Sunday, 6 March 2016

आज होली है अखवार होली की बधाईओं से भरे पड़े है होली क्योँ मनाई जाती है? इसकी शुरुआत एरच से हुई या कहीं और से हुई इसके विवेचन भी देखने को मिले हैं किन्तु होली में प्रकृति का सहयोग नहीं है होली का सम्बन्ध प्रकृति में होने वाले मदमस्त कर देने वाले बदलाव से जुड़ा हुआ है जब प्रकृति में मौसम में पेड़ों में लताओं में फूलों में मस्ती उत्पन्न करनेवाला बदलाव आता है तो ह्रदय में मस्ती और दिमाग में ताजगी और दिल दिमाग में आनन्द और मस्ती हिलोरें लेने लगती है तब स्वाभाविक मस्ती भरे गीतों का जन्म होता है किन्तु आज यह स्थित नहीं है बेमौसम बरसात ने ठण्ड बढ़ा दी है और किसानो की फसल बर्वाद कर दी है किसान आत्म हत्या कर रहे है नेता लोग बनावटी आंशु बहा रहे हैं दुकानो में मिलावटी खोबा घी आदि से निर्मित मिठाइयां विक रही है दूध देने वाले पशु काटे जा रहे हैं उनकी संख्या घट रही है दूध घी की खपत बढ़ गयी है और उसकी पूर्ति नकली दूध से हो रही है जिसको पीकर बच्चे बूढ़े सभी वीमार हो रहे हैं महगाई के कारण पारम्परिक पकवान भी सिर्फ पैसे वालों के घरों की शोभा बढ़ा रहे है होली गीत भी गाये जा रहे हैं किन्तु यह सब प्रदूषित पर्यावरण के कारण सिर्फ शव्दों में दिखाई दे रहा है दिल दिमाग और शरीर से इसका सम्बन्ध नहीं है होली का रंग बहिरंग है अंतरंग नहीं है वधायी देने वालों के फ्लेक्स लगे हुए हैं बधाईओं की भरमार है काश हम होली का सृजन प्रकृति में करते मिलावट रहित दूध घी आदि उपलब्ध करते भ्र्ष्टाचार मुक्त जीवन जीते अपने आप को महिमा मंडित करने की विनाश कारी वृत्ति से रहित होकर सादा समाज में घुला मिला जीवन जीने की कला का विकास करते विकसित समाज का अंग बनने के लिए समाज द्वारा प्राप्त सामर्थ्य को समाज हित में अर्पित करते और पर्यावरण प्रदुषण को अपने आर्थिक विकास का माध्यम न बनाकर जल जंगल और ज़मीन को नष्ट न करते तो प्रकृति में होली का रंग दिखाई देता और उसका उत्साह और मस्ती हम सब में भी दिखाई देती ---नरोत्तम स्वामी सिविल लाइन्स झाँसी मोब९४५१९३७९१९

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