Friday, 30 September 2016

१(२२) अर्जुन अब भगवन श्री कृष्णा से कहता है की में युद्ध में उपस्थित सभी योद्धाओं को देखना चाहता हूँ कि जिनके साथ मुझे युद्ध करना है यह योद्धा की सावधनी युक्त दृष्टि है कि वह भली प्रकार यह जान ले और समझ ले की उसके बिरुद्ध युद्ध करने वालों की सामर्थ्य क्या है? ताकि वह तदनुसार तैयारी कर युद्ध मैदान में मुकाबला करने के लिए तैयार रहे.
1(21)After taking his Gandiva in his hand Arjuna tells Lord Krishna that his chariot be placed in the middle of two armies.Till now Arjuna did not show any sign of recoil from the ferocious war among the members of the same dynasty. Kings and youths of almost whole country had arrayed themselves in either side of the war entangled groups Maharshi Vyas has said jn Mahabharat that only old men and women were left in the houses almost all the youths had gone to participate in war.

Tuesday, 27 September 2016

1(15)Krishna blew Panchjanya conch(panchyajanya named Shankhroopdhari Daitya who was a symbol of terror and a signal of death to saints was killed by Lord Krishna and theLord kept him as Conch on the request of slain Daitya hence the name of His Conch is Panchjanya) and Arjuna blew his Devdutta Conch(this conch was given by Indra to Arjuna) and Brikodara Bheem who was named as BHeem karma blew Paundra conch(Bheems diet was so excessive that he consumed half of the cooked food prepraired for the whole family of Pandvas and he was named as Bheem karma as he had slain Daitya like Bakasur,Hidamb Keechak etc) His conch was called Maha shankha as it was biggest in shape and sound
1(14) In response to conch etc blew by Bhishma and his army chieftains Lord Krishna and Pandavas seated on a Big chariot driven by white coloured horses blew their divya(divine) conches.Pandavas were endowed with Divya arms Divya Rath Divya Horses Divya conches and this Divya chariot was driven by God in human form. Chariot on which Lord Krishna along with Arjuna was sitting was given by Lord Agni(the fire) this chariot had the capacity to load in it Arms which could be loaded by nine big bullock carts it was engraved by gold and it had a flag on which Hanumanji was seated and this flag spread in four Yojans(approximately 30 KMs) and its speciality was that it flew without any obstacle and the Monkey sitting on it made thunderous voice which made enemy army to shiver with fear This Divine chariot was built by Vishwakarma Himself and it was also used by Devatas against Danvas it had the history of victory hence Pandavas were sure of their victory over Kauravas' Apart from this white divine horses were given to Arjuna by Gandharva Chitraketu(gandharvas are devatas who are masters of music) and these horses if killed in war automatically regained life.
1(11) Bhishma had imposed certain restrictions on him according to the customs prevalent in contemporary times one of them was not kill women and fight against them in war. One of the chief charioteers Shikhandi was a woman by birth and who was changed to man by a Gandharva Chitraketu hence to save him from the attack of woman turned man Shikhandi Duryodhana commands his army to protect Bhishma from Shikhandi as according to his vow he will not retaliate the attack on him by Shikhandi he also commands his army men not to leave their places without command
1(10) Duryodhana exhorts his army and says that our army have valiant warriors like Karna Dronacharya Kripacharya Aswatthama dushasan vikarna etc and is led under the command of Bhishma and is larger in number then Pandvas army which is commanded byBhima comparaitively less heroic in comparison to great archer Bhishma hence our army is able to defeat the army of Pandvas easily our army is invincible.

Friday, 23 September 2016

राजनीति और समाज----------- मानव समूहों को व्यबस्थित जीवन जीने के लिए अनेक व्यबस्थायें मानव समाज ने निर्मित की !धर्म ,की व्यबस्था में मनुष्यों के अंतःकरण (मन ,बुद्धि ,चित्त ,अहंकार )  को शुद्ध ,पवित्र बने रहने के लिए करुणा ,प्रेम ,अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय ,अपरिग्रह ,ब्रह्मचर्य अदि के विधि विधान निर्मित किये गए !प्राणियों के द्वारा किये गए समस्त कर्म तो शरीरों से होते दिखाई देते हैं ,और उनका अच्छा बुरा परिणाम भी शरीरों पर ही होता है !किन्तु इन सभी कर्मों की अच्छी बुरी प्रेरणा अंतःकरण से ही प्राप्त होती है !अतः धर्म का मुख्य कार्य है अंतःकरण को शुद्ध  ,पवित्र रख कर शरीर से उत्तम कर्म कराना !राजनीति शरीर के समस्त कार्यों को बाहर से नियंत्रण करने के लिए बाहर से नियंत्रित करती है ! इसके लिए कानूनों का निर्माण करना ,कानूनों का पालन करने के लिए कार्यपालिका का निर्माण करना ,और तोड़ने वालों के लिए दंड देने के लिए न्याय व्यबस्था को निर्मित करना !इन सब के लिए पूर्वकाल में राजा का निर्माण हुआ था !जो अब समाप्त होकर प्रजातंत्र में परिवर्तित हो गया है ! प्रजातंत्र भी मानव समूह की व्यबस्था करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा  रहा है !इसीलिए अब सभी प्रकार के शासन से  रहित व्यबस्था के निर्माण की खोज में कुछ मनीषी लगे हुए हैं ! अभी तो राजनीतिक व्यबस्था देश में स्वार्थ के गहरे गढ़े में तेजी से गिरती दिखाई दे रही है ! राजनीति ने शासन  व्यबस्था को पूर्ण रूप से भ्रष्ट कर ही दिया है ! इस से समाज में भी धार्मिक चरित्र निर्माण और बुद्धि को शुद्ध और पवित्र करने की क्रिया भी नष्ट होती दिख रही है !चरित्र निर्माण के दो प्रमुख केंद्र धर्म और शिक्छा दोनों दूषित हो गए है !इन दोनों माध्यमों में अमावस्या के गहन अन्धकार में भी कुछ सत्य ,करुणा ,प्रेम ईश्वर प्रेम से परिपूर्ण स्वार्थ रहित सेवा के केंद्र भी जुगनू के प्रकाश की तरह और कुछ धीर ,वीर ,समाज सेवा को अर्पित युवाओं और व्यक्तियों के भी दर्शन होते हैं ! भारत की पवित्र भूमि में स्त्री पुरुषों में धर्म और सेवा के भाव स्वभाव गत हैं ! बे प्रकाशित नहीं हो पा रहे हैं !इस अवरोध का एक प्रमुख कारण राजनीति है !राजनीति पुरुषों ,महिलाओं ,और युवाओं को भी भ्रष्ट कर रही है !इसने सत्ता और महत्ता की आकांछा इतनी तीव्र कर दी है !कि इसकी प्राप्ति के भेंट समाज से सद्भाव और सेवा भाव नष्ट कर दिया हैं !सिर्फ  मुख़ौटे दिखाई देते हैं !यह बीमारी कैंसर और डेंगू से भी अधिक घातक और व्यापक हैं !इसके इलाज के लिए देश में महापुरुषों के महान  जीवन परंपरा विद्यमान है !सिर्फ उनका स्मरण और अनुसरण कर व्यक्तिगत जीवन में धारण कर उसको सामाजिक जीवन में प्रवाहित और प्रकाशित करने की आवश्यकता है !यह देश की प्राणशक्ति है !

