Friday, 8 July 2016

जन्म ,कर्म , च ,मे ,दिव्यम ! ४(९)गीता में भगवान श्री कृष्णा को ईश्वर के अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है !परमशक्ति के ईश्वर के रूप में अवतार का रहस्य जो धर्म को सिर्फ तर्क और अपनी सिमित बुद्धि से जानना समझना चाहते है ! उन पर प्रगट नहीं होता है !इस रहस्य को जान ने के लिए भक्ति की आवश्यकता होती है !क्योंकि अवतार के कर्म और जन्म दिव्या होते हैं !अर्थात परमशक्ति का अवतरण और कर्म मनुष्यों की तरह लोभ लालच मोह और सुख भोग आदि की प्राप्ति के लिए नहीं होते है ! !भगवान श्री कृष्णा ने युधिस्ठर के प्रश्न करने पर अवतार के रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया ! कि मेरे परम गोपनीय आत्म तत्त्व को सुनो और समझ कर धारण करो !में इस समय धर्म की स्थापना और दुष्टों का विनाश करने के लिए अपनी माया से मानव शरीर में अवतरित हुआ हूँ ! जो लोग मुझे केवल मनुष्य शरीर में ही समझ कर मेरी अवहेलना करते हैं बे मुर्ख हैं ! और संसार में ८४ लाख योनियों में भटकते रहते हैं ! लाखों योनियों में भटकने के बाद भी मनुष्य योनि मिलना कठिन होता है !जो ज्ञान दृष्टि से मुझे संपूर्ण प्राणियों में स्थित देखते हैं ! बे सदा मुझमे मन लगाए रहने वाले मेरे भक्त हैं ! ऐसे भक्तों को में परम धाम में अपने पास बुला लेता हूँ ! मेरे भक्तों का नाश नहीं होता है ! बे निष्पाप होते हैं ! मनुष्यों में उन्ही का जन्म सफल है ! जो मेरे भक्त हैं ! हजारों जन्मो तक तपस्या करने के बाद जब मनुष्यों का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है ! तब उसमे भक्ति का उदय होता है ! मेरा जो गोपनीय कूटस्थ, अचल ,अविनाशी ,पर स्वरुप है ,उसका मेरे भक्तों को जैसा अनुभव होता है ! वैसा तर्क करने वालों को नहीं होता है ! जो मेरा अपर स्वरुप है ! वह अवतार लेने पर दृष्टिगोचर होता है ! संसार के समस्त भक्त सब प्रकार के पदार्थों से उस स्वरुप की पूजा अर्चा करते हैं ! जो मनुष्य मुझे जगत की उत्पत्ति स्थिति ओरसंघार का कारण समझ कर मेरी शरण लेता है ! उसके ऊपर कृपा करके में उसे संसार बंधन से मुक्त कर अपने पास बुला लेता हूँ ! मैं अव्यक्त परमेश्वर ही ब्रह्मा से लेकर छोटे से कीड़े तक में विद्यमान हूँ !मेरे हजारों मस्तक हजारों मुख हजारों नेत्र हजारों भुजाएं हजारों पेट हजारों जांघे और हजारों पैर हैं ! में पृथ्वी को सब और से धारण करके नाभि से दस अंगुल ऊँचे सबके ह्रदय में बिराजमान हूँ ! सम्पूर्ण प्राणियों में आत्म रूप से स्थित हूँ ! इसीलिए सर्व व्यापी कहलाता हूँ ! में अचिन्त्य, अनंत, अजर, अमर, अजन्मा ,अनादि, अवध्य, निर्गुण, गुह्यस्वरूप, निर्द्वंद, निर्मम, निष्कल, निर्विकार, और मोक्ष का आदि कारण हूँ ! मेने ही अपने तेज से चार प्रकार के प्राणी समुदाय को स्नेह्पाश से बांधकर अपनी माया शक्ति से धारण कर रखा है ! भगवान ने कहा बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है ! में तुम्हे यह दिव्य ज्ञान दे रहा हूँ ! कि भूत और भविष्य जो कुछ है वह सब में ही हूँ !जैसे भौतिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को अपनी बुद्धि को तदनुसार शिक्छित प्रशिक्छित करना पड़ता हैं ! !चाहे जलेबी बनाने का काम हो ! या कमीज बनाने का काम हो ! या परमाणु बम बनाने का काम हो !ये सभी और इसी प्रकार के सभी अन्य भौतिक कर्म बे ही व्यक्ति संपन्न कर सकते है ! जिन्होंने उन कर्मो को करने की शिक्छा प्राप्त की है ! उसी प्रकार परमसत्ता का अवतरण होता है ! और परमात्मा श्रीकृष्ण मनुष्य शरीर में परमशक्ति के अवतार हैं ! इस ज्ञान को धारण करने के लिए अपने मन बुद्धि चित्त अहंकार को संसार के लोभ मोह छल कपट पाखण्ड आदि से मुक्त कर शुद्ध पवित्र करना पड़ता है !फिर भक्ति के संस्कार को स्थापित करने के लिए उस परमशक्ति की पूजा आराधना उपासना शास्त्र विधि से करनी पड़ती है ! तब ईश्वर के जन्म कर्म की दिव्यता का अनुभव होता है !और मनुष्य इसीजीवन में परमानंद की प्राप्ति कर अंत में परमात्मा की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर परम गति या परम धाम को प्राप्त कर लेता है

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