मुनिओं के आश्रम थे यह आनंद प्रद व्यबस्था
राह में पड़ने वाले गाओं नगरों में भी थी और मगध राज धानी में भी थी ऐसे
भारत के निर्माण के लिए पशुओं का बध विशेष तौर पर गो वध जल जंगल जमीन की
रक्षा का उत्तर दायित्व सभी भारतीओं का है इसी से रोग गरीवी पर्यावरण
प्रदुषण से मुक्त भारत का निर्माण होगा
धर्म भी विज्ञानं ही है दोनों में सिर्फ साधनो के उपयोग का अन्तर है धर्म
आत्मसाधना से सिद्ध होता है उसकी प्राप्ति के लिए अंतःकरण अर्थात मन बुद्धि
चित्त अहंकार को शुद्ध करना पड़ता है अन्तः करण की शुद्धि होती है सन्सार
में अनावश्यक राग और आसक्ति मुक्ति से इसकी प्राप्ति के लिए ऋषिओं ने विविध
प्रकार की साधनाएं बतायीं है जो वेद महाभारत गीता आदि ग्रंथों में लिखी
हुई है आत्मशक्ति ही प्राचीन भारत में शक्ति का केंद्र थी जिसके द्वारा
ब्रह्माश्त्र जैसे अस्त्र सुदर्शन चक्र वायुयान
आदि भौतिक पदार्थों से नहीं सिर्फ आत्मशक्ति से ही संचालित होते थे इसीलिए
इनको चलने के लिए न जमीन खोद कर पेट्रोल आदि निकलने पड़ते थे न ब्रक्छ
काटने पड़ते थे बे सब इक्छागामी थे.आधुंनिक काल में जो भौतिक पदार्थोँ से
चलने वाले यान बाहन आदि हैं उनके लिए पेट्रोल ईंधन आदि की व्यबस्था जमीन
खोद कर और ब्रिक्छ काट कर करनी पड़ती हैं और जितने भी विज्ञानं से निर्मित
साधन है चाहे बे स्वास्थ्य से सम्बंधित हों या अन्य छेत्रों से उन सब में
भौतिक सामग्री का उपयोग होता है जिस कारण से पर्यबरण प्रदूषण बढ़ रहा है और
बहुत से प्राणी बिलुप्त हो गए है बहुत सी जीवन दायिनी जड़ी बूटियां भी
बिनिष्ट हो गयी है तथा मनुष्य भी अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो रहे
हैं धर्म ही वास्तविक विज्ञानं है किन्तु आज इस को सिद्ध करने वाले लोग
नहीं है धार्मिक लोग भी ढोंग पाखंड अत्यंत भोग प्रधान जीवन जी रहे हैं
इसलिए उनमे भी आत्मशक्ति का प्रकाशन नहीं होता है इसलिए यह अत्यंत
शक्तिशाली निर्दोष आत्मशक्ति का साधन अपनी जन्मभूमि भारत में ही लुप्त होता
दिखाई दे रहा है किन्तु जिन महात्माओं ने अपने अन्तः करण को शुद्ध साधना
और ईश्वर भक्ति से किया है वहां इस आत्मशक्ति की झलक दिखयी देती है
Friday, 4 March 2016
तरुण विजय का लेख बलिदान याद रखने का फर्ज भारतीयोँ का ध्यान जम्मुकश्मीर
में होने वाले सैनिकोँ द्वारा देश की सुरक्षा के लिए कठोर कर्तव्य पालन और
जीवन बलिदान की और ध्यान अकृषित करता है तथा देश हित में जीवन बलिदान करने
वाले सैनिकों की निष्ठां पर समय समय बेतुके बेमतलब की गयी आलोचनाओ का उत्तर
भी देता है जम्मू कश्मी भारत का अभिन्न अंग है इसका ढोल १९४७ से ही पीटा
जाता रहा है किन्तु इसके बाद भी कश्मीर में भारत विरोधी गतिविधियाँ चरम
पंथिओं द्वारा लगातार होती रहती है पाकिस्तान जिंदाबाद के
नारे लगाये जाते हैं मंदिरों को तोड़ा जाता है कश्मीरी पंडितों को बेवतन कर
दिया जाता है चरम पंथी संगठनो के नेताओं से बातचीत की जाती है अलगाओ वादी
