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सनातन धर्म
का विधिबत ज्ञान स्वतंत्र भारत में नहीं कराया गया !परिणाम स्वरुप आज सनातन
धर्म के मूल तत्त्व से अधिकाँश बृद्ध और प्रौढ़ तथा युवा भी अनिभिज्ञ हैं
!इसीलिए भारत में ऐसी पीढ़ियां निर्मित हो रही हैं !जो शरीर से भारत बासी
है किन्तु दिल दिमाग से बे भारतीय संस्कृति के मूल तत्व से अनभिज्ञ होने के
कारण कुछ मास्कोबासी है !तो कुछ पश्चिमी देशों के बासी हैं !बे नाम से
सनातन धर्मी हैं !उनके जन्म मरण विवाह आदि के संस्कार तो धार्मिक पद्धति से
होते हैं !किन्तु उनके कर्म में धर्म नहीं होता है !जिनका दिल दिमाग सनातन
धर्मी होता है !वह इन आई टी आई की उच्च शिक्छा प्राप्त व्यक्ति की तरह
जीवन का वास्तविक अर्थ सांसारिक आसक्तियों से निब्रत्त होकर सन्यस्त हो
जाता है !इन्ही लोगों से विवेकानंद ,रामकृष्ण परम हंस ,समर्थ रामदास
,महर्षि रमण आचार्य विनोबा भावे ऐसे ज्ञात अज्ञात ऋषियों महर्षियों की
उज्जवल त्यागमयी परम्परा संरक्छित और सुरक्छित रहती है !जब व्यक्ति की
चेतना में वास्तविक आत्मतत्त्व को प्राप्त करने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न
हो जाती है !तो सांसारिक वैभव उसके पास से उसी प्रकार छिटक कर दूर हो जाते
हैं !जैसे अग्नि से तपाया हुआ लोह पिंड अपने आप हाथ से छूट कर गिर जाता है !
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