कर्म योग का महत्त्व -----महाभारत में कर्मयोग के सम्बन्ध में बताया गया है
की त्रेतायुग के आरम्भ में सूर्य ने मनु को और मनु ने संपूर्ण संसार के
कल्याण के लिए आचरण औरउपदेश के द्वारा इस कर्मयोग का सम्पूर्ण जगत में
प्रचार और प्रसार किया था किन्तु समय के उल्ट फेर से यह धर्म सन्सार से
लुप्त हो गया था काल में बेग को नष्ट करने की शक्ति होती है इसलिए अच्छे
लोकहित कारी विचारों को पुनः पुनः गति देनी पड़ती है सद्विचार अविनाशी होता
है उसका कभी विनाश नहीं होता है कर्म योगी सदा ही इस कर्म रूप
धर्म को धारण करते हैं कोई भी कर्म प्रवृत्ति उसी समय तक असितत्त्व में
रहती है जब तक की उसकी क्रियाशीलता में भक्तियुक्त ज्ञानवान कर्मशील कर्म
योगी कर्म रत रहते हैं बे तदनुसार आचरण कर समाज में उसकी उपयोगता सिद्ध
करते रहते हैं जब ऐसे अस्थाबान मानवकल्याण के लिए समर्पित कर्म योगिओं का
अभाव हो जाता है तब कर्म योग की यह प्रिक्रिया लुप्त हो जाती है महाभारत
काल में भीष्म पितामह जैसे महाज्ञानी द्रोणाचार्य जैसे महान गुरु और कर्ण
जैसे महान योद्धा और शल्य जैसे महारथी आदि महान ज्ञानी गुरु और योद्धा थे
किन्तु ये सब निष्काम कर्मयोग से युक्त न हो कर अपने मोह आसक्ति राग द्वेष
मूढ़ता से युक्त होकर अधर्म को ही धर्म और अनीति को ही नीति समझ कर भीष्म
राज्य निष्ठां के रूप में कर्ण मित्र निष्ठां के रूप में द्रोणाचार्य राज्य
का बेतन भोगी होने के कारण और शल्य अतिथि सत्कार से बंधकर दुर्योधन के
अधर्म अनीति और अन्याय के समर्थन और सफलता के लिए पंडवों केऊपर थोपे हुए
युद्ध में पांडवो के विरुद्ध लड़ रहे थे परिणाम स्वरुप महाभारत का युद्ध हुआ
जिसमे भारत बर्ष की महान सैनिक शक्ति का विनाश हुआ और मात्र कौरवों और
पांडवों की सेना में ३ दुर्योधन के और ७ पांडवों के योद्धा जीवित बचे थे
इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने इस युग के लिए निष्काम कर्म की अनादि परम्परा
अर्थात अनासक्ति युक्त फलाकांछा रहित कर्तव्य कर्म रूप निष्काम कर्म धर्म
का उपदेश अर्जुन को दिया और स्वयं द्वापर युग में इस अनादि कर्मयोग के
उन्नायक बने और उन्होंने कर्म योग का उपदेश अपने आचरण और कृतत्त्व से दिया
और दुष्ट पापाचारी अधर्मी आसुरी शक्ति संपन्न व्यक्तिओं के विनाश के लिए
अर्जुन को निमित्त बनाकर धर्म की स्थापना की गीता में उपदिष्ट इसी कर्मयोग
को साधन बनाकर गांधी विनोबा रबीन्द्रनाथ टैगोर विवेकानंद लोकमान्य तिलक
आदि हज़ारों महापुरुषों ने देश की आज़ादी और लोक हित के कार्योँ को किया और
आज भी बहुत से महापुरुष और श्रेष्ठ पुरुष इसी कर्मयोग का अनुसरण कर लोक हित
के कामों में संलग्न है कर्म
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