यज्ञार्थ
कर्मणो अन्यत्र लोकोअयम् कर्मबन्धनः ! तदर्थम कर्म कौन्तेय मुक्त संगह
समाचर !३(९)यज्ञ को भ्रम वश कुछ लोगों ने सिर्फ घी , हवन सामग्री आदि को
प्रज्वलित अग्नि में मन्त्रों के द्वारा आहुति देने तक ही सीमित कर दिया है
!और यज्ञ को मात्र भौतिक मनोवांछित बस्तुओं की प्राप्ति का स्वार्थ युक्त
साधन बना दिया है !महाभारत में व्यासदेव ने कहा है कि शराब आसव मछली तथा
तिल चावल की खिचड़ी इन सब वस्तुओं को धूर्तों ने यज्ञ में प्रचलित किया है!
वेदों में इनका विधान नहीं है !जो यज्ञ कर्ता यज्ञ
के वास्तविक अर्थ को जानते हैं बे यज्ञों में परम शक्ति का ही विधि विधान
से आवाहन करते हैं !शुद्ध आचार विचार वाले महान सत्त्वगुणी पुरुष अपनी
विशुद्ध वासना से फल खीर आदि ही प्रसाद रूप में परमात्मा को अर्पित करते
हैं !आजकल भी यज्ञ का विकृत स्वरुप देखने में आता है !इन तथाकथित यज्ञों के
माध्यम से स्वार्थनिष्ठ यज्ञ करने वाले अनेक प्रकार से परमशक्ति का अनादर
करते देखे जाते हैं !इसीलिए यज्ञ के अनुष्ठान में विपरीत फल भी देखने को
मिलते हैं !कई यज्ञों में विधि विधान का यथोचित पालन न करने से श्रद्धालुओं
की मौत भी हो जाती है !यज्ञ करने वालों ने यज्ञ को मजाक बना दिया है ! और
यज्ञ का लोकहितकारी स्वरुप नष्ट कर दिया है ! यहाँ योग का वास्तविक अर्थ
और मर्म बताया गया है !यज्ञ से अत्यंत उदात्त लोकहित कारी बृत्ति का उदय
होता है ! और स्वार्थ निष्ठा नष्ट होती है !यज्ञ का वास्तविक अर्थ कर्तव्य
कर्मों का अनासक्त भाव से निर्बहन करना है !कर्तव्य कर्मों के करने से
लोकव्यबस्था सुचार रूप से चलती है !किन्तु कर्तव्य कर्म जब निष्काम भाव से
फलेक्छा के त्याग के साथ किये जाते हैं ! तब कर्त्तव्य पालन करने वाले
व्यक्ति को अद्भुत आंतरिक आत्मशांति की प्राप्ति होती है ! और उसकी कार्य
छमता में भी आश्चर्यजनक विकास होता है !और उसको जन्म मरण से मुक्ति का उपाय
भी सुलभता से प्राप्त हो जाता है !संसार में कुछ भी स्थिर स्थायी नहीं है !
सब कुछ विनाश की और जा रहा है !जिस शरीर से कर्तव्य कर्मों का निर्वहन
किया जा रहा है वह भी हर दिन मृत्यु की और जा रहा है !यह बात उसके चित्त
में स्थान लेने लगती है !इसीलिए निष्कर्ष रूप में यह तथ्य स्पष्ट हो जाता
है कि --(१)संसार में शरीर सहित कुछ भी मेरा नहीं है !(२)मुझे कुछ भी नहीं
चाहिए !(३)मुझे सिर्फ अपने ही शरीर के पोषण के लिए कुछ भी नहीं करना है
!मेरे प्रत्येक कर्म का अधिष्ठान संपूर्ण प्राणियों का हित और कल्याण है
!यज्ञ (कर्त्तव्य पालन )के लिए किये जाने वाले कर्मो से अन्यत्र (अपने
स्वार्थ के लिए किये जाने वाले )कर्मों में लगा हुआ मनुष्य समुदाय कर्मो से
आसक्ति मोह स्वार्थ आदि बंधनो से बंधकर अपनी आत्मशांति को नष्ट करता है !
लोकव्यबस्था को बिगाड़ता है !और समाज के लिया महान हानिकर सिद्ध होता है
!इसिलए कहा गया है कि मनुष्य समुदाय को आसक्ति रहित होका यज्ञ अर्थात
कर्तव्य पालन करना चाहिए !जिस से भोग और योग दोनों की प्राप्ति होतीहै
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