हर भारत पाक चर्चा में शामिल किये जाते हैं कश्मीर पर भारत सरकार अपने बजट
का बड़ा हिस्सा खर्च करती है कश्मीर घाटी में चर्म पंथी पूरी तरह से
पाकिस्तान के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं कोई भी कश्मीर जाने वाला
व्यक्ति यह सब देख सकता है चप्पे चप्पे पर सैनिक तैनात दिखाई देते हैं जो
कश्मीर का हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में हैं उसकी मुक्ति की चर्चा नहीं
होती है जो हिंदुस्तान का हिस्सा है वार्ता उसी पर केंद्रित रहती है यह सब
क्योँ होता है? इसका कारण सामान्य जन नहीं समझ सकता है किन्तु जब यह
सरकारी स्तर पर कहा जाता है की कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तब फिर अलगाओ
बादिओं या पाकिस्तान से इस सम्बन्ध में बात चीत क्योँ होती है? यह बात
परेशानी में आम आदमी को डालने वाली होती है ?जम्मू कश्मीर वैदिक संस्कृति
का प्रमुख केंद्र अनादि कल से रहा है यह ऋषिओं की तपस्या की भूमि रही है
इस भूमि पर अनेकों ऋषिओं के साधना स्थल और साधना केंद्र है जगद गुरु
शंकराचार्य का तपस्या स्थल वैष्णव देवी अमरनाथ आदि स्थल आज भी हिन्दुओं
के तीर्थस्थल है इसके अलावा भी हजारों प्रगट और गुप्त ऋषिओं के साधना
केंद्र है बहुत से हिन्दू मंदिर मुसलमानो ने या तो बंद करा दिए हैं उन पर
कब्ज़ा कर लिया है हिन्दू इसका प्रितििकार नहीं कर पाता है चरमपंथ दूसरे
धर्मों को विशेषतौर पर हिन्दू धर्म को स्वीकार नहीं करता है पाकिस्तान और
बांग्लादेश जो विभाजन के पहले हिंदुस्तान था आज लगभग इस्लामिस्तान बन गया
है हिन्दू आबादी वहां लगभग समाप्त होती जारही है और मंदिर भी नष्ट नाबूद हो
रहे हैं हम कुछ भी राग अलापते रहे हैं और गंगा जमुनी संस्कृति की गुण गान
करते रहें किन्तु हिन्दू मुस्लिम एकता अब भी स्वप्न ही है और इन में दंगे
आज भी होते रहते हैं अगर कश्मीर का छोटा सा भी हिस्सा पाकिस्तान को सौंपा
दिया जाता है तो यह ग़द्दारी होगी और हिन्दू संस्कृति के विनाश का एक नया
विध्वंसक कदम होगा -----नरोत्तम स्वामी जिला अध्यक्छ लोकतंत्र सेनानी समिति
झाँसी mo9451937919
Thursday, 3 March 2016
प्रथम संसद के सांसदों को वेतन नहीं मिलता था दैनिक भत्ता ३२ रुपये
प्रितिदिन मिलता था तब से अबतक लगभग १५०० गुना सुविधाओं वेतन भत्ता आदि में
बृद्धि हो चुकी है लोकतंत्र का जो स्वरुप सोचा समझा गयाथा लोकतंत्र उस से
बिलकुल विपरीत शक्ल में बदल गया है गांधी जी जब गोल मेज परिषद में हिस्सा
लेने लंदन गए थे तब उन्होंने परिषद के समक्छ इंग्लैंड के प्रधान मंत्री से
कहा था कि करोड़ों मूक भारतीयोँ की गरीबी मिटाने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता
की मांग मै कर रहा हूँ पत्रकारों ने जब उनसे पूंछा था कि आजाद
भारत में लोकतंत्र का स्वरुप क्या होगा तब उन्होंने कहा था की लोकतंत्र
में मंत्रिओं को रहने के लिए झोपड़ी दी जाएँगी उनका मासिक वेतन ४०० रुपये
