Saturday, 5 March 2016

धर्म भी विज्ञानं ही है दोनों में सिर्फ साधनो के उपयोग का अन्तर है धर्म आत्मसाधना से सिद्ध होता है उसकी प्राप्ति के लिए अंतःकरण अर्थात मन बुद्धि चित्त अहंकार को शुद्ध करना पड़ता है अन्तः करण की शुद्धि होती है सन्सार में अनावश्यक राग और आसक्ति मुक्ति से इसकी प्राप्ति के लिए ऋषिओं ने विविध प्रकार की साधनाएं बतायीं है जो वेद महाभारत गीता आदि ग्रंथों में लिखी हुई है आत्मशक्ति ही प्राचीन भारत में शक्ति का केंद्र थी जिसके द्वारा ब्रह्माश्त्र जैसे अस्त्र सुदर्शन चक्र वायुयान आदि भौतिक पदार्थों से नहीं सिर्फ आत्मशक्ति से ही संचालित होते थे इसीलिए इनको चलने के लिए न जमीन खोद कर पेट्रोल आदि निकलने पड़ते थे न ब्रक्छ काटने पड़ते थे बे सब इक्छागामी थे.आधुंनिक काल में जो भौतिक पदार्थोँ से चलने वाले यान बाहन आदि हैं उनके लिए पेट्रोल ईंधन आदि की व्यबस्था जमीन खोद कर और ब्रिक्छ काट कर करनी पड़ती हैं और जितने भी विज्ञानं से निर्मित साधन है चाहे बे स्वास्थ्य से सम्बंधित हों या अन्य छेत्रों से उन सब में भौतिक सामग्री का उपयोग होता है जिस कारण से पर्यबरण प्रदूषण बढ़ रहा है और बहुत से प्राणी बिलुप्त हो गए है बहुत सी जीवन दायिनी जड़ी बूटियां भी बिनिष्ट हो गयी है तथा मनुष्य भी अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो रहे हैं धर्म ही वास्तविक विज्ञानं है किन्तु आज इस को सिद्ध करने वाले लोग नहीं है धार्मिक लोग भी ढोंग पाखंड अत्यंत भोग प्रधान जीवन जी रहे हैं इसलिए उनमे भी आत्मशक्ति का प्रकाशन नहीं होता है इसलिए यह अत्यंत शक्तिशाली निर्दोष आत्मशक्ति का साधन अपनी जन्मभूमि भारत में ही लुप्त होता दिखाई दे रहा है किन्तु जिन महात्माओं ने अपने अन्तः करण को शुद्ध साधना और ईश्वर भक्ति से किया है वहां इस आत्मशक्ति की झलक दिखयी देती है

No comments:

Post a Comment