Sunday, 27 March 2016

दुर्लभं भारते जन्म -------------हमारा यह भारत देश परम पवित्र है ! ऐसा हमारे सभी धर्म ग्रन्थ बताते हैं और इस पवित्र भूमि में तपस्या और साधना से सिद्धि प्राप्त ऋषियों ने भी यही बात कही है ! यहां की मिटटी के कण कण में और यहां  की हवा के अणु परिमाण में अनिवरचनीय आनंद और चमत्कार भरा हुआ है ! जिसका अनुभव अन्य देशों की भूमिमे नहीं होता है ! इस देश के निवासियों के चेहरों में और पशु पक्छियों अदि में जिस सौंदर्या ,पवित्रता माधुर्य और गाम्भीर्य का दर्शन होता है उसे देखते रहने के लिए इस भारत भूमि में जन्म लेने के लिए सभी जीव जन्तु लालायित रहते हैं ! भारत में ही सर्वप्रथम मानव धर्म का उदय हुआ और यहीं ऐसे राज्य धर्मका प्रचलन हुआ कि यहाँ के राजा भी ऋषितुल्य व्योहार करते थे और राजऋषि कहलाते थे ! सदाचार की उत्तम करुणा   और अहिंसा प्रधान जीवनचर्या का अनुपालन इस देश की भूमि पर अनादि काल से होता रहा है ! महाराज शान्तुन के राज्य में इस देश में पशु पकछियों तक का बध नहीं होता था ! इस देश में अहिंसा का प्रारम्भ खेती से हुआ ! खेती में बहुत महान आध्यात्मिक रहस्य छिप हुआ है ! जमीन में दोचार डेन बोकर सहस्त्रों दाने प्राप्त करना यह खेती से ही संभव हुआ और यहीं से मानवों के जीवन में अहिंसा का प्रवेश हुआ ! इसके बाद गो दुग्ध की महिमा ,भगवान् श्री कृष्ण की गो सेवा, कपडे के लिए कपास की खोज, ज्ञानार्जन के लिए समर्पण, तपस्या और दैविक शक्ति की प्राप्ति के लिए राज्य त्याग और सुख वैभव को छोड़कर त्यागमय कठोर जीवन जीने की परम्परा, शौर्य धैर्य प्रजा रकछन  का छत्री  धर्म शिक्छा पर राज्य सत्ता का अनियंत्रण आश्रमव्यबस्था , सन्यासियों के त्रिदण्ड, .भक्ति मार्ग ,अहिंसक यज्ञ, महीवीर और बुद्ध के समाज सुधार, ग्राम पंचायतों का निर्माण ,,सभी देशों में आवागमन ,किसी भी देश पर अनाक्रमण ना करना और सभी देशों से मैत्री भाव की भावना का विकास ,सभी धर्मों का समान आदर  और अनगनित चैतन्य लहरें इस भारत भूमि में उत्पान्न हुई और विकसित हुई ! तुलसीदास ने कहा है भलि भारत भूमि .भले कुल जन्म  ! यहां की चप्पा चप्पा भूमिपर संतों के चरण पड़े हैं ! कन्याकुमारी से कैलाश तक अशंख्या   सत्पुरुषों ने इस भूमि को अपने चरणों से पवित्र किया है ! जिसने भारत भूमि में जन्म पाया और भगवान् का गुण गाया  वह धन्य है ! इसकी धूलि में पड़े हुए कीड़े मकोड़े भेी संतों के चरणों के स्पर्श से पवित्र होकर धन्य हो गए  ! ५०० साल पूर्व गुजरात की भूमि में जन्मे नरसी मेहता और असम में जन्मे शंकर देव और माधव देव ने भी भारत भूमि का गुण गान किया है !बे समकालीन थे ! परन्तु  ना तो बे एक दूसरे की भाषा जानते थे और ना एक दूसरे को पहचानते थे ! लेकिन दोनों ने ही कहा भारत हमारी पुण्यभूमि है और हमने इसमें जन्म पाया है इसीलिए हम धन्य हैं ! रामायण हिमालय से कन्याकुमारी तक सम्बन्ध जोड़ती है और महाभारत द्वारिका से असम तक इस तरह भारत की पूर्व पश्चिम और उत्तर दक्छिन की एकता सर्व मान्य है  !

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