Friday, 9 September 2016

उल्टी समझ---------- कभी इस देश में ऐसा जीवन जीते थे ,कि शरीर रोग मुक्त और जीवन न्याययुक्त होता था  !किन्तु जब बुद्धि उलट जाती है !तो जीवन में खान पान और रहन सहन को तो ठीक किया नहीं जाता है  किन्तु शरीर को रोग मुक्त करने के लिए अस्पताल और न्याय के लिए न्यायालय खोलने की मांग की जाती है ! ऐसा ही आज समाज में देखा जा रहा है !कभी इस देश में दूध घी की नदियां बहती थी !गाय का दूध घी अमृत था !गाय भारतीय अर्थ व्यबस्था की रीढ़ थी !इसीलिए स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर की आवश्यकता और कर्ज के लिए साहूकार की जरुरत नहीं थी !पृथ्वी से स्वास्थ्य वर्धक अन्न ,और सब्जियां दालें आदि पैदा होती थी !सारी पृथ्वी स्वाथ्यवर्धक वायु छोड़ा ने वाले, पेड़ों और सुगंध विखेरने वाले पौधों से सजी हुई थी ! लोग आर्थिक दृष्टि से स्वाबलंबी थे !जनसँख्या नियंत्रित थी !जीवन सभी प्रकार के दम्भ पाखंड झूठ आदि से मुक्त था !इसीलिए न्यायालयों की आवश्यकता नहीं थी !नाम मात्र की पुलिस थी !और क़त्ल और बलात्कार अदि शायद ही कभी होते थे !विवाद गांव में भी सुलझ जाते थे !ना कोई वकील था और ना न्यायालय थे !आज स्थिति बुद्धि  उल्टी हो जाने से पलट गयी है !अब स्वार्थी लोग ही   .समाज को अपने छुद्र स्वार्थों का साधन बनाने वाले समस्त जिम्मेदार पदों पर काबिज हैं ! उन लोगों की संख्या अपेक्छा कृत कम है जिनका ध्येय सिर्फ समाज सेवा होता है !इसिलए दूध देने वाले पशुओं का क़त्ल कर उनके मास का सेवन और निर्यात किया जा रहा है !पृथ्वी को ब्रक्छ मुक्त किया जा रहा हे !पहाङो से गिट्टी और जमीन से मिटटी खोद कर आम जन के सामने पर्यावरण प्रदूषण का संकट खड़ा हो गया है !बाजारों में नकली मिलाबटी खाद्यान स्वास्थ्य नष्ट करने वाली साम्रग्री विक रही है !स्वास्थ्य विगड़ने वाले इन सभी साधनो के मध्य अस्पतालों ,मेडिकल कॉलेजों के खोलने की मांग बढ़ रही है !डॉक्टरों के यहाँ  मरीजों की भीड़ बढ़ रही  है डॉक्टर लोग मरीजों से मनमानी फीस ऐंठ रहे हैं ! सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर तनख्व्वाह सर्कार से लेते हैं और मरीजों का इलाज अपने नर्सिंग होमों में करते हैं ! नए नए रोग उत्पन्न हो रहे हैं !बेईमानी पराकाष्ठा पर है !क़त्ल ,बलात्कार आये दिन होते रहते हैं !अपराध थाने और न्यायालय खुलने से कम नहीं बल्कि बढ़ जाते हैं !अस्पताल और न्यायालय भ्रष्टाचार के केंद्र हैं !इन सबको देखते हुए भी  इन से लाभ लेने वाले लोग इन्ही  के लिए मांग कर रहे हैं! स्वार्थी लोग अपने आप सुधरते नहीं है !क्योकि उनकी जीवन चर्या का मुख्य कार्य येन केन प्रकारेण अपने नाम को प्रकाशित करने और दाम को बढ़ाने में लगा रहता है ! यह कार्य सिर्फ आत्मनिष्ठ स्वार्थ मुक्त परमार्थ सेवी मनुष्य करते हैं !यह कार्य देश में हो भी रहा है !किन्तु स्वार्थी लोगों के पास विपुल राजनीतिक शक्ति और आर्थिक संसाधनों पर आधिपत्य होने के कारण और गपोड़ियों और  ,चमचों के हाथों वैचारिक मंचों के होने के कारण उपयोगी स्वस्थ विचार प्रवाह  का मार्ग भी अविरुद्ध हो गया  है! इसीलिए     ये रचनात्मक कार्य उतना परिणाम प्राप्त नहीं  कर पा रहे हैं !जो देश को स्वाथ्य और न्याय स्वाभाविक रूप से प्राप्त कराने में सहायक हों ! 

No comments:

Post a Comment