Wednesday, 30 March 2016

भारत की संस्कृति त्याग की और सर्वसमावेशी अनादिकाल से रही है -----------विनोबा जी ने लिखा है की भारत की भूमि की महिमा इसीलिए गायी गयी है क्योंकि   यह त्याग भूमि है ! बहुत से इतिहासकार यह कहते हैं कि इस त्याग बृत्ति के कारण ही भारत को बहुत नुक्सान भूत काल में उठाना पड़ा है ! यदि भोग बृत्ति होती तो लोग ज्यादा पुरुषार्थ करते और बिधर्मियो के षड्यंत्र और छल कपट के शिकार नहीं होते ! और भारत को इतनी लम्बी गुलामी को भी नहीं भुगतना पड़ता  ! और ना ही भारत में इतना धर्म परिवर्तन होता ! और ना ही भारत की वैदिक धर्म संस्कृति का व्यापक विनाश होता ! किन्तु विनोबा जी का कथन है कि हम बिलकुल इसका उलटा मानते हैं ! हम मानते हैं कि हजारों साल से हजारों जातियां भारत में आकर समाती रहीं उन सबके परिणाम स्वरुप भारत में जो जीवन बना  ,उस से भारतीय समाज टिका रहा यह त्याग के कारण ही संभव हो सका  ! भारत की संस्कृति आरण्यक संस्कृति है इसका अर्थ है -----त्याग प्रधान संस्कृति  ! सारे संसार में यह भावना है कि मानव आत्मा एक ही है ! किन्तु भारत में इस विचार का क्रियान्वन और पोषण ऋषियों मुनियों द्वारा हुआ और राजाओं ने भी इसको संरक्छण दिया  ! गीता में भी भगवान् श्री कृष्ण ने कहा कि जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण अनेकों प्राणियों में विभाग रहित एक ही आत्मा को देखता है वही श्रेष्ठ ज्ञान है १८(२०) ! इसीलिए भारत में त्याग और वैराग्य की भावना और सर्वधर्म सम्भाव की भावना विश्व के अन्य देशों से अधिक दिखती है ! विनोबा जी ने एक उदाहरण देकर समझाया है ! कि एक बार चर्चा चली कि भारत की संस्कृति ग्रामीण कही जायेगी या नगरीय ?तब रवींद्र नाथ ने कहा था कि भारत की संस्कृति न ग्रामीण है और ना नगरीय वह आरण्यक है ! घने जंगलों के मध्य भारतीय संस्कृति फली फूली फली और विकसित हुई है ! भारत के धर्मग्रन्थ भी जंगलों में ही लिखे गए हैं ! भारत का  प्रत्येक मनुष्य चार आश्रणों का पालन निष्ठां पूर्वक करता था ! मनुष्यो की १०० वर्ष की आयु को चार भागों में विभाजित किया गया था ! २५ साल कि आयु  तक ब्रह्मचर्य की साधना के साथ विद्या का अध्ययन और ज्ञान अर्जन !  २६ साल से ५० बर्ष तक वैवाहिक और ग्रहस्थ जीवन ! तत्पश्चात ५० से ७५ साल तक वानप्रस्थ और ७५ से १०० बर्ष कि आयु  सन्यास का जीवन भारतीय जीते थे राजा महाराजा  भी राज्य त्यागकर बन में प्रस्थान कर अंतिम जीवन भोग विलास से मुक्त होकर सन्यासी का जीवन जीते हुए कठोर साधना कर देह त्याग करते थे ! रवींद्र नाथ ने कहा है भारत की संस्कृति आरण्यक संस्कृति है  !गांधीवादी कहते है कि भारत की संस्कृति ग्रामीण संस्कृति है ! और आजकल लोग कहरहे हैं कि हमारी संस्कृति शहरी संस्कृति हैं ! इसीलिए दिल्ली को पेरिस बनाया जा रहा है ! स्मार्ट सिटीज का निर्माण किया जा रहा है ! और ग्रामीण संस्कृति का विनाश किया जा रहा है ! किन्तु भारत का सर्वश्रेष्ठ तत्त्व ज्ञान जंगल में ही लिखा गया और विकसित हुआ था ! पाणिनि ने व्याकरण शिष्यों को जंगल में ही सिखाया ! बादरायण ने ब्रह्मसूत्र जंगल में हे लिखे ! हमारे संपूर्ण प्राचीन और अर्वाचीन ऋषियों ने ततवज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्तिजंगलों में ही तपस्या करके प्राप्त की ! सभी  ऋषियों के आश्रम भी जंगल में होते थे जहाँ से आत्मज्ञान का अविरल प्रवाह होता था !आश्रम किसी धनवान  या राजा महाराजा के धन से नहीं चलाये जाते थे !बे पूरीतरह स्वाबलम्बी और आत्मनिर्भर होते थे !त्याग और तपस्या का रूप और स्वरुप उन आश्रमों में दृष्टिगत होता था !

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