Tuesday, 29 March 2016

भारत में सभी धर्मों का स्वागत हुआ --------ईसा के ७०,८० साल बाद संत टामस केरल में आये उनका प्रेम से स्वागत हुआ ! बे माता मेर्री को भी साथ लाये भारतीयों ने माता मेर्री का पार्वती के रूप  में समझा ! फिर मुसलमान आये बे एक नयी धर्म संस्कृति लेकर आये ! राजाओं के आने के पहले उनके फ़कीर आये थे  !उनके साथ समाजिक समानता की बात आई  ! तेरह सौ साल पहले ईरान से पारसी आये उन्हेंभी भारत ने प्रेम से आश्रय दिया ! इसी तरह भारत में यहूदी भी आये मुंबई की और जो यहूदी आये उन्हें बनी इजराइल कहते हैं ! उनके पहले ग्रीक भी आये थे उन्हें यवन कहते हैं ! मुग़ल आये ! चीनी  भी आये,! जीयो और जीने दो इस आधार पर ये सारे अलग अलग धर्म भारत में रहे ! इस तरह से  सेकंडों जमाते भारत में आश्रय पाकर रह रहीं हैं ! तिब्बत  से लोग चीन के डर से भाग कर आये हैं बे भी भारत में बस गए हैं ! भारत का अर्थ ही बन गया है सबका भरण पोषण करने वाल देश ! भारत ने कभी किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया ! जिस वक्त भारत में शक्तिशाली राजा  और सम्राट थे ! विद्या, अध्यात्म शिल्प कला धन सम्प्सत्ति और ऐश्वर्य के शिखर पर शक्ति संपन्न भारत था तब भी भारत के द्वारा किसी दूसरे देश पर आक्रमण करने का एक भी उदाहरण नहीं है !मै सब संसार की तरफ मित्रता की निगाह से देखूं ताकि संसार भी  मित्रता की दृष्टि से हमारी तरफ देखे यह सन्देश भारत को वेदों ने दिया है ! उसी को भगवान् बुद्ध ने अपने जीवन में प्रगट किया ! सच्चे भारतका दर्शन गावो में  बस्ता है और वहीं उसका  दर्शन भी होता है ! किन्तु अब उसका भी विनाश शहरीकरण के कारण हो रहा है ! गाओं का शोषण हो रहा है ! और कृषि का विनाश हो रहा है ! शहरीकरण के कारण एकलाख से अधिक गाओं समाप्त हो चुके हैं ! और गाओं के विनाश का  यह सिलसिला अभी भी जारी है ! भारत से विद्या और धर्म का सन्देश लेकर जो भारतीय चीन, जापान  ,लंका ,तिब्बत  ब्रह्मदेश ,और मध्य एशिया  में गए बे अपने साथ तलबार या कोई अस्त्र ,शस्त्र  लेकर नहीं गए थे ! बे केवल ज्ञान प्रसार के लिए गउे थे !  कुछ व्योपारी भी व्यापार करने  के लिए  गए थे ! भारत अपनी सत्ता दूसरे देश पर चलाना तो चाहत ही नहीं था परन्तु उसने कभी वैचारिक हमला  भी दूसरे देशों की धर्म संस्कृति परम्परा पर नहीं  किया और ना ही बलात .लोभ .लालच और भय से धर्म परिवर्तन कराया हे ! केवल विचार  समझाकर ही संतोष रखा ! भारत की यह खूबी हमारे लिए बहुत गौरव की बात है ! प्राचीन काल में भारत के लोग दूर दूर तक यात्रा किया करते  थे  !जिस तरह से विदेशी लोग भारत में आये  उसीप्रकार से भारतीय भी विदेशों की यात्रा करते थे ! किन्तु बे विदेशों से भारत में आने वालों की तरह विदेशों में बसते  नहीं थे ! विश्व में भारत जैसी पवित्र सुख दायक भूमि कहीं भी नहीं है ! और ना ही किसी देश ने भूमि को माता का दर्जा दिया गया  है ! और ना ही भूमि की माता की तरह पूजा की है ! भगवान् श्री राम जब लंका में रावण  का बध करके लौटते हैं तब बे अपने भाई लकछमन से   कहते हैं कि यद्द्पि लंका स्वरणमयी है किन्तु वह मुझे रुचिकर नहीं लगती है मुझे तो अपनी जन्म भूमि ही प्रिय है जो स्वर्ग से भी अधिक आनंद दयाक,महान  और सुख कर है ! भारत की वैदिक सनातन परंपरा में भूमि को सर्वोत्कृष्ट पूज्यनीय माँ का दर्जा प्रदान किया गया है इसीलिए इसे भारत माता कहते है ! गांधी जी भी  अपने पत्रों में वन्दे मातरम् लिखते थे !

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