भारतीय संस्कृति ------------------संस्कृति में कुछ अच्छे और कुछ गलत विचार भी चलते हैं ! मनुष्य की एक प्रकृति होती है और एक विकृति भी होती है ! मनुष्य को भूख लगने पर वह खाना खता है यह उसकी पकृति है ! और भूख ना लगने पर भी जब वह स्वाद तृप्ति के लिए आवश्यकता से अधिक खाकर आंधियों और शारीरिक व्याधियों को जन्म देता है यह उसकी विकृति है ! जो मेहनत करके खाते हैं यह संस्कृति है ! और जो जो मेहनत को टालते हैं दूसरे के श्रम से उपार्जित संपत्ति को छल कपट ढोँग पाखण्ड दबंगई ,गुंडागर्दी से लुटते हैं और वैभव प्राप्त कर उसको भोगते हैं यह विकृति है ! चाहे इस प्रकार की विकृति प्राचीन काल से चली आरही हो या आज भी चलती दिखाई दे रही हो वह कभी भी संस्कृति नहीं हो सकती है ! भारत की संस्कृति प्रयोगशील रही है !भारत प्राचीन काल से ही प्रवृत्तिशील रहा है ! यहाँ आध्यात्मिक प्रवृत्ति और बहुत गूढ़ चिंतन चलता रहा है और ुासके लिए बहुत से प्रयोग भी चलते रहे हैं उस से यहां का समाजशास्त्र निर्मित हुआ है ! ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा ,गृहस्थाश्रम के नियम ,बानप्रस्थ का विश्वास ,सन्यास का आदेश ,मासाहार का निषेध कृषि के लिए आदर, शिक्छा पर राजसत्ता क अधिकार ना हो ! कोई भी अपना काम छोड़ कर लालच बश अपने स्वभाव और सामर्थ्य को न देख कर दूसरे के कामों में दाखिल ना हो -----ऐसे अनेक प्रयोग भारत में हुए हैं ! कोई वर्णव्यबस्था के नाम से ,हुए ! कोई आश्रम के नाम से ,कोई योगाभ्यास के नाम से, कोई भक्ति के नाम से कोई तत्तवज्ञान और दर्शन के नाम से, कोई गुण विकास के नाम से ऐसे विविध नाम देकर आध्यात्मिक और जीवन यापन करने सम्बन्धी प्रयोग भारत में बहुत हुए हैं !
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