प्रितिमाह होगा बे अपने गरीब देशवासिओं के वास्तविक प्रितिनिधि होंगे जब
नेहरू जी के नेत्रत्तवा में १९४६ में प्रथम मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो पूरा
मंत्रिमंडल गांधी जी से आशीर्वाद लेने सफाई कर्मचारिओं की बस्ती में गया
जहाँ बे ठहरे हुए थे चूँकि उस दिन सोमवार था और सोमवार को बोलते नहीं थे
इसलिए उन्होंने लिखित सन्देश में कहाथा मंत्रिपद पुरुष्कार नहीं है आज से
तुमने अपने गले में फांसी का फन्दा पहन लिया है जो वादे तुमने जनता से किये
थे उनको पूरा करो आदि किन्तु लोकतंत्र को यह रूप प्रदान करने के लिए गांधी
जी को जिन्दा नहीं रहने दिया गया आज देश में लोकतंत्र है बष यही प्रसंसनीय
है किन्तु यह लोकतंत्र ग्राम से लेकर जनता के हितों का पोषण करने वाला
नहीं है इस से नेताओं अधिकारिओं कॉर्पोरेट्स व्योपारिओं आदि के हितों का
पोषण हो रहा है सांसदों को २९ रुपये में भोजन का मात्र यह एक उदहारण है आगे
और बड़े संकट आम आदमिओं को झेलने पड़ सकते हैं अगर नेता वास्तव में
जनप्रितिनिधि होते तो देश की जनता की स्थिति समझ कर इतना एशबर्य पूर्ण जीवन
बेशर्मी से कभी नहीं जी सकते है दुर्भाग्य यह है कि आज राजनीति और प्रसाशन
मै ८५%से अधिक गरीब तबके के व्यक्ति है राजा महाराजा नहीं हैं किन्तु
उन्हें भी आम आदमी की चिंता नहीं है आम से खास बना यह आम आदमी उस बिलासता
को भोग रहा है जो राजाओं और धनपतिओं को भी प्राप्त नहीं हैं
कर्म योग का महत्त्व -----महाभारत में कर्मयोग के सम्बन्ध में बताया गया है
की त्रेतायुग के आरम्भ में सूर्य ने मनु को और मनु ने संपूर्ण संसार के
कल्याण के लिए आचरण औरउपदेश के द्वारा इस कर्मयोग का सम्पूर्ण जगत में
प्रचार और प्रसार किया था किन्तु समय के उल्ट फेर से यह धर्म सन्सार से
लुप्त हो गया था काल में बेग को नष्ट करने की शक्ति होती है इसलिए अच्छे
लोकहित कारी विचारों को पुनः पुनः गति देनी पड़ती है सद्विचार अविनाशी होता
है उसका कभी विनाश नहीं होता है कर्म योगी सदा ही इस कर्म रूप
धर्म को धारण करते हैं कोई भी कर्म प्रवृत्ति उसी समय तक असितत्त्व में
रहती है जब तक की उसकी क्रियाशीलता में भक्तियुक्त ज्ञानवान कर्मशील कर्म
योगी कर्म रत रहते हैं बे तदनुसार आचरण कर समाज में उसकी उपयोगता सिद्ध
करते रहते हैं जब ऐसे अस्थाबान मानवकल्याण के लिए समर्पित कर्म योगिओं का
अभाव हो जाता है तब कर्म योग की यह प्रिक्रिया लुप्त हो जाती है महाभारत
काल में भीष्म पितामह जैसे महाज्ञानी द्रोणाचार्य जैसे महान गुरु और कर्ण
जैसे महान योद्धा और शल्य जैसे महारथी आदि महान ज्ञानी गुरु और योद्धा थे
किन्तु ये सब निष्काम कर्मयोग से युक्त न हो कर अपने मोह आसक्ति राग द्वेष
मूढ़ता से युक्त होकर अधर्म को ही धर्म और अनीति को ही नीति समझ कर भीष्म
राज्य निष्ठां के रूप में कर्ण मित्र निष्ठां के रूप में द्रोणाचार्य राज्य
का बेतन भोगी होने के कारण और शल्य अतिथि सत्कार से बंधकर दुर्योधन के
