१--- जो ज्ञानी ,योग युक्त ,तथा मन और इंद्रियों को वश में रखने वाले हैं ! ,उन पर आसक्ति का प्रभाव उसी प्रकार नहीं पड़ता है जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता है !
२----- विवेकिजन आसक्ति को आत्मा का अच्छेद बंधन मानते हैं ! जब तक आसक्ति व्यक्तियों की स्तुति और गुणगान में रहती है तब तक ऐसे मनुष्य राग द्वेष के भंवर जाल में फंस कर अपनी मानसिक शांति और समाज में अपनी सामर्थ्य भर विद्वेष फैलते रहते हैं !किन्तु जब यही आसक्ति संतों के प्रति हो जाती है तो मोकछ का खुल द्वार बन जाती है ! संतों के समाज में सदा पवित्र हरि चर्चा और श्री हरि के गुणों का गान होता रहता है जिससे विषय भोग और मनुष्यो की निंदा और स्तुति बार्ता पास नहीं आने पाती है !मनुष्य की बुद्धि भोग परायण ना रहकर योग परायण हो जाती है और उसकी आँखों से स्वार्थ बृत्ति का चश्माउतर जाता है और परमार्थ दृष्टि विकसित होने लगाती है !
३----- विषय भोगों के प्राप्त ना होने पर जो त्याग करता है वह त्यागी नहीं है ! अपितु जो विषय भोगों के प्राप्त होने पर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है वस्त्तुतः वही त्यागी है !,वही वैराग्य को प्राप्त होता है ! उसके मन में किसी के प्रति द्वेष भाव ना होने के कारण वह निर्बेर तथा वन्धन मुक्त होता है! !
२----- विवेकिजन आसक्ति को आत्मा का अच्छेद बंधन मानते हैं ! जब तक आसक्ति व्यक्तियों की स्तुति और गुणगान में रहती है तब तक ऐसे मनुष्य राग द्वेष के भंवर जाल में फंस कर अपनी मानसिक शांति और समाज में अपनी सामर्थ्य भर विद्वेष फैलते रहते हैं !किन्तु जब यही आसक्ति संतों के प्रति हो जाती है तो मोकछ का खुल द्वार बन जाती है ! संतों के समाज में सदा पवित्र हरि चर्चा और श्री हरि के गुणों का गान होता रहता है जिससे विषय भोग और मनुष्यो की निंदा और स्तुति बार्ता पास नहीं आने पाती है !मनुष्य की बुद्धि भोग परायण ना रहकर योग परायण हो जाती है और उसकी आँखों से स्वार्थ बृत्ति का चश्माउतर जाता है और परमार्थ दृष्टि विकसित होने लगाती है !
३----- विषय भोगों के प्राप्त ना होने पर जो त्याग करता है वह त्यागी नहीं है ! अपितु जो विषय भोगों के प्राप्त होने पर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है वस्त्तुतः वही त्यागी है !,वही वैराग्य को प्राप्त होता है ! उसके मन में किसी के प्रति द्वेष भाव ना होने के कारण वह निर्बेर तथा वन्धन मुक्त होता है! !
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