Sunday, 18 September 2016

पाकिस्तान की कोई भी सरकार अपने आवाम के प्रति उत्तरदायी और बफादार नहीं रही !इसिलए उसने देश को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने का कोई प्रयत्न कभी भी नहीं किया !इस्लामिक कट्टरता को बढाबा और उसका पोषण किया !इसीलिए जिन्ना की म्रत्यु के साथ ही वहां लोकतंत्र भी दफ़न हो गया !ज्यादातर समय वहां आर्मी का शाशन सत्ता में और मुस्लिम समाज में कट्टर पंथी मुसलमानो का शासन रहा है !वहां नाममात्र का  लोकतंत्र है ! वास्तविक  सत्ता वहाँ  आज भी सेना और कट्टरपंथी मुसलामानों के हाथों में है !वहां के विद्यालयों में गलत इतिहास बच्चों को पढ़ाया जाता है !और हिंदुओं के प्रति तीव्र घृणा का बीजारोपण उनके दिल दिमाग में वाल्यकाल से ही भर दिया जाता है !परिणाम यह हुआ है कि विभाजन के बाद हिंदुओं की आबादी जो २४% प्रतिशत थी नष्टहोकर १% रह गयी है !और जो हिन्दू रहगये हैं ,बे पूरीतरह से निस्तेज  हो गए हैं !पाकिस्तान वर्तमान के वैज्ञानिक सोच की उपेक्छा कर रहा है !उसने  अपने देश की जनता के साथ जो विश्वासघात किया है !उसको भारत के प्रति घृणा के वस्त्र पहना कर अत्तंकवादी हमलों के रूप में प्रस्तुत कर रहा है !भारत ने गरीवी को नेश्तनाबूद करने के लिए ,और सभीदेशबासियों के विकास के लिए तमाम विकास योजनाओं का क्रियान्वन किया !पाकिस्तान को अपना ही अभिन्न अंग मान कर उसकी सारी गुस्ताखियों को माफ़ करता रहा !उसके हमले भी नाकाम किये गए !किन्तु पकिस्तान हिंदुस्तान के प्रति अपनी दुश्मनी का विस्तार करने से बाज नहीं आरहा है !उसकी गुस्ताखियां अब वर्दास्त के बाहर  हो गयी हैं !समय की मांग और भारत की जनता का एक ही आग्रह है !कि अब सरकार पाकिस्तान की खूनी हरकतों का उत्तर उसकी हरकतों के अनुरूप दे !उड़ी में सोते हुए सैनिकों पर हमला बुजदिली का घृणित उदहारण है !इसका जबाब हमले की निंदा ,और मृत सेनिको को सलूट करने से नहीं दिया जासकता है !इस हमले का जबाब नेताओं की शाब्दिक  श्रद्धान्जलि से नही सेनिको को गोलियों से दिया जाना चाहिए !मोदी जी के शव्दों को अब क्रियात्मक रूप दिए जाने की आवश्यकता है !

Saturday, 17 September 2016

छमावणी पर्व और जैन समाज --------- जैन धर्म प्रयत्न प्रधान धर्म हैं !अपने आप अपना उद्धार करें ,अपना पतन ना करें , क्योंकि आप ही अपने  मित्र है ! और आप ही अपने शत्रु हैं !जिसने अपने आपसे अपने आपको जीत लिया है ,उसके लिए आप ही अपना बन्धुऔर जिसने अपने आपको नहीं जीता हैऐसे अनात्मा का  आत्मा ही शत्रुता में शत्रु की तरह बर्ताव करता है ! जिसने अपने पर विजय करली है उस अनुकूलता ,प्रतिकूलता सुख दुःख तथा मान अपमान में निर्विकार मनुष्य को परमात्मा नित्य प्राप्त है ! यह जैन धर्म का संक्छिप्त  सार है !छमा वाणी  पर्व भी आत्मविजय का एक सोपान है !किन्तु इस पर्व का परिचय जैन समाज इस रूप में प्रस्तुत नहीं करता है !  कितने जैन अपने जीवन में इस छमाधर्म के  स्वरुप और स्वभाव को धारण  ओर समझ कर शरीर की स्थूल क्रियायों को आत्मार्पित करने का साधन बनाते हैं कहना मुश्किल हैं ! किन्तु जिस रूप में बे इस पर्व का आयोजन करते हैं !उसमें यह दिखाई नहीं देता है !मंच  ऐसे वक्तागणों से सुशोभित होता है !जिनमे छमा धर्म के मर्म और स्वरुप तथा सिद्धान्त कोव्यक्तकरने का ना तो  ज्ञान होता है और न समझ ही होती है !अधिकांश वक्तागण  इस दृष्टि से आमंत्रित किये जाते हैं !जिनमे आयोजक लोग अपने भौतिक स्वार्थों की सिद्धि देखते हैं !इस प्रकार ये आत्मा की ओर उन्मुख करने वाला साधना पर्व गपोड़ियों  के द्वारा की गयी अभिव्यक्ति का साधन बन जाता है !और आत्मज्ञान तो लुप्त ही रहता है !जैन समाज व्योपारी समाज है !धनसंग्रह में कुशल और प्रवीण है !इस धर्म में नर से नारायण बनने का ज्ञान भी पर्याप्त है !इसीलिए जैन समाज के संचालकों और मंचालकों को छमा वाणी   ऐसे आत्मोद्धारक पर्व के अवसरों पर व्यबसाय बृत्ति  पर संयम रख कर आत्मोत्थान के सन्देश को आत्मज्ञानी समाज सेवियों से अभिव्यक्ति देने का पाबन प्रयत्न कराना चाहिए !

