Tuesday, 15 March 2016

२७ जून २००७ को संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा में प्रतिबर्ष २ अक्टूबर को अहिंसा का अंतर राष्ट्रीय दिवस मनाने के विषय में एक प्रस्ताव पारित किया गया और सभी सदस्य राष्ट्रोँ संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्थाओं अशासकीय संस्थाओं और व्यक्तिगत लोगोंको इस दिन को उपयुक्त तरीके से मनाने का आग्रह किया जिससे हर संभव तरीके द्वारा अहिंसा का सन्देश सर्वत्र संचारित किया जा सके! गांधी जी की मृत्यु के ६० साल के अंदर ही १३० से अधिक देशोँ ने अपने को आज़ाद कराया तथ२० से अधिक देशोँ ने दमनकारी जातीय और फासिस्ट शशकोँ से अहिंसक तरीकोँ से छुट कारा पाया यह सब गांधी जी के अहिसक प्रतिकार की ही प्रेरणा से हुआ १४७ देशोँ ने गांधी जी के नाम पर डाक टिकेट जारी किये हैं अनेक देशोँने गांधीजी के नाम की सड़कें है और बहुत से दर्शोँमे लंदन के अलावा भी गांधी जी की मूर्तियां लगी हुई है अभी मिस्र में जो अहिंसक क्रांति हुई है उसका प्रेरणा श्रोत भी गांधी जी को माना गया है अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था की अगर गांधीजी न होते तो मै अमेरिका का राष्ट्र पति न होता! न्यूयॉर्क मै केनेडी एयरपोर्ट पर गांधी जी का कैनवास पर आदमकद चित्र लगा हुआ है जिस पर गांधी जी का प्रेरक जीवन सिद्धांत लिखा हुआ है! इस तरह के अनेको प्रसंग है !एक और बहुत बढ़ा झूठ गांधी जी के बारे में फैलाया जारहा है जिसकी चर्चा काटजू भी कर रहे है कि गांधी जी ने भगत सिंह राजगुरु आदि को फांसी से नहीं बचाया गांधी जी ने पूरा प्रयत्न किया था उनकी बात ब्रिटिश हुकूमत ने नहीं मानी, इसका पूरा विवरण सम्पूर्ण गांधी बांग्मय खंड ४५ में उपलब्ध है गांधी जी ने वाइसराय इरविन से १८ फरबरी १९३१ को भगत सिंह की सजा को माफ़ करने की बात कही थी और कहा था कि इस से शांति स्थापना में मदद मिलेगी वाइसराय केवल दया के आधार पर सजा घटा या माफ़ करते हैं, राजनैतिक उद्देस्य से नहीं यह जबाब वाइसराय के सचिव ने गांधी जी को दिया था !दिल्ली की सार्वजानिक सभा में ७ मार्च १९३१ को गांधी जी ने कहा यदि ईश्वर ने चाहा तो भगत सिंह और दूसरे लोग फांसी के तख्ते से लटकने से ही न बच जायेंगे बल्कि रिहा भी हो जाएंगे १९ मार्च १९३१ को वायसराय से अपनी भेंट में गांधी जीने कहा की मेने अख़बारों में पड़ा है की फांसी की तारीख २४ मार्च घोषित की गयी है यदि फांसी दे दी गयी तो यह दुर्दिन ही होगा इरविन ने कहा मेने इस मामले पर बहुत ध्यान से विचार किया है पर मुझे अपने मन में सजा कम करने के औचित्य का कोई ठोस आधार नहीं मिला आदेश दे देने के बाद केवल राजनैतिक कारणो से फांसी को स्थगित करना भी मुझे ठीक नहीं जंचा फिर २३ मार्च १९३१ को फिर पत्र लिखा की यद्द्पि आपने मुझे साफ साफ बता दिया है की भगत सिंह और अन्य दो लोगोँ की मौत की सजा में कोई रियायत किये जाने की आशा नहीं है फिर भी अपने मेरे शनिबार के निबेदन पर विचार करने को कहा था यदि इस पर पुनः विचार करने की गुंजाइस हो तो में आपका ध्यान निम्न बातों की और दिलाना चाहता हूँ जनमत सजा में रियायत चाहता है, लोकमत का मान करना हमारा कर्तव्य हो जाता है यदि सजा हलकी हो जाती है तो आंतरिक शांति की स्थापना में सहायता मिलेगी यदि मौत की सजा दी गयी तो निशन्देह शांति खतरे में पद जाएगी मौत की सजा पर अमल हो जाने के बाद तो वह कदम वापिस नहीं लिया जा सकता है !यदि फैसले में थोड़ी सी भी गुंजायस हो तो में आपसे यह प्रार्थना करूँगा की इस सजा को और आगे विचार करने के लिए स्थगित कर दें !दया कभी निष्फल नहीं जाती ----आपका मित्र --गांधी
1 गांधी जी की बात तो मानी ही नहीं गयी और भगत सिंह को २३ मार्च को फांसी दे दीगयी २९-३-३१ को गांधीजी ने अपने वक्तव्य में कहा था, सरकार ने फांसी देकर अपना पशु स्वभाव प्रगट किया है लोकमत का तिरस्कार कर सत्ता के मद का प्रदर्शन किया है इस फांसी से यह अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकार की नियत जनता को सच्ची सत्ता देने की नहीं है गांधी जी से हम असहमत हो सकते हैं किन्तु उन पर मनगढंत मिथ्या आरोप लगाने से बचना चाहिए आज भी गांधी जी पर बहुत सी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं और विश्व के अनेक देश लाभान्बित हो रहे किन्तु हम लोग गांधी जी पर अनर्गल आरोप लगाने में लगे हुए है गांधी जी ने अपने जीवन से श्रेष्ट तम त्याग और तपस्या का उदहारण प्रस्तुत किया उनको जो शक्ति प्राप्त थी बो आपकी हमारी दी हुई नहीं थी
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