अधर्म अनीति और अन्याय के समर्थन और सफलता के लिए पंडवों केऊपर थोपे हुए
युद्ध में पांडवो के विरुद्ध लड़ रहे थे परिणाम स्वरुप महाभारत का युद्ध हुआ
जिसमे भारत बर्ष की महान सैनिक शक्ति का विनाश हुआ और मात्र कौरवों और
पांडवों की सेना में ३ दुर्योधन के और ७ पांडवों के योद्धा जीवित बचे थे
इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने इस युग के लिए निष्काम कर्म की अनादि परम्परा
अर्थात अनासक्ति युक्त फलाकांछा रहित कर्तव्य कर्म रूप निष्काम कर्म धर्म
का उपदेश अर्जुन को दिया और स्वयं द्वापर युग में इस अनादि कर्मयोग के
उन्नायक बने और उन्होंने कर्म योग का उपदेश अपने आचरण और कृतत्त्व से दिया
और दुष्ट पापाचारी अधर्मी आसुरी शक्ति संपन्न व्यक्तिओं के विनाश के लिए
अर्जुन को निमित्त बनाकर धर्म की स्थापना की गीता में उपदिष्ट इसी कर्मयोग
को साधन बनाकर गांधी विनोबा रबीन्द्रनाथ टैगोर विवेकानंद लोकमान्य तिलक
आदि हज़ारों महापुरुषों ने देश की आज़ादी और लोक हित के कार्योँ को किया और
आज भी बहुत से महापुरुष और श्रेष्ठ पुरुष इसी कर्मयोग का अनुसरण कर लोक हित
के कामों में संलग्न है कर्म
Wednesday, 2 March 2016
कहनी है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से सम्भल के रहना अपनेघर में छिपे हुए गददारों से--------------------- किसी फिल्म का यह गीत कभी मेने सुना था !जिस प्रकार से देश में अच्छी और सच्ची देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति की बातें कहने वालों का एक विशाल समूह देश में उमड़ता दिखाई देता है !और उससे अधिक बड़ी संख्या में कर्मछेत्र में ऐसे ही शब्दज्ञानियों और देश में भ्रष्टाचरण और अपने निजी अत्यंत संकुचित स्वार्थों की पूर्ति में संलग्न व्यक्तियों का समूह भी दृष्टिगोचर होरहा है ! इनमे कुछ लोग वैचारिक मतभेदों के कारण आचरण रहित विरोध के स्वर व्यक्त करते देखे जाते हैं !और कुछ लोग व्यक्ति विशेष या विचारधारा विशेष कि अंधभक्ति के कारण बिना जमीनी हकिकसत के समझे अपनी अभिव्यक्ति से सही बातों का भी विरोध करते हैं बर्तमान भारत इस समय कथनी और करनी के भारी अंतर से ग्रस्त होकर भौतिक और आत्मिक दोनों प्रकार की परेशानियों को झेल रहा है !एक ओर ऐसे लोगों का बहुत बढ़ा राजनेताओं का समूह है !जो नित्यनिरन्तर लोकहित की बातें कर सत्ता प्राप्ति के लिए देश में सभी प्रकार की बेईमानियों के क्रियांबन में दिन रात लगे रहते हैं !इस से संसद से लेकर ग्राम सभा तक और नागरिक ब्योपारिक सभी संगठनो में इस राक्छ्सी बृत्ति का पूर्ण संचरण हो गया है !जिन संस्थानों में चुनाव के द्ववारा प्रितिनिधि चुने जाते हैं ऐसी एक भी संस्था नहीं है !जहाँ ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा स्वार्थ और बेईमानी की दासी बनी ना दिखाई देती हो ! दूसरी और चरित्र निर्माण करने वाली शिक्छण संस्थाएं और धार्मिक संस्थाएं हैं !वहां भी त्याग कर्तव्यनिष्ठा तपस्या ,ईश्वरभक्ति आदि की प्रेरणा दायक बातें की जाती हैं ! और उपदेश दिये जाते हैं !