Friday, 16 September 2016

 राष्ट्रीय सोच ---------- प्रत्येक देश को परिस्थित और समय के अनुसार चलना पड़ता है !भूतकाल की अच्छी बातें जो समय और परिस्थिति के अनुसार प्राणियों के हित के लिए आवश्यक हों उन्हें ग्रहण करना चाहिए और जो अनावश्यक और अनुउपयोगी हैं उन्हें त्याग कर आगे बढ़ना चाहिए ! इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी ,कर्तव्य निष्ठां का अभाव ,पर्यावरण प्रदूषण और लोकतान्त्रिक संस्थाओं का सही दिशाओं में गति प्रदान करने का है !भारत धर्म प्रधान देश है !और इसमें भारत में जन्म लेने वाले धर्मों के अलावा विश्व के दो बड़े  धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म भी है !इन सबमें भी समन्वय  रखना आवश्यक है !जनसँख्या बृद्धि भी बहुत बड़ी  समस्या है !इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए युवाओं की ऊर्जा का प्रयोग होना चाहिए !युवाओं में इस प्रकार का सोच विकसित और निर्माण करने के लिए . जिम्मेदार लोगोंको अपने आचरण  को सुधार कर के  सिद्ध करना चाहिए ! यदि बृद्ध  पुरुष और जिम्मेदार लोग अपने आचरण में सुधार नहीं करते हैं !तो युवाओं को गाँधी ,सुभाष ,डॉ हेडगेवार और आजाद तथा मदर टेरेसा अदि के जीवन प्रसंग और इस देश की महान ऋषि परंपरा और महापुरुषों के जीवन बृतान्त कोई लाभ नहीं पहुंचा सकते हैं !कथनी से अधिक करनी का असर पड़ता है !गीता में कहा गया है !यति यति आचरती   श्रेष्ठः  तत एव इतरः जनः ------- जैसा श्रेष्ठ पुरुष आचरण करते है उसी का अनुसरण समाज के अन्य लोग भी करते हैं !कहने से  चार गुणा असर करने का पड़ता है !इसीलिए सबसे बड़ी जरुरत सदाचरण की है सद्वाक्यों की नहीं !और हिंसा ,द्वेष भाव ,घृणा ,झूठ आदि की तो बिलकुल नहीं है !इसीलिए युवाओं के इन घोर स्वार्थनिष्ठ ,लोकतंत्र विध्वंसक ,निम्न स्वार्थों को पूर्ति में संलग्न  धर्म ,नीति ,सदाचार ,विकास अदि की बातों को बहुत महत्त्व ना देकर इनके स्वार्थ पूर्ति का साधन ना बनकर ,इनके जिन्दा ,मुर्दाबाद के नारों को बुलंद करने के स्थान पर अपनी दृष्टि उन उन निश्वार्थ समाज सेवकों की और केंद्रित करना चाहिए ,जिनका दर्शन ना संवैधानिक संस्थाओं में होगा ,ना भाषण मंचों पर होगा !बे वहां समाज के नवनिर्माण में कार्य करते मिलेंगे जहाँ न समाचार पत्रों की दृष्टि जाती है और ना चैंनलों की ! इसीलिए रचनाधर्मिता को जीवन में स्थान दो और अपने आपको गपोड़ियों के चुंगल से मुक्त करो !स्वाबलंबी जीवन को विकसित करो !और इन स्वार्थनिष्ठ गप्प बाजों के स्वार्थ के साधन ना बनो !
भारत विश्व का प्राचीनतम देश हैं !यह भूतकाल में विश्व गुरु कहलाता था !उसका कारण भी यही था कि आध्यात्मिक ज्ञान की जीवन पद्धति यहीं से विश्व को प्राप्त हुई थी !भगवान श्री कृष्ण ने गीता १७(२३)में कहा है कि परमात्मा का निर्देश ओम तत सत इन तीन प्रकार के नामों से होता है !इन्ही तीन नामों से परमा त्मा का संकेत किया गया है ! उसी परमात्मा ने श्रष्टि निर्माण के समय ही वेदों तथा ब्राह्मणो और यज्ञोँ की रचना की थी !अर्थात परमात्मा के ज्ञान और जीवन जीने की कला का ज्ञान वेदों में स्वयं दिया था !और वेद ज्ञान को समझ कर उस ज्ञान का स्वयं आचरण करने वाले ब्राह्मणो की रचना भी परमात्मा ने कीथी !और जीवन जीने की कला तथा बिभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक साधनाओ के द्वारा श्रष्टि के भौतिक पदार्थों अर्थात संसार के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश को बिना छति पहुंचाए आत्मशकि से ही प्राप्त शक्ति से सभी लौकिक पारलौकिक स्वर्ग नर्क आदि की प्राप्ति और अंत में मोक्छ प्राप्ति का विधान भी यज्ञोँ के माध्यम से संसार के सामने ब्राह्मणो ने यज्ञीय जीवन पद्धति को अपने आचरण में उतारकर संसार के सामने रखा था !वेदों ने ही लोक व्यबस्था में धर्मकी स्थिति का सही चित्रण प्रस्तुत करते हुए !काल को चार विभागों सतयुग त्रेता द्वापर और कलियुग में विभाजित कर दिया था !तथा युगानुसार धर्म की स्थिति भी बतायी थी !यह कलियुग चल रहा है !अभी इसको सिर्फ ५४०० बर्ष के लगभग हुआ है !इसकी आयु ४३२००० बर्ष बतायी गयी है !और इस युग के बारे में कहागया है !कि इस युग में सनातन धर्म नष्ट होजायेगा !और वेद द्वारा प्रतिपादित व्यबस्था का पालन कराने वाले लोग आचरण भ्रष्ट हो जाएंगे !और अनेक प्रकार के पंथ मजहब उत्पन हो जाएंगे !जो भारत की वैदिक संस्कृति का नाश करेंगे !कलियुग को घोर अधर्म युग कहा गया है !इसमें जीवन जीने की कला और इन कलियुगी मजहबीं और मतों से वैदिक संस्कृति के साधू संतो सन्यासियोँ द्वारा अपनी तपस्या से सनातन धर्म को सुरक्छित और संरक्छित करने के लिए विधियां बतायी गयी है !रामायण ,गीता महाभारत उपनिषद् आदि इसी सनातन धर्म की सुरक्छा के लिए आसान साधना के उपाय प्रस्तुत करते हैं !भारत की लगभग १३०० साल की गुलामी ने भारत वासियों की वैदिक संस्कृति को नष्ट करके अपने अधूरे धर्मों को प्रवेश करा दिया है !और देश में कुछ लोगों ने लालच और लोभ से तथा कुछ ने भय से इन विदेशी धर्मों को स्वीकार कर लिया है !और कुछ विदेशी विद्वानो ने श्रष्टि के सृजन के अपने अधूरे और कल्पित दृष्टि कौण इतिहास में प्रविष्ट करा दिए !तथा इसी प्रकार के झूठे और मनगढंत इतिहास ने अकबर को महान और उसके समय में देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति को स्वर्ण युग निरूपित कर दिया है !जबकि अकबर के समकालीन तुलसीदास जी ने उस समय की भारत की दीन दशा का बहुत ही मार्मिक और दर्द भरा चित्र प्रस्तुत किया है !अकबर के विरुद्ध युद्ध करने वाले महान योद्धा और देश की धर्म संस्कृति स्वाभि मान के लिए लाखोँ स्त्री पुरुषों के बलिदानो का कोई जिक्र नहीं है !अकबर अत्यंत अय्याश और वैदिक संस्कृति को नष्ट करने वाला और मुग़ल सल्तनत को भारत में विस्तार देने वाला साशक था ! !जिसने वैदिक संस्कृति को नष्ट करने के लिए चंद स्वार्थी राजपूत राजाओं के सहयोग से और कुछ चाटुकार हिन्दू दरबारियोँ के माध्यम से कुशल साशक के रूप में मुगलिया सल्तनत को स्थापित किया !और सामजिक और धार्मिक रूप से वैदिक धर्म का नाश किया !उसी का उदाहरण ये ज्वाला मुखी देवी की ज्वाला नाश करने का उसका कुत्सित प्रयत्न था जिसमे वह बिफल हुआ !ऐसे और भी अनेक वैदिक संस्कृति के नाशक अकबर के प्रसंग हो सकते हैं !जिनको उजागर किया जाना चाहिए !

