इमं विवस्ते योगम प्रोक्तवान् अहम अव्ययम् ,विवस्वान मनुबे प्राह ,मनुः
इकछाब बे ब्रबीत ४(१) आजकल जिस योग का प्रचार बहुत जोर शोर से किया जा रहा
है! वह वास्तव में पूर्ण योग नहीं है !आसन प्राणायाम आदि बहिरंग योग है !
इनके करने से रोगों की निवृत्ति होती है ,शरीर स्वस्थ होता है !किन्तु
चित्त की शुद्धि और भोग बृत्ति का नाश नहीं होता है !जब तक व्यक्ति की
जीवनचर्या और आचरण में अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का
प्रवेश नहीं होता है ! तब तक उसकी जीवन
यात्रा पूर्ण योग की और प्रस्थान नहीं करती है !जब तक मनुष्य के अंतःकरण
में भोगों की कामना और भौतिक पदार्थों की सत्ता महत्ता है! और अपने कर्मों
से अपने यश कीर्ति मान आदि प्राप्त करने की इक्छा आकांछा है तब तक वह कामना
जनित संकल्पों का त्याग नहीं कर सकता है ! और कामना जनित संकल्पो का त्याग
किये बिना वह ज्ञान योगी, ध्यानयोगी, हठयोगी ,कर्मयोगी ,भक्ति योगी ,आदि
कोई सा भी योगी नहीं हो सकता है ! वह वास्तव में योगी के भेष में भोगी ही
होता है !इसलिए वर्तमान समय में योग भी भौतिक भोगों की प्राप्ति का बहुत
बड़ा साधन बन गया है !लोगों ने योग की दुकाने खोल ली है !और १०, ५ योगासन
प्राणायाम कराकर अकूत धन संपत्ति प्रतिष्ठा आदि प्राप्त कर रहे हैं !इन
तथाकथित योग के व्योपरियों में सत्य अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का नाम निशान
भी नहीं दिखाई देता है !ये तथाकथित योगी बड़ी बड़ी कारों में घूमते हैं !बहुत
विलासता युक्त जीवन जीते हैं !इनके अधिकाँश चेले चपाटे अनियमित कामजनित
भोगविलास युक्त जीवन जीने के कारणरुग्ण और अनैतिक उपायों से धन संग्रह के
कारण व्यथित चित्त होते हैं ! ये ही इनके चेले इनको अनीति से उपार्जित धन
आदि देते हैं ! यहाँ भगवान श्री कृष्ण जिस अविनाशी योग का उपदेश कर रहे हैं
!वह निष्काम कर्मयोग है !निष्काम कर्म योग का साक्छात उदहारण सूर्य है
!जिसके उदय होते ही अन्धकार का नाश हो जाता है !और प्राणिमात्र में जीवन का
संचार होजाता है !किन्तु सूर्यसब कुछ देता है किन्तु अपनी सेवाओं के बदले
कुछ भी नहीं लेता है !निर्लिप्त भाव से बिना किसी भेद भाव के सभी को प्रकाश
और ऊर्जा प्रदान करता है !सर्वप्रथम निश्वार्थ सेवा का ज्ञान परमात्मा से
सूर्य को प्राप्त हुआ !फिर सूर्य से मनु को प्राप्त हुआ !और मनु से
इकछाबाकु आदि राजऋषिओं को प्राप्त हुआ !!इस प्रकार यह निश्वार्थ निष्काम
कर्मयोग की परम्परा प्रारम्भ हुई ! जैसे धूल का एक कण भी पृथ्वी का ही अंश
होता है !उसीप्रकार श्रष्टि का प्रत्येक प्राणी इस विशाल ब्रह्माण्ड का ही
एक अंग है !इसी भाव से जो लोग अपना जीवन यापन करते हैं !और प्राणिमात्र की
सेवा में अपनी संपूर्ण सामर्थ्य और साधन सामग्री तथा शरीर को लगा देते हैं
बे ही सच्चे योगी होते हैं !उनकि दृष्टि मेँ सब मेँ बे और सब उनमे होते हैं
!इसीलिए उनके जीवन में भोग को भोगने की अवांछित कामना का नाश हो जाता है
अनैतिक भौतिक पदार्थों केसंग्रह की इक्छा का भी अभाव हो जाता है !उनकी मन
बुद्धि चित्त की संपूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्र की सेवा में अर्पित हो जाती
हैं !यह अविनाशी योग है जिसकी सिद्धि निष्काम कर्म से होती है !इसी को
निष्काम कर्मयोग कहते हैं !और सूर्य इसका ज्वलंत उदाहरण है !
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