प्रथम संसद के सांसदों को वेतन नहीं मिलता था दैनिक भत्ता ३२ रुपये
प्रितिदिन मिलता था तब से अबतक लगभग १५०० गुना सुविधाओं वेतन भत्ता आदि में
बृद्धि हो चुकी है लोकतंत्र का जो स्वरुप सोचा समझा गयाथा लोकतंत्र उस से
बिलकुल विपरीत शक्ल में बदल गया है गांधी जी जब गोल मेज परिषद में हिस्सा
लेने लंदन गए थे तब उन्होंने परिषद के समक्छ इंग्लैंड के प्रधान मंत्री से
कहा था कि करोड़ों मूक भारतीयोँ की गरीबी मिटाने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता
की मांग मै कर रहा हूँ पत्रकारों ने जब उनसे पूंछा था कि आजाद
भारत में लोकतंत्र का स्वरुप क्या होगा तब उन्होंने कहा था की लोकतंत्र
में मंत्रिओं को रहने के लिए झोपड़ी दी जाएँगी उनका मासिक वेतन ४०० रुपये
प्रितिमाह होगा बे अपने गरीब देशवासिओं के वास्तविक प्रितिनिधि होंगे जब
नेहरू जी के नेत्रत्तवा में १९४६ में प्रथम मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो पूरा
मंत्रिमंडल गांधी जी से आशीर्वाद लेने सफाई कर्मचारिओं की बस्ती में गया
जहाँ बे ठहरे हुए थे चूँकि उस दिन सोमवार था और सोमवार को बोलते नहीं थे
इसलिए उन्होंने लिखित सन्देश में कहाथा मंत्रिपद पुरुष्कार नहीं है आज से
तुमने अपने गले में फांसी का फन्दा पहन लिया है जो वादे तुमने जनता से किये
थे उनको पूरा करो आदि किन्तु लोकतंत्र को यह रूप प्रदान करने के लिए गांधी
जी को जिन्दा नहीं रहने दिया गया आज देश में लोकतंत्र है बष यही प्रसंसनीय
है किन्तु यह लोकतंत्र ग्राम से लेकर जनता के हितों का पोषण करने वाला
नहीं है इस से नेताओं अधिकारिओं कॉर्पोरेट्स व्योपारिओं आदि के हितों का
पोषण हो रहा है सांसदों को २९ रुपये में भोजन का मात्र यह एक उदहारण है आगे
और बड़े संकट आम आदमिओं को झेलने पड़ सकते हैं अगर नेता वास्तव में
जनप्रितिनिधि होते तो देश की जनता की स्थिति समझ कर इतना एशबर्य पूर्ण जीवन
बेशर्मी से कभी नहीं जी सकते है दुर्भाग्य यह है कि आज राजनीति और प्रसाशन
मै ८५%से अधिक गरीब तबके के व्यक्ति है राजा महाराजा नहीं हैं किन्तु
उन्हें भी आम आदमी की चिंता नहीं है आम से खास बना यह आम आदमी उस बिलासता
को भोग रहा है जो राजाओं और धनपतिओं को भी प्राप्त नहीं हैं
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