Tuesday, 13 September 2016

भाजपा को अब देश का शासन चलने का अवसर प्राप्त हो गया है !इसीलिए अब इसे अपने कार्यकर्ताओं को देश में मौजूद समस्यायों के निराकरण  और समाधान के लिए भगीरथ प्रयत्न करने के लिए जुट जाने के लिए लगा देना  चाहिए !जो इसका प्रबल विरोध सत्ता में बैठी कांग्रेस के प्रति था !अब उस शाब्दिक विरोध में अधिक समय ना बर्बाद कर अपने आचरणों से विरोध प्रस्तुत करना चाहिए !मोदी  जी ने  जिन मुद्दों को जनता के सामने बहुत ताकत के साथ उछाला था ! और सत्ता में आते ही समाधान का  वायदा किया था ! उनमे से सिर्फ एक केंद्र में उनकी सरकार के दौरान कोई घोटाला नहीं हुआ यह पूर्ण रूप से नियंत्रित दिखाई देता है !उनके मंत्रिमंडल में कुछ ईमानदार मंत्री है !किन्तु जो भ्रष्ट हैं उन पर प्रधान मंत्री की पैनी नजर रहती है !इस समय मोदीजी के नियंत्रण में भाजपा का संगठन और शासन प्रशासन है ! दूसरा  अहम् मुद्दा जो महगाई का है !वह सुलझने का बजाय बहुत बढ़ गया है !खाद्य पदार्थों और जनता के दैनिक उपयोग की वस्तुओं में असाधारण बृद्धि हुई है ! बाजार पर सरकार का नियंत्रण दिखाई नहीं दे रहा है !यद्द्पि इसमें केंद्र से अधिक राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है !किन्तु जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें है !वहां भी स्थिति में सुधार नहीं है ! एक समस्या धार्मिक सद्भाव की है ! हिन्दू मुस्लिम समस्या देश की सबसे बड़ी साम्प्रदायिक समस्या है !जिसका समाधान देश के विभाजन और गांधीजी की सहादत के बाद भी नहीं हो सका है ! कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए जिस सख्त कदम की आवश्यकता थी !अब उसकी और मोदी सरकार जाती दिख रही है !इस अहम् समस्या के समाधान के समाधान की विफलता के लिए  जनसंघ और अब भाजपा लगातार कांग्रेस की आलोचना करती रही है ! अब सत्ता भाजपा के हाथमें है !इसीलिए अब इस समस्या के समाधान का सार्थक प्रयत्न मोदीजी की सरकार को करना चाहिए !  लोकतंत्र का स्वरुप ही ऐसा है कि इसमें सत्ता में परिवर्तन अवश्य होता है !इसीलिए सत्ता में पकड़ मजबूत करने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए लोकतंत्र को विकृत नहीं करना चाहिए !भाजपा राष्ट्रीय पार्टी है  !इसीलिए इसको नीति आधारित और विचार प्रधान रहना चाहिए !किन्तु यह सत्ता के मोह में दलबदल को प्रोत्साहित कर लोकतंत्र में विचार के स्थान पर अवसरवाद को प्रधानता दे रही है !और दलबदलुओं को बहुत उत्साह के साथ प्रवेश दे रही है !दलबदल को विचार से संयुक्त करने के लिए किसी भी दलबदलू को कम से कम दाल में प्रवेश के बाद  ना दल में और न ही विधान सभा या लोकसभा में जाने के लिए ५ साल तक कोई अवसर नहीं देना चाहिए !ये दलबदलू समर्पित कार्यकर्ताओं का अधिकार छीन  कर  उन्हें हतोत्साहित कर देते हैं ! जिससे विचार विकसित लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो पाती है !
Ch1(1)When Sam DAn BHed established method among kings failed peaceful efforts to resolve cisis among Kauravas and pandvas the only resort was left to use Danda against Kauravas.LOrd krishna went to the court of Dhritrastra to bring truce and he usedSAM(told to kauravas that Pandvas were their own kinsmen and they regarded dhritrasra as their sole guardian hence they must not commit dis honesty with them and to create amity they should get their king dom back but Kauravas particularly DUryodhan and his associates did not accept it , then policy of than (toaccept minimum and renounce maximum) was used Lord put the proposal to give only five villages for the livelihood of five brothers and keep the rest king dom but Duryodhan turned back this proposal and fired back that he would not give that much of land which can cover the uupper side of needle Then lord advanced the policy of Bhed(cause division in associates) but this also not got succeses. now the only way was left to use policy of dand(war) hence the great war of Mahabharat ensued due toredundancy of
duriyodhan and his covetous and warmonger greedy associates.ULtimately war ensued and Sanjaya who was endowed with divya dristi remained in KUrukchhetra for ten days and when BHisma Pitamaha fell on the ground in the battle field he came to inform this to blind king hearing this sad news he asked Sanjaya to give him the real picture of battle field from the begining Sanjaya due to DIvya Dristi had the capacity to visualise what had happened in the past and to forecast what would happen in future. Now Dhritrastra asks that what my sons and Pandavas gathered to fight each other inDharma chhetra Kuru chhetra did what did they do that how did they place them in battle field and how did they start war?

Monday, 12 September 2016

धर्म में सनातन और सामयिक दो तत्त्व होते हैं  ! धर्म का नाम ही धर्म इसीलिए पड़ा क्योंकि वह ईश्वर निर्मित संपूर्ण श्रष्टि को धारण करता है ! इसिलए जोधर्म के सनातन  तत्त्वव , सत्य, अस्तेय ,अहिंसा,ब्रह्मचर्य ,अपरिग्रह ,हैं !ये सनातन हैं !इनको क्रिया रूप में उतारने के लिए जिस नीति विधान का निर्माण ,देश ,परिस्थित स्वभाव आदि के अनुसार होता रहता है वह बदलता रहता है ! मानव समाज परस्पर सहयोग से संचालित होता है !और मानव समाज के विवेक पूर्ण सहयोग से पशु ,पक्छी आदि समस्त जीव जंतुओं का संरक्छण होता है !सभी प्राणियों के भोग के लिए ही पृथ्वी ,आकाश ,जल ,अग्नि और वायु का निर्माण हुआ है !इनसे ही प्राणियों के लिए समय और काल भेद से समस्त भोग सामग्री उत्पन होती है ! सभी धर्मों में त्याग को आवश्यक माना गया है !त्याग की इस प्रक्रिया को अनेक नाम दिया गए हैं !बलिदान ,कुर्वानी ,दान ,यज्ञ आदि अनेक नाम देशों अदि की भिन्नता मेंउन देशों में प्रचिलित मान्यताओं के अनुसार त्याग  के अनेक नाम है !वैदिक संस्कृति में यज्ञ को त्याग का नाम दिया है !सभी  प्राणी संसार में मल मूत्र विसर्जन से जो गन्दगी भूमि पर उत्पन्न कर देते हैं !उसकी शुद्धि के लिए ,और कतिपय दुष्ट मनुष्यो के द्वारा अधिक प्राप्ति के कारणों से जो जल .जंगल ,जमीन ,आदि प्राकृतिक साधनो को दूषित और प्रदूषित किया जाता है ,!जिस से प्रकृति चक्र अवरुद्ध हो जाता है !समय पर वर्षा  नहीं होती है ,अकाल ,भूकंप ,आदि और वायु ,जल प्रदुषण आदि के कारण मानव समूह के साथ संपुर्ण प्राणी जगत के सामने असितत्व का संकट उत्पन्न हो जाता है !इसीलिए इस विषम और प्राणान्तक स्थिति से निपटने के लिए मन्त्र आदि के विधि विधान से यज्ञों  का  आयोजन होता था !अभी भी होता है !इसमें उत्तम सुगन्धित पदार्थों की अग्नि में आहुतियां दी जाती है !इस यज्ञ विद्या को दूषित करने के लिए कुछ धूर्तों ने पशुबलि को भी प्रबेश करा दिया था !जिसका शशक्त प्रतिरोध हुआ और इस दूषित ,हिंसक प्रथा को समाप्त कर दिया !भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में यज्ञ का शुद्ध स्वरुप समाज के सामने प्र्रस्तुत किया !और दूध घी के लिए गाय को मान्यता प्रदान कराई और स्वयं गायों को चराया !परिणाम स्वरुप गाय  भारतीय  अर्थ व्यबस्था की रीढ़ बन गयी !और उसके समस्त अंग हड्डी .चमड़ा ,आदि भी समाज के लिए उपयोगी हो गए !उसके गोबर समस्त प्रकार के जहरीले कीटों का विनाशक और मूत्र समस्त रोगों का नाश करने वाला होता है !तथा गाय के गोबर और मूत्र से उत्तम खाद का निर्माण होता है !करोड़ों की संख्या में गायें भारत में थी !और यहाँ घी दूध की नदियां बहती थी ! मनुष्यों ने समयानुसार अपनी सामर्थ्य ,स्वभाव भिन्नता के कारण धर्म के सम्बन्ध में अनेक धारणाएं उत्पन्न की !भारत में भी वैदिक धर्म में अनेक धारणाएं जैन ,बौद्ध ,सिख आदि के रूप में प्रगट हुई ! कालांतर में इस्लाम और ईसाई धर्म का प्रवेश भी भारत में हुआ !और बहुत से लोगों ने हिन्दू धर्म को त्यागकर इन धर्मों को स्वीकार कर लिया !भारत में इन धर्माबलंबियों की बहुत बड़ी संख्या है !भारत भूमि का एक बहुत बड़ा भू भाग विभाजित होकर पाकिस्तान बन गया जो अब दो भागों में बिभाजित होगया !और एक का नाम बांग्लादेश हो गया !
          आज इदुलजुहा मुसलमानो का बहुत बड़ा त्यौहार है !इसमें कुर्बानी दी जाती है !इसमें भारत में लाखों बकरे काटे जाते हैं !कहीं छिपे तौर पर गायों की भी वलि दी जाती हैं !मुस्लिम देशों में  भी यह दिन भारत की तरह  खुसी का होता है !किन्तु करोड़ों निर्दोष मूक पशुओं के बड़े विनाश का दिन होता है !अब कुछ मुसलमानो ने इस कुर्वानी प्रक्रिया को बदलने का प्रयत्न करना भी शुरू कर दिया है !इस दिन को अहिंसक ,करुणा और दया प्रधान धर्मों को मान ने बाले लोगों को करोङो पशुओं के सामूहिक संघार के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए !कि परमात्मा इन जीवों  की आत्माओं को शांति प्रदान करे !और अल्लाह ताला से यह गुजारिश करनी चाहिए !कि मुसलमानो को इस खूंख्वार क़ुरबानी के बजाय किसी और अहिंसक कुर्बानी का मार्ग बताये !क्योंकि अल्लाह दयावान हैं !तो फिर ये करोङों जीव उसकी दया से वंचित क्यों हैं ?
18(78)Yogeshwara Krishna and ARjuna combination of yukti and Shakti or Neetior BAl(policy and strength,) would bring prosperity, victory, expansion and sound policy(srih, vijayoh, bhootih,dhruvaneetih) this is my understandig' Lord krishna an incarnation of God in human form is amply delineated in Gita and Mahabharat and Arjuna an Incarnation of ancient Rishi Nara have taken birth to eliminate adharma the preserver and reserviore of greed injustice partiality anger and all sorts of creater of troubles in the smooth running of society and annihilator of good persons etc. and to establish dharma means eradication of lust, anger and greed dominated lives without which the lives of entire creation could not subsist on this planet known as earth' Divine message is for the entire world it is a clarion call to stand against adharma to drive it out from every nook and corner of human lives

