भारत पर है विश्व को ज्ञान प्रदान करने की जिम्मेदारी ---------- आचार्य विनोबा भावे ने भारत का अर्थ करते हुए कहा है कि इस देश को भारत खण्ड कहते हैं इसका अर्थ होता है सबका भरण पोषण करने वाला ! अब हम स्वतंत्र है और हमारे पास अवसर है कि हम सारे विश्व का ज्ञान भरण करें ! लम्बे संघर्ष के बाद भारत स्वतंत्र हुआ है ! इसीलिए अब हमारी बुद्धि भी स्वतंत्र होनी चाहिए ! और सम्पूर्ण विश्व का निश्चित अचूक और सम्यक मार्गदर्शन भारत को करना चाहिए ! इतनी ऊंची उड़ान भारत को भरना चाहिए !अपने पूर्वजों के द्वारा दी गयी विरासत का हम स्मरण तो करें लेकिन उसका अभिमान ना करें ! वेद विश्व मानव की बात करता है ! पृथ्वी के सब मनुष्यों का एक परिवार है यह कहते हुए कहा है वसुधैव कुटुंबकम कुटुंब नहीं कुटुकम्बकम कहा ,मतलब छोटा कुटुम्ब ! पृथ्वी के अलावा जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है वह सम्पूर्ण मिलकर पूर्ण कुटम्ब होगा ! इसीलिए संसार छोटा कुटुंब है ! इस प्रकार की एक व्यापक दृष्टि हमारे दिव्यदृष्टि संपन्न ऋषियों ने हमें दी है ! इस देश की दृष्टि कभी विस्तार वादी नहीं रही ! यहाँ दुनिया के सभी लोगों और धर्मों का प्रवेश हुआ ! सर्व रक्छन् की दृष्टि यहाँ हमेशा विदयमान रही है ! गीता में श्री कृष्ण ने कहा है परस्पर भावयन्तः -------यह दृष्टि मनुष्यों के साथ पशु पकछियों के साथ भी रही ! भारत की दृष्टि अनादि काल से सर्वसमवेशिक रही है ! गांधी जी के साथी मिस्टर एंड्रूज कहते थे कि गिलहरी जैसे भारत में अहिंसक ,मांस भक्छन् ना करने वाले भारतीयों के पास आकर फुदकने लगाती है ! वैसे मांश भकछी लोगों के पास नहीं आती है ! लोकमान्य तिलक जब मंडाले में जेल में सजा काट रहे थे ! तब चिड़ियाँ आकर उनके कन्धों और सर पर बैठ जाती थी और उनके आस पास फुदकती रहती थी ! यह देख कर जेल के अधीकछक ने उनसे कहा कि ये चिड़ियाँ हमारे आते ही क्यों उड़ जाती हैं और आपके पास फुदकती रहती हैं ! लोकमान्य ने उत्तर दिया में इन चिड़ियों को खिलाता हूँ और आप इनको खाते हैं इसिलए बे आपसे दूर भागती हैं ! भारत में नाग की भी पूजा होती है ! भारत के महासागर में संसार भर की नदियां मिली है ! इसीलिए भारत के अनादि ग्रन्थ ऋग्वेद में विश्व मानुष शव्द आया है ! यह शव्द ऋषियों को इसीलिए सुझा की हम संकुचित नहीं हैं परम व्यापक हैं ! इसी को भारतीय दर्शन कहते हैं इसके अनुसार आचरण और जीवन बनाने में चाहे जितना समय लगे ,चाहे युग बीत जाएँ लेकिन भारतीय दर्शन तो यही रहेगा ! भारत के रोम रोम में समन्वय समाया हुआ है ! भारत दुनिया के लिए एक आदर्श है ! भारत की धर्म संस्कृति वैश्वानर संस्कृति है ! दुनिया में जितनी विविधता है वह सारी भारत में है भारत छोटे रूप एक विश्व ही है ! भारत की संस्कृति सबको अपने में समा लेने वाली संस्कृति है ! इसलिए भारत का राष्ट्रवाद अंतर राष्ट्रवाद जैसा है ! भारत विश्व राष्ट्रवादी है ! भारत वासियों को विश्व व्यापक होने के लिए अहिंसा शक्ति का निर्माण करना चाहिए !भारत हिंसक शक्ति का अग्रदूत ना कभी रहा है और ना होगा ! भारत वासियों पर यह बहुत बड़ा उत्तरदायित्तव है कि बे हिंसा का अति सीमित उपयोग हिंसक आक्रमणों के प्रतिरोध के लिए ही करें ! किन्तु भारत में रहने वाले सभी धर्म हिंसा को दिल दिमाग और कर्म से त्यागकर विश्व के सामने क्रियाशील अहिंसक ज्ञान का उदाहरण प्रस्तुत करें यही भारत भूमि की ऋषि प्रणीत विरासत है ! और इसी विरासत के हम उत्तराधिकारी हैं ! और इसका पालन करने की हमारी जिम्मेदारी है ! सम्पूर्ण विश्व को हिंसा मुक्त करने का ज्ञान सिर्फ भारत की वैदिक और श्रमण संस्कृति के पास ही सुरक्छित और संरकछित है !
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