Thursday, 21 July 2016

जिस तरह से जल का प्रवाह नीचे की ओर बहने  का स्वाभाविक होता है !उसको ऊपर चढाने के लिए यंत्र का उपयोग करना पड़ता है!उसी प्रकार मानवीय स्वभाव में स्वार्थ निष्ठ जिजीविषा और स्पृहा जन्मजात होती है !उसको शुद्ध और समाज हित में शिक्छित और प्रसिक्छित करने का काम त्यागी महापुरुष करते हैं !  बे अपने तप और त्याग से  समाज में परमार्थ की पवित्र धारा बहाते हैं! राजनीति सभी प्रकार की त्याग और तपस्या की धाराओं का भक्छन् कर लेती है ! राजनीति बाह्य ,नियमों और कानूनों से संचालित होती  है, जिसको स्वार्थ निष्ठ लालची ,अंधे ,और भविष्य के भीसण परिणामों से बेखबर राजनेता अपने सत्ता प्राप्ति के स्वार्थ के लिए तोड़ मरोड़ कर अपने हित में उपयोग में लाते हैं ! ऐसे ही राजनेताओं ने अपनी छुद्र राजनीति के द्वारा
सत्ता प्राप्त करने  के लिए दलित शव्द को ईजाद कर लिया है !और शूद्र शव्द को ऐसा अर्थ गुलाम भारत में सृजित हो गया जिस से   से शुद्र समाज में अश्पृश्य ,हो गया !  जबकि वैदिक धर्म में अस्पृष्यता नाम की कोई बुराई कभी रही ही नहीं है ! भारत में वर्ण व्यबस्था गुण कर्माधरित  थी ! और यह सिर्फ हिन्दुओं में ही प्रचिलित थी !जब वर्ण धर्म दोषयुक्त हो गया तो उसका स्थान जाति व्यबस्था ने लेलिया !परन्तु आज ना तो वर्ण व्यबस्था गुण आधारित है !और ना जाति व्यबस्था कर्म आधारित है !प्राचीन भारत में शूद्रों की सामाजिक स्थिति क्या थी !इसका दिग्दर्शन महाभारत के कई आख्यानों में हुआ है !पाराशर गीता में महर्षि पाराशर ने कहा है ------- वेद शास्त्रों के ज्ञान से संपन्न  ब्राह्मण शूद्र को ब्रह्मा के तुल्य कहते हैं ! परन्तु में  तो उन्हें संपूर्ण संसार के प्रधान रकछक भगवान् विष्णु  के रूप में देखता हूँ ! राजा लोग जब मंत्री मंडल का गठन करते थे !उसमें वेद विद्या के विद्वान ,निर्भीक बाहर भीतर से शुद्ध और पवित्र ४ ब्राह्मण ,शस्त्र धारी ८ छत्री धन  धान्य से संपन्न २१ वैश्य तथा पवित्र आचार विचार वाले तीन विनयशील विद्वान शूद्र तथा पुराण विद्या में पारंगत एक सूत शामिल होता था !शूद्र धर्मात्मा और धनी होते थे !और उनको तत्कालीन भारतीय समाज में बहुत सम्मान प्राप्त था !युधिस्ठर ने जब राजसूय यज्ञ किया था तब उन्होंने राजकर्म चारियों को आदेशित कर कहा था ------तुम लोग सभी राज्यों में घूमकर वहां के राजाओं को ,ब्राह्मणो ,वैश्यों तथा माननीय शूद्रों को निमंत्रित करदो और उनको ले आओ !! महाभारत में इस तरह के अनगनित आख्यान है !गांधी जी कहते थे !कि अगर कोई शास्त्र प्रमाण से यह सिद्ध करदेगा कि हिन्दू धर्म में अस्पृष्यता है तो मैं हिन्दू धर्म को त्याग दूंगा !उन्होंने चेतावनी दी थी कीअगर हिन्दू धर्म में आयातित अस्पृश्यता की यह बुराई समाप्त नहीं होती है तो हिन्दू धर्म का नाश  हो जाएगा!

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