Saturday, 10 September 2016


आज ऋषि परम्परा को सामाजिक जीवन में प्रवेश करा देने वाले महान ऋषि आचार्य विनोबा भावे का जन्मदिन है !उनकी जीवन साधना अपने नाम धाम को परम शक्ति में बिलीन कर देने की थी !यही ऋषि परंपरा भारत की आध्यात्मिक परंपरा रही है !जिसमे उपनिषद जैसे सूक्छम आध्यात्मिक ज्ञान को विश्व को देने वालों के नाम धाम का सही पता लगा पाना आज भी खोज और शोध का विषय बना हुआ है !भले ही विनोबा का प्रयत्न लोकदृष्टि से बचने का रहा हो !किन्तु गांधी जी जिन्हे राष्ट्र पिता कहा जाता है !और जिनकी पहचान विश्व पटल पर महापुरुषों के महा पुरुषों के रूप में जानी जाती है !उन गांधी जी ने विनोबा को पत्र लिख कर कहा था !कि विनोबा में नित्य प्रति सेकंडों लोगों से मिलता हूँ !किन्तु तुम्हारे जैसी पवित्र आत्मा का दर्शन नहीं होता है ! !लोकप्रतिस्ठा से दूर रहने वाले विनोबा ने इस पत्र को भी रद्दी की टोकरी में फेक दिया था !किन्तु विनोबा का जीवन लोकसेवा का अनूठा उदहारण पेश करता है !इसीलिए उसको कितना भी छिपाया जाय !उसको तो उजागर होना ही पड़ेगा !विनोबा को हम सर्वोदय के जनक के रूप में स्मरण कर सकते हैं !गांधी के निधन के समय सर्वोदय एक बीज रूप मन्त्र के रूप में विद्यमान था ! यह शव्द अभी बहुजन समाज के लिए अपरिचित था ! मार्च १९४८ में जब गांधी जन सेवाग्राम में मिले तब गांधी परिवार को सर्वोदय समाज नाम देने के लिए गांधीजन तैयार नहीं थे ! लोगों का कहना था कि अगर गांधी जनो सर्वोदय समाज नाम दिया जाएगा तो देश का बहु संख्यक समाज इसे समझ नहीं पायेगा ! तब विनोबा कहा अगर इसे गांधी जन अपनी कृति से लोगों के सामने उतारेंगे तो लोग इसे आसानी से समझ जाएंगे ! उन्होंने कहा इसके लिए तपस्या करनी होगी गांधी जी कि यही विरासत है अभी यह विचार बीज रूप में गांधी जी द्वारा बोया गया है ! और वह अंकुरित होकर फूलेगा फलेगा और सारी दुनिया मै फैलेगा हम को अपने चिित के मेल धो डालने होंगे ! हम नए मनुष्य बनेगे ! अहिंसा का संशोधन करेंगे !अपनी आत्मशक्ति का निरीक्छण करेंगे ! विनोबा अब इस मिसन के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो चुके थे !इसिलए घोषणा कर दी की जब तक भूदान यज्ञ का कार्य सिद्ध नहीं होगा तब तक आश्रम का आश्रय भी छोड़ता हूँ ! यह अहिंसक क्रांति का यज्ञ है ! युग पुरुष की मांग है ! मुझे ५ करोड़ एकड़ जमीन चाहिए !विद्वान चाहे मुझे पागल समझें ! मेरे हाथ में रत्न चिंतामणि आगया है ! मुझे एक जीवन कार्य मिल गया है ! अब तक बे अकेले ही थे ! शुरू में देशभर में उनकी अकेले ही यात्रा चलती रही ! परन्तु अद्भुत मस्ती में चलती थी ! बे कहते थे सूर्य अकेला ही चलता है ! बाद में हवा फैलती गयी साथी जुड़ते गए तो कहने लगे अब में शहस्त्रा बाहु बन रहा हूँ !इस तरह गांधी जी के आश्रम का एक अपरिचित आश्रम बासी लोक ह्रदय में प्रेम और आदर का स्थान पाता गया ! विनोबा ने सर्वोदय के मन्त्र को समाज व्यापी बना दिया !और सारे समाज का उत्थान हो ! समाज में नैतिक ताकत का विकास हो ! जनता का सामूहिक गुण विकास हो ! ऐसा एक व्यापक आंदोलन चलाया ! सर्वोदय का दर्शन प्रत्यक्छ व्योहार में प्रितिस्ठित हुआ ! आंदोलन के कुछ साथी थके ! कुछ विचलित हुए ! सर्वोदय का सन्देश पहुंचाने में १२ साल लग गए ! समस्त देश की एक प्रदिक्छ्णा पूरीहुई !तेरह साल तीन महीने तेरह दिन के बाद अपने आश्रम में बापिस पहंचे ! बिनोबा ने कहा था कि विश्व आत्मा और मानव आत्मा जुड़े यह युक्ति ही मुक्ति है !ऐसी खोज में विनोबा जी सारे जीवन लगे रहे !यह गांधी विनोबा की विरासत है !और गांधी जन को तदनुसार जीवन जी कर इसे लोकजीवन में उतारने का काम करना है !