महापुरुषों के जीवन से शिक्छा ग्रहणकर देश भक्ति के जवानी जुमले बोले जाते हैं !किन्तु ये ऐसा उपदेशकरने वाले भोग भाव से और भोग सामग्री के उपयोग से ग्रस्त होते हैं !सदाचरण और शिक्छण जोमनुष्यमात्र को अनुशाषित और लोकहित का जीवन जीने का मार्ग प्रसश्त करते थे बे अब इन स्वार्थपोषक लोगों के लिए अन्याय युक्त और अनैतिक आचरण से भोग और एशबर्य प्राप्ति के साधन बनगए हैं !आमजनता को इन लोगों के कारण अतिशय शारीरिक और मानसिक कष्टों को झेलना पड़ रहा है !यह सब यदि इसी प्रकार अबाध गति से चलता रहा !तो भविष्य इन भोग बादी शब्द ज्ञानियों को भी और आमजनता को भारी कष्टों में डाल देगा ! ये सभी लोग बर्तमान समय में देश में गददारों को जन्म देने का काम कर रहे हैं ! इसी कर्तव्य भ्रष्टता के कारण देश की अखंडता और संवेधानिक व्यबस्था को नष्ट करने वाले ऐसे गददारों के समूह भी सक्रिय हैं ! जिसका अभी एक उदाहरण दिल्ली के एक सबसे महत्त्वपूर्ण विश्वविद्यालय में देशविरोधी नारे लगाने वाले लोगों के रूपमे सामने आया है !देश की बिरासत बहुत महान है !सिर्फ उसको शव्दों से आचरण में उतारने की आवश्यकता है !और देशबासियों में यह सामर्थ्य और शक्ति है !कि बे इस देशभक्ति को अपने आचरण में उतारभी सकते हैं ! सिर्फ हम सबको अपने स्वनिर्धारित कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करने की आवश्यकता है !और हम यह करके इन देशके गद्दारों और गद्दारी से मुक्ति पा सकते हैं !
Tuesday, 1 March 2016
आरक्छण देश की ऊर्जा को नष्ट करने का साधन बनता जा रहा है !यह स्वाबलंबन की बृत्ति को नष्ट कर युवाओं में बिना योग्यता के पद और प्रितिष्ठा प्राप्ति का साधन बन गया है !इसीलिए देश की सभी जातियां आरक्छण की मांग कर रही हैं !देश की समझ लकवाग्रस्त हो गयी है !नौकरियां सिर्फ जीविको पार्जन मात्र का साधन नहीं हैं !ना ही विधान सभा ,लोकसभा और मंत्रिपद प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिए है !इन सबके साथ जिम्मेदारी का पालन करने की आवश्यकता भी जुडी हुई है !जब नेहरूजी अपने मंत्रिमंडल के साथ दिल्ली में सफाई कर्मचारियों की कालोनी में जहाँ गांधीजी रहते थे ! उनका आशीर्वाद लेने गए थे !तब गांधीजी ने सभी मंत्रियों से कहा था कि तुम सबने काँटों का ताज पहना है !अब तुम्हारी असली परीक्छा होगी !तुम सबको प्रितिष्ठा और राग मोह से रहित होकर जनता की सेवा करनी है !आज लोग इन सभी पदों को लाभ और प्रितिष्ठा प्राप्तिका साधन मान कर इनको येन केनप्रकारेण प्राप्त करने का प्रयत्न करते है !और आरक्छण उनको सबसे सुलभ साधन मालुम पड़ता है !इसीलिए आरक्छण प्राप्ति के लिए बे हिंसा .लूट पाट और बलात्कार ऐसे जघन्य कार्य करने में झिझकते नहीं हैं !जाटों के इस हिंसक आरक्छण ने ऐसा दृश्य उपस्थित कर दिया था !जैसे देश में कोई सरकार और संविधान ही नहीं है !
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