Saturday, 19 March 2016

भगतसिंघ ,राजगुरु ,सुखदेव को गांधी जी ने फांसी से नहीं बचाया -----गांधी जी पर ये आरोप इस बार प्रेस कंसल के पूर्व चेयरमैन जस्टिस काटजू ने लगाया है ! इसके अलावा उन्होंने और भी गलत आरोप लगाए थे जिसके लिए राजयसभा में उनके विरुद्ध सर्व सम्मत निंदा प्रस्ताव पारित हुआ है 1 जहाँ तक भगत सिंह आदि को फांसी से न बचाने का प्रश्न है उस सम्बन्ध में संपूर्ण गांधी वांग्मय खंड ४५ में संपूर्ण विवरण उपलब्ध है उसका संक्छेप में खुलासा किया जा रहा है! १९ मार्च १९३१ को वायसराय इरविन से गांधी जी भेंट हुई थी उसमे गांधीजी ने कहा था कि मेने अखबार में पढ़ा है कि भगतसिंघ आदि की फांसी की तारीख २४ मार्च घोषित की गयी है ठीक उसी दिन कांग्रेस के नए अध्यक्छ करांची पहुचेंगे और जनता में बड़ी उत्तेजना होगी इस पर इरविन ने गांधी जी को लिखित उत्तर भेंट वार्ता के बाद भेजा कि मेने इस मामले पर बहुत ध्यान से विचार किया है 1पर मुझे अपने मन में सजा कम करने के औचित्य का कोई ठोस आधार नहीं मिला1 जहाँ तक तारीख का सवाल है मेने कांग्रेस के अधिवेसन के समाप्त होने तक इसे टालने की सम्भावना पर विचार किया था पर जान बुझ कर मेने उसे इसलिए रद्द कर दिया की आदेश दे देने के बाद केवल राजनैतिक कारणों से फांसी को स्थगित करना मुझे ठीक नहीं जंचा !बीच में भी वार्ता चली किन्तु वायसराय ने गांधी जी को स्पष्ट शब्दोँ में बता दिया था की भगत सिंह और अन्य दो लोगों की मौत की सजा में कोई रियायत किये जाने की सम्भावना नहीं है फिर भी गांधी जी ने २३ मार्च को वाइसराय को अंतिम पत्र लिखा था प्रिय मित्र --यद्द्पि अपने मुझे साफ़ साफ़ बता दिया था की मौत की सजा में रियायत दिए जाने की कोई आशा नहीं है ! फिर भी आपने मेरे शनिबार के निबेदन पर विचार करने को कहा था डॉ सप्रू कल मुझ से मिले और उन्होंने मुझे बताया की आप इस मामले में में चिन्तित है !और आप कोई रास्ता निकालने का विचार कर रहे हैं ! यदि इस पर पुनः विचार करने की कुछ गुंजाइश हो तो में आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूँ कि जनमत इस सजा में रियायत चाहता है यदि सजा हलकी हो जाती है तो बहुत संभव है की आंतरिक शांति की स्थापना में सहायता मिले यदि मौत की सजा दी गयी तो निशन्देह शांति खतरे में पड़ जाएगी इस पर वायसराय का उत्तर था किभगत मेने आपकी हर बात पर दुबारा बड़े गौर से विचार किया है लेकिन मुझे किसी तरह ऐसा नहीं लगता है की आप जो अनुरोध कर रहे हैं उसे मन्ना ठीक होगा ! और २३ मार्च को ही भगत सिंह और उनके दो साथी शहीद हो गए !गांधी जी ने कहा था भगत सिंह और उनके दो साथी फांसी पाकर शहीद हो गए हैं ऐसा लगता है मनो उनकी मृत्यु से हजारों लोगों की निजी हानि हुई है !मेरा निश्चित मत है की सरकार द्वारा की गयी इस गंभीर भूल के परिणाम स्वरुप स्वतत्रंता प्राप्त करने की हमारी शक्ति में बृद्धि हुई है और उसके लिए भगत सिंह और उनके साथिओं ने मृत्यु से भेंट की है !२६ मार्च को पत्र प्रितिनिधियों से भेंट में गांधीजी ने कहा था की में भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में परिवर्तन नहीं करा सका इसी कारन नवयुवक मेरे विरुद्ध अपना रोष प्रगट कर रहे हैं यद्द्पि बे मुझ पर बहुत नाराज थे फिर भी में सोचता हूँ की उन्होंने अपने क्रोध का प्रदर्शन बहुत ही सभ्य ढंग से किया उन्होंने गांधीवाद का नाश हो ,गांधी वापिस जाओ के नारे लगाए और में उनके क्रोध का सही प्रदर्शन मानता हूँ में भी उनके साथ उसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न शील हूँ !अंतर केवल इतना है की मेरा रास्ता उनसे बिलकुल अलग है और मुझे इस में तनिक भी संदेह नहीं है की जैसे जैसे समय बीतता जायेगा बे यह समझ जायेंगे की उनका रास्ता गलत था !देश में जहाँ करोड़ों भूखे लोग भरे पड़े हैं ,वहां हिंसा का सिद्धांत कोई अर्थ नहीं रखता !एटीएम दमन और कायरता से भरे दब्बूपन बाले इस देश में हमें साहस और आत्मबलिदान का आधिक्य नहीं मिल सकता है !भगत सिंह के साहस और बलिदान के सम्मुख मस्तक नत हो जाता है !परन्तु में अपने नौजवान भाईओं को नाराज किये बिना कह सकूँ तो मुझे इस से भी बड़े साहस के दिखने की इक्छा है में एक ऐसा नम्र ,सभ्य ,और अहिंसक साहस चाहता हूँ जो किसी को चोट पहुंचाए बिना अथवा मन में किसी को चोट पहुंचाने का तनिक भी विचार रखे बिना फांसी पर झूल जाये !भगत सिंह को जीवित रहने की इक्छा नहीं थी उसने माफ़ी मांगने से इंकार किया1अर्जी देने से इंकार किया !भगत सिंह अहिंसा का पुजारी नहीं था ,पर वह हिंसा को धर्म भी नहीं मानता था !वह अन्य उपाय न देख कर खून करने को तैयार हुआ था !उसका आखरी पत्र इस प्रकार का था -----में तो लड़ते हुए गिरफ्तार हुआ हूँ !मुझे फांसी नहीं दी जासकती !मुझे तोप से उड़ा दो ,गोली से मारो !इन वीरों ने मौत के भय को जीता था !इनकी वीरता के लिए इन्हे हजारों नमन !गांधी जी देश की आजादी और नव निर्माण के लिए भी सत्य अहिंसा के मार्ग को ही एक मात्र उपाय के रूप में देखते और मानते थे! और जीवन पर्यन्त उन्होंने इसी मार्ग का अनुसरण किया! और इस मार्ग का परित्याग किसी भी परिश्थिति में नहीं किया ! इसलिए गांधी जी की सेवाओं का आकलन करते समय किसी को भी इन्ही दो दृष्टियों को आधार मानकर उन पर टिप्पड़ी करना चाहिए अन्यथा वह स्वयं भी भ्रमित रहेगा और लोगों को भी भ्रमित करेगा भगत सिंह और उनके सहयोगियों की मौत की सजा माफ़ करने का प्रयत्न मदन मोहन मालवीय और डॉ सप्रू ने भी मकिया था !
पसंद करेंऔर प्रतिक्रियाओं दिखाएँ
टिप्पणी
टिप्पणियाँ
Narottam Swami
कोई टिप्पणी लिखें…

No comments:

Post a Comment