Friday, 9 September 2016

उल्टी समझ---------- कभी इस देश में ऐसा जीवन जीते थे ,कि शरीर रोग मुक्त और जीवन न्याययुक्त होता था  !किन्तु जब बुद्धि उलट जाती है !तो जीवन में खान पान और रहन सहन को तो ठीक किया नहीं जाता है  किन्तु शरीर को रोग मुक्त करने के लिए अस्पताल और न्याय के लिए न्यायालय खोलने की मांग की जाती है ! ऐसा ही आज समाज में देखा जा रहा है !कभी इस देश में दूध घी की नदियां बहती थी !गाय का दूध घी अमृत था !गाय भारतीय अर्थ व्यबस्था की रीढ़ थी !इसीलिए स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर की आवश्यकता और कर्ज के लिए साहूकार की जरुरत नहीं थी !पृथ्वी से स्वास्थ्य वर्धक अन्न ,और सब्जियां दालें आदि पैदा होती थी !सारी पृथ्वी स्वाथ्यवर्धक वायु छोड़ा ने वाले, पेड़ों और सुगंध विखेरने वाले पौधों से सजी हुई थी ! लोग आर्थिक दृष्टि से स्वाबलंबी थे !जनसँख्या नियंत्रित थी !जीवन सभी प्रकार के दम्भ पाखंड झूठ आदि से मुक्त था !इसीलिए न्यायालयों की आवश्यकता नहीं थी !नाम मात्र की पुलिस थी !और क़त्ल और बलात्कार अदि शायद ही कभी होते थे !विवाद गांव में भी सुलझ जाते थे !ना कोई वकील था और ना न्यायालय थे !आज स्थिति बुद्धि  उल्टी हो जाने से पलट गयी है !अब स्वार्थी लोग ही   .समाज को अपने छुद्र स्वार्थों का साधन बनाने वाले समस्त जिम्मेदार पदों पर काबिज हैं ! उन लोगों की संख्या अपेक्छा कृत कम है जिनका ध्येय सिर्फ समाज सेवा होता है !इसिलए दूध देने वाले पशुओं का क़त्ल कर उनके मास का सेवन और निर्यात किया जा रहा है !पृथ्वी को ब्रक्छ मुक्त किया जा रहा हे !पहाङो से गिट्टी और जमीन से मिटटी खोद कर आम जन के सामने पर्यावरण प्रदूषण का संकट खड़ा हो गया है !बाजारों में नकली मिलाबटी खाद्यान स्वास्थ्य नष्ट करने वाली साम्रग्री विक रही है !स्वास्थ्य विगड़ने वाले इन सभी साधनो के मध्य अस्पतालों ,मेडिकल कॉलेजों के खोलने की मांग बढ़ रही है !डॉक्टरों के यहाँ  मरीजों की भीड़ बढ़ रही  है डॉक्टर लोग मरीजों से मनमानी फीस ऐंठ रहे हैं ! सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर तनख्व्वाह सर्कार से लेते हैं और मरीजों का इलाज अपने नर्सिंग होमों में करते हैं ! नए नए रोग उत्पन्न हो रहे हैं !बेईमानी पराकाष्ठा पर है !क़त्ल ,बलात्कार आये दिन होते रहते हैं !अपराध थाने और न्यायालय खुलने से कम नहीं बल्कि बढ़ जाते हैं !अस्पताल और न्यायालय भ्रष्टाचार के केंद्र हैं !इन सबको देखते हुए भी  इन से लाभ लेने वाले लोग इन्ही  के लिए मांग कर रहे हैं! स्वार्थी लोग अपने आप सुधरते नहीं है !क्योकि उनकी जीवन चर्या का मुख्य कार्य येन केन प्रकारेण अपने नाम को प्रकाशित करने और दाम को बढ़ाने में लगा रहता है ! यह कार्य सिर्फ आत्मनिष्ठ स्वार्थ मुक्त परमार्थ सेवी मनुष्य करते हैं !यह कार्य देश में हो भी रहा है !किन्तु स्वार्थी लोगों के पास विपुल राजनीतिक शक्ति और आर्थिक संसाधनों पर आधिपत्य होने के कारण और गपोड़ियों और  ,चमचों के हाथों वैचारिक मंचों के होने के कारण उपयोगी स्वस्थ विचार प्रवाह  का मार्ग भी अविरुद्ध हो गया  है! इसीलिए     ये रचनात्मक कार्य उतना परिणाम प्राप्त नहीं  कर पा रहे हैं !जो देश को स्वाथ्य और न्याय स्वाभाविक रूप से प्राप्त कराने में सहायक हों ! 

Thursday, 8 September 2016

गांधीजी की हत्या पर हुई नयी बहस ------ गांधीजी की हत्या के समस्त साक्छ्य और कारण प्रकाश में आचुके हैं !फिर भी तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है ! गांधीजी के अंतिम दिनों का म्रत्यु पर्यंत समस्त विवरण लास्ट फेज ऑफ़ महात्मा में दिया गया है !इस पुस्तक का हिंदी अनुबाद भी पूर्ण आहुति के शीर्षक से ४ भागों में प्रकाशित हो गया है ! पूर्ण आहुति के प्रथम खंड के पृष्ठ ११३ से गाँधी जिन्ना  की बार्ता   जो ९ सितंबर १९४४ से शरू होकर १८ दिन तक जिन्ना के मुम्बई  स्थित आवास  माउन्ट प्लेजेंट रोड पर हुई थी  जिसमें गांधीजी  ने देश का बटवारा ना करने के लिए जिन्ना को  समझाने का भरसक प्रयत्न किया था !किन्तु जिन्ना बिभाजन की मांग पर दृढ था और उसने गांधीजी की बात को सिरे से अस्वीकार कर दिया था !गाँधी जिन्ना की इस मुलाकत का हिंदुओं का एक वर्ग विशेषतः हिन्दू महासभा के सदस्य तीब्र विरोध कर रहे थे  ! उन्होंने सुचना दी थी कि बे बापू को झोपड़ी से नहीं निकलने देंगे ! उन्होंने गांधीजी की झोपड़ी के तीनो तरफ रास्तों में स्वयं सेवक बैठा दीये थे ! सुबह पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट ने टेलीफोन पर सुचना फोन पर दी  थी कि स्वयं सेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं इसीलिए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था ! तलाशी लेने के बाद एक स्वयं सेवक से बड़ा छुरा बरामद हुआ था !पुलिस अफसर ने उनसे कहा  कि यह काम आपलोग अपने नेताओं पर क्यों नहीं छोड़ देते हैं !उसका जबाब था कि गांधीजी के लिए यह अधिक सम्मान की बात होगी इस काम के लिए तो जमादार  ही काफी है ! जिस व्यक्ति का जमादार के नाम से उल्लेख किया गया था वह नाथू राम गोडसे था ! और उसी ने साढ़े तीन साल बाद गांधीजी की हत्या की थी !एक झूठी खबर यह फैलाई जा रही है कि ३० जनबरी को उनकी अंतिम मुलाकात सरदार पटेल के साथ हुई थी किन्तु बात चीत किस विषय पर हुई थी इसका विवरण ज्ञात नहीं है !पूर्ण आहुति के खंड ४ में पटेल और गांधीजी की बात चीत का पूर्ण विवरण पृष्ठ ४६४ पर दिया गया हैं!४ बजे उसदिन की मुलाकातें समाप्त हुई ! इसके बाद गांधीजी पटेल और उनकी पुत्री को लेकर अपने कमरे में चले गए  !गांधीजी ने पटेल से कहा कि मेरा पहले यह विचार था कि आप या जवाहर लाल को मंत्री मंडल से हटा दिया जाय लेकिन अब में निश्चित तौर पर इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि दोनों का मंत्रिमंडल में रहना आवश्यक है ! आप दोनों की जरा सी भी फूट इस स्थिति में विनाशकारी सिद्धि होगी ! इस विषय पर में शाम की प्रार्थना सभ में भी बोलूंगा !पंडित नेहरू प्रार्थना सभा के बाद मुझ से मिलेंगे उनसे भी मैं इस प्रश्न की चर्चा करूँगा ! ३० जनबरी को मालिश के बाद उन्होंने राष्ट्र के नाम अपना अंतिम वसीयत नामाअपने सचिव को दिया और कहा इसे सावधानी से पढलो और कोई बात रह गयी हो तो उसे जोड़ देना ! मेने इसे भारी तनाव  में तैयार किया है !इसी अंतिम वसीयतनामे में गांधीजी ने कांग्रेस को लोकसेवक संघ के रूपमें परिवर्तित करने  के लिए कहा था !उसी दिन प्रार्थना सभा में जाते समय उनकी हत्या कर दी गयी थी !कांग्रेस कार्य समिति ने गांधी जी के अंतिम वसीयत नामे पर विचार कर कांग्रेस को लोकसेवक संघ में बदलने का विचार किया था !किन्तु उस समय की विकराल परिस्थिति को देखते हुए कांग्रेसियों का यह मत था कि कांग्रेस  को भंग करने के बाद इस देश की जिम्मेदारी कौन ग्रहण करेगा ? !गांधीजी यदि जीवित होते तो इसको सम्भाल लेते !जिन लोगों ने गांधीजी की हत्या के लिए माहौल ख़राब किया और गांधीजी की हत्या करुबाई !इसकी कीमत देश को बहुत महँगी  पड़ेगी ! 

