Friday, 16 September 2016

 राष्ट्रीय सोच ---------- प्रत्येक देश को परिस्थित और समय के अनुसार चलना पड़ता है !भूतकाल की अच्छी बातें जो समय और परिस्थिति के अनुसार प्राणियों के हित के लिए आवश्यक हों उन्हें ग्रहण करना चाहिए और जो अनावश्यक और अनुउपयोगी हैं उन्हें त्याग कर आगे बढ़ना चाहिए ! इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी ,कर्तव्य निष्ठां का अभाव ,पर्यावरण प्रदूषण और लोकतान्त्रिक संस्थाओं का सही दिशाओं में गति प्रदान करने का है !भारत धर्म प्रधान देश है !और इसमें भारत में जन्म लेने वाले धर्मों के अलावा विश्व के दो बड़े  धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म भी है !इन सबमें भी समन्वय  रखना आवश्यक है !जनसँख्या बृद्धि भी बहुत बड़ी  समस्या है !इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए युवाओं की ऊर्जा का प्रयोग होना चाहिए !युवाओं में इस प्रकार का सोच विकसित और निर्माण करने के लिए . जिम्मेदार लोगोंको अपने आचरण  को सुधार कर के  सिद्ध करना चाहिए ! यदि बृद्ध  पुरुष और जिम्मेदार लोग अपने आचरण में सुधार नहीं करते हैं !तो युवाओं को गाँधी ,सुभाष ,डॉ हेडगेवार और आजाद तथा मदर टेरेसा अदि के जीवन प्रसंग और इस देश की महान ऋषि परंपरा और महापुरुषों के जीवन बृतान्त कोई लाभ नहीं पहुंचा सकते हैं !कथनी से अधिक करनी का असर पड़ता है !गीता में कहा गया है !यति यति आचरती   श्रेष्ठः  तत एव इतरः जनः ------- जैसा श्रेष्ठ पुरुष आचरण करते है उसी का अनुसरण समाज के अन्य लोग भी करते हैं !कहने से  चार गुणा असर करने का पड़ता है !इसीलिए सबसे बड़ी जरुरत सदाचरण की है सद्वाक्यों की नहीं !और हिंसा ,द्वेष भाव ,घृणा ,झूठ आदि की तो बिलकुल नहीं है !इसीलिए युवाओं के इन घोर स्वार्थनिष्ठ ,लोकतंत्र विध्वंसक ,निम्न स्वार्थों को पूर्ति में संलग्न  धर्म ,नीति ,सदाचार ,विकास अदि की बातों को बहुत महत्त्व ना देकर इनके स्वार्थ पूर्ति का साधन ना बनकर ,इनके जिन्दा ,मुर्दाबाद के नारों को बुलंद करने के स्थान पर अपनी दृष्टि उन उन निश्वार्थ समाज सेवकों की और केंद्रित करना चाहिए ,जिनका दर्शन ना संवैधानिक संस्थाओं में होगा ,ना भाषण मंचों पर होगा !बे वहां समाज के नवनिर्माण में कार्य करते मिलेंगे जहाँ न समाचार पत्रों की दृष्टि जाती है और ना चैंनलों की ! इसीलिए रचनाधर्मिता को जीवन में स्थान दो और अपने आपको गपोड़ियों के चुंगल से मुक्त करो !स्वाबलंबी जीवन को विकसित करो !और इन स्वार्थनिष्ठ गप्प बाजों के स्वार्थ के साधन ना बनो !

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