Wednesday, 7 September 2016

18(71) shradha is foundation to enter in the king dom of God shraddha developes devotion and once devotion is developed asuya (habit of seeing vices in virtues) evaporates and the seeker creates in him self to hear the abilty of Divine message and gates of grasping and adopting it in life open.Here lord krishna says that man full of faith (shraddha) and devoid of searching vices(Asuya)invirtues hears this song celestial he is relieved from all his sins and attain the abode of virtuous persons this means he understands fully well the meaning of Nishkamkarma and adopt in in his life hence enjoys Jeevan mukti in life and after death attains the lokas where saints reside He realises Atmaloka in living life and after death live in Sanatan Atmaloka
18(72)Only those seekers would get light from this divine message who will hear it with utmost attention and make it live in their life faqbric. The divine light thus gained would relieve seeker from Moha which emerge from agyan that means no real knoledge of Soul and body. Bodies are made of five Elements Earth water air fire sky and is subject to continuous change and decay and the soul which creates Chetana(consciouness) is imperishable and changeless when this factum of body and soul is well enshrined in the inner tools (mind buddhi chitta and Ahankar) of seeker attachment to ephemerral things evaporate like snow and Ignorance is converted in exact knowledge.Here lord krishna asks Arjuna whether he has heard this Divine dialogue with rapt attention and whether his attachment(Moha) born of Agyan(ignorance) has ended if not GUru Krishna may adopt some other method to relieve him from his moha'(moodhata).

Tuesday, 6 September 2016

18(70) Those who would study this spiritual dialogue between Me and Arjuna this will according to Me would be My worship by Gyanyoga. Gyan (knoledge through words) merely by words is not is not Gyan Whatever a person learns through words when turns in to action and the result of action when becomes the part and parcel of his life than it becomes Gyan in spiritual sense and when this spiritual gyan is offered means laid at the feet of lord that means become the vehicle of adoration of glory of God than it becomes Gyanyoga and this Gyan yoga becomes the worship of God Hence the study of this spiritual dialogue which delineates the Tattva(epitome) of DHarma (real meaning of spiritual life) is the worship of Lord by means of Gyanyoga.

Monday, 5 September 2016

आपने बहुत उत्तम गीता के श्लोकों का चयन किया है !यद्द्पि यह कहना कठिन है ! कि गीता का कौनसा श्लोक जीवन के लिए उपयोगी नहीं है !सभी महापुरुषोँ और गीता के भाष्यकारों ने अपनी रूचि विश्वास और जन हित को ध्यान में रख कर गीता के श्लोकों का चयन किया है !महान ग्यानी अद्वैत मत के स्थापक शंकराचार्य ने गीताके भक्ति परक श्लोक को गीता सार कहा है ११(५५)आचार्य विनोबा भावे ने ४(१०)को कहा है कि भगवान को कर्म ज्ञान उपासना और मोक्ष के सम्बन्ध में जो कुछ कहना था वह इस श्लोक में कह दिया है !स्वामी रामसुख दास ने कहा है कि ४(२३ )कर्मयोग का मुख्य श्लोक है !गांधी जी गीता के २(५४से७२)के समस्त श्लोकों को कर्म कोष कहते थे !गांधी आश्रम की दैनिक प्राथनाओं में इन श्लोकों का दैनिक सुबह शाम पाठ किया जाता है !रामनुजा चार्य के गुरु यामुनाचार्य ने ७ श्लोकों को छांट कर सप्त श्लोकी गीता लिखी है !इस प्रकार गीता ग्रन्थ से सभी मनुष्योँ की लौकिक पारलौकिक और आध्यात्मिक समस्यायों का जैसा समाधान होता है !वेशा किसी भी धर्म के अन्यग्रंथों से नहीं होता है !यह धर्मग्रन्थ विश्व के सभी आध्यात्मिक व्यक्तियों का नूरे चश्म रहा है !किन्तु हम भारत बासी इतने दुर्भाग्यी है कि इस ग्रन्थ रत्न को विद्यालयोँ में पढ़ाने में गुरेज करते हैं !

Sunday, 4 September 2016

कश्मीरी पंडितों के लिए अलग केंद्र शासित राज्य की मांग -------- अपने गृह कश्मीर घाटी से अलगॉव बादी कट्टर पंथी मुसलामानों के कारण १९९६ से दर बदर शरणार्थी के रूप में भटक रहे कश्मीरी पंडितों के लिए प्रथक केंद्र शासित राज्य ही एक मात्र विकल्प है !देश में सुरक्छा के लिए भटक रहे इन कश्मीरी पंडितों को न्याय की आशा दिखाई नहीं दे रही है ! इन्होंने अपनी बहिन बेटियों को जिस तरह से बेइज्जत होते देखा है ,अपनी पुश्तेनी संपत्ति को लुटते और पूजास्थलों को टूटते हुए देखा !और देश से पलायन करना पड़ा इसके बाद इन लोगों को उन्ही क्रूर दानवों के साथ रहने को विवश किया जाय यह तो अन्याय की पराकाष्ठा होगी !इनके साथ घोर अन्याय होता रहा !और राज्य की और केंद्र की सरकार मूक दर्शक बनी रही !इस से बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है ? क्या ऐसे नेता विश्वास योग्य हो सकते हैं ? क्या ऐसी शासन व्यबस्था से रक्छा ,सुरक्छा की गारंटी हो सकती है ? जहाँ अलगाव वादी शांति की प्रस्तावना लेकर जाने वाले विपक्छी सांसदों से उनके घर पहुंचने पर भे मिलने से इनकार कर दें !और सारी वेशर्मी को पार करके देश से ये कहा जाय कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है !और उन अलगॉव बादियों से बात की जाय जो अपना आपको भारत का न तो नागरिक मानते है और न संविधान को मानते हैं !  इस स्थिति में पंडितों के सामने दो ही विकल्प हैं यातो बे मुसलमान बन जाएँ या फिर उनको अलग केंद्र शाषित होम लैंड प्रदान कराया जाय !उनको मुसलमान नहीं बनाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अन्य कश्मीरियोंकी तरह धर्म परिवर्तन अब तक नहीं किया है !अलग होम लैंड देना सरकार का काम है !जो सरकार  शायद ही करे !लेकिन किसी भी स्थिति में का श्मीरी पंडितों का पुनर्वास इन अलगपबादी कट्टर पंथियों के साथ नहीं होना चाहिए ! 
शिक्छक दिवस -------- देश में शिक्छाविद डॉ राधाकृष्णन की स्मृति में शिक्छक दिवस उनके जन्म दिन ५ सितंबर को मनाया जाता है !इस दिवस पर भारत के राष्ट्रपति योग्य शिक्छकों को सम्मानित भी करते हैं !देश के सभी भागों में इस दिवस पर अवकाश प्राप्त शिक्छकों को खोज कर उनको भी सम्मानित किया जाता है !वेद में शिक्छकों का वर्णन आता है ! शिक्छकों के खास दो गुण होते हैं ---- पथिकृद , विचक्चकणः! पथिकृत यानी पाथ फाइंडर ,रास्ता खोजने वाला !एक बार रास्ता बन जाएगा ,तो फिर सब लोग उस पर चलेंगे  परंतु पहले रास्ता खोजने और बनाने का काम शिक्छकों का है ! मार्ग खोजने वाला कौन बनेगा ? जो विच्छकन होगा वही मार्ग खोजने वाला बन सकेगा ! विचक्छण यानी चरों तरफ देखने वाला ऐसा मनुष्य रास्ता खोजता है और नया रास्ता बनाता है !प्राचीन भारत में इसीलिए शिक्छक गुरु कहलाता था !और वह  अपनी कृति से ही सम्मानित होता था ! भारत की इस ऋषि प्रणीत वेद प्रतिपादित श्रेष्ठ गुरु परंपरा का पालन और निर्वहन भारत को विश्व गुरु की पदवी से विभूषित कर सकता है !किन्तु आधुनिक समय में तो यह स्वर्णिम स्वपन ही दिखाई देता है ! शायद समय बदले और ऐसा दिखे ? यह स्थिति कोई कोरी कल्पना नहीं है !यह भारत में थी !इसीलिए फिर भी हो सकती है !डॉ राधाकृष्णन इसी ऋषि परंपरा के प्रितिनिधि थे !इसीलिए उनका स्मरण राष्ट्रपति के रूप में नहीं शिक्छक के रूप में किया जाता है ! 

Saturday, 3 September 2016

18(63)Lord Krishna tells that He has divulged Guhyat Guhyataram now it is for Arjuna to activate this in his life or not he should ponder over it and then whatever his desire is he should act accordingly.here Bhagwan has given him freedom to act according tohis desire or not to act.But Arjuna had surrendered himself at the feet of Lord Krishna by sayingSisyteham Sadhi mam twam Prapannam 2(7)so how Arjuna could act of his own without getting clear mandate from Lord Krishna because once deciple surrenders(Sarnagati) he has to follow the mandate of Jagad Guru krishna and the mandate of sri Krishna has been continuously Nirashi Nirmamo bhutwa Yuddhaswa Bigat Jwarah3(30) so how Arjuna could act against this hence he did not respond and remained silent and the true mandate emerged in following Slokas to which Arjuna gave his willingness and acted upon.
18(64)Now Lord krishna discloses Sarvaguhyatam which means guides Arjun and through Arjuna to all seekers the kernel of geetas preaching. to whome this preaching can be given to him only who has become dear to lord krishna by surrendering himself unconditionally at the feet of almighty. Karmayoga, gyanyoga are given to devotees who Satat yuktanam bhajati Lord with unflinching devotion Sharnagati is the Sumum Bonum of geetas message and that is the secrets of secrets which has been continuously repeated and here again lord lay emphasis Bhuyah srunu may Parmamvachah means hear My most valued Words

Friday, 2 September 2016

साधु संत कहते हैं कि दिव्य बिंद्राबन धाम चर्म चक्छुओं से दिखाई नहीं देता है !भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं और लीला धाम का दर्शन सिर्फ ज्ञान दृष्टि संपन्न साधू संतों को भगवान की कृपा से ही होता है !भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं ही गीता में इस रहस्य का उदघाटन करते हुए ७(२५)में कहा है यह जो मूढ मनुष्य समुदाय मुझे अजन्मा और अविनाशी ठीक तरह से नहीं जानता उन सबके सामने योगमाया से अच्छी तरह ढका हुआ में प्रगट नहीं होता हूँ ! भगवान अवतार काल में में सबके सामने प्रगट होते हुए भी मूढ मनुष्योँ को भगवद रूप से न दिखकर मनुष्य रूपमे ही दीखते हैं ! मनुष्य अपने भावों के अनुसार ही योग माया से आब्रत्त भगवान को देखते हैं ! भगवान अलौकिक और अजन्मा तथा अविनाशी होते हुए भी योग माया से ढके रहने के कारण लौकिक और सामान्य मनुष्योँ की तरह लौकिक प्रतीत होते हैं !किन्तु उनके दिव्य जन्म और कर्मोँ का ज्ञान तो उनके भक्तोँ को ही उनकी कृपा और अनुकम्पा से होता है !दिव्य बृन्दावन के आध्यात्मिक रहस्य का साक्छात अनुभव करने वाले सिद्ध साधू महात्मा आज भी बिंद्राबन और ब्रिज छेत्र में भगवान कृष्णा की दिव्य लीलाओं का दर्शन और अनुभव करते हुए साधना रत है !निधि बन की रास लीला भी ऐसे ही श्री राधा कृष्णा प्रेम में अनुरक्त संत महात्माओं को ज्ञान चक्छुओं से ज्ञात होती है !

Thursday, 1 September 2016

इन स्थूल कथाओं के रूप में भगवान श्री कृष्णा का भगवद स्वरुप प्रदर्शित किया गया है !ये सब कथानक भगवान के अवतरण के हेतु को पुष्ट करते है !इनको समझने के लिए आध्यात्मिक रथ पर सवार होकर आत्मा की शक्ति और सौंदर्य को समझने के लिए आत्मसाधना करनी होगी !और जो लोग भौतिक दृष्टि से इन कथाओं को सुनते हैं !उन्हें भी अपनी समझ विक्सित करनी होगी कि कोई भी देहधारी मनुष्य विवाहित ८पत्नियो के अतिरिक्त १६००० युवतियोँ को शारीरिक शुख प्रदान नहीं कर सकता है !भगवान सूत्र रूप में गीता में ४(९,१०)में कहते हैं कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं जो मनुस्य तत्त्व से जान लेता है ! वह शरीर का त्याग करके मुझे ही प्राप्त होता है ! उसका पुनर्जन्म नहीं होता है ! राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरी भक्ति में तल्लीन तथा ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे स्वरुप को प्राप्त हो चके हैं ! श्लोक ८ में कहते हैं कि साधुओं की रक्षा करने के लिए और पापियों का विनाश करने के लिए और धर्म की भलीभांति स्थापना करने के लिए में युग युग में प्रगट होता हूँ !कृष्णा की प्राप्ति काम मुक्ति से होती है भोग प्रधान जीवन से नहीं