Sunday, 10 July 2016

कर्मयोगो विशिष्य्ते !५(२)---कर्मयोग और सन्यास दोनों ही आत्मशांति आत्मकल्याण और मोक्ष प्रदान कराने वाले हैं !परन्तु सन्यास की अपेक्छा कर्मयोग श्रेष्ठ माना गया है ! गृहस्थ आश्रम और सन्यास दोनों का विधान शाश्त्रों में है ! तथापि सन्यास आश्रम में प्राप्त होने वाली स्थिति तो गृहस्थ जीवन में भी हो सकती ! परन्तु गृहस्थ के श्रष्टि परम्परा के लिए आवश्यक संयम प्रधान काम भोग और नए नए भौतिक अविष्कारों आदि का अवसर सन्यास आश्रम में संभव नहीं है ! अतः संपूर्ण धर्मों की सिद्धि का स्थान गृहस्थ आश्रम ही है ! जैसे गृहत्यागी सन्यासी घर के प्रति अनासक्त होता है !उसी प्रकार यदि गृहस्थ भी गृहस्थ जीवन में ममता आसक्ति त्याग कर परिवार में रहता है !और सदाचार और संयम का पालन करता हुआ अपनी प्रिय पत्नी बच्चों और सम्बन्धियों के साथ निवास करता है ! तो उसे वही परमगति प्राप्त होती है ! जो सन्यासी को प्राप्त होती है ! लोक दृस्टि से कर्मयोग अधिक उपयोगी सिद्ध होता है !जो विद्याएँ कर्म का सम्पादन कराती हैं उन्ही का फल दृष्टिगोचर होता है !दूसरी विद्याओं का नहीं ! विद्या तथा कर्म में भी कर्म के परिणाम ही प्रत्यक्छ दिखाई देते हैं ! प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पी कर ही शांत होता है उसे जानकार नहीं ! अतः गृहस्थ आश्रम में रहकर सत्कर्म करना ही श्रेष्ठ है ! ज्ञान का विधान भी कर्म को साथ लेकर ही है ! अतः ज्ञान में भी कर्म विद्यमान है ! जो से भिन्न कर्मों के त्याग को श्रेष्ठ मानता है उसका कथन व्यर्थ ही है ! सन्यासी भी संसार में भक्छ्या भोक्छ्या पदार्थों का भोजन किये बिना तृप्त नहीं हो सकता है ! अतएव सन्यासी के लिए भी भूख की निबृत्ति के लिए भोजन का विधान है !पुण्यात्मा स्त्री पुरुष पुण्य कार्यों से स्वर्ग और पाप पूर्ण कार्यों से ही अधोगति और नरक आदि की प्राप्ति करते है ! देवता भी कर्म से ही स्वर्ग लोक में प्रकाशित होते हैं ! वायु कर्म को ही अपना कर संपूर्ण जगत में विचरण करता है ! सूर्य देव भी कर्म द्वारा ही दिन रात का विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित और अस्त होते हुए दिखाई देते हैं ! नदियां भी कर्म परायण हो सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त करती हुई प्रवाहित होती हैं ! कर्म योग के बिना संन्यास के लिए आवश्यक चित्त शुद्धि की प्राप्ति होना कठिन है ! किन्तु कर्म योगी आसक्ति का त्याग करके केवल ममता रहित इन्द्रियां शरीर मन और बुद्धि के द्वारा अन्तः करण की शुद्धि करके शीघ्र ही आत्मानंद और परमात्मा की प्राप्ति कर लेता है ! सांख्य योग में तो कर्मयोग की आवश्यकता है ! किन्तु कर्मयोग में सांख्य योग की आवश्यकता नहीं है ! प्राप्त परिस्थति का सदुपयोग कर अन्तः करण की समस्त वृत्तियों प्रवृत्तियों को आत्मनिष्ठ बनाना ही कर्मयोग है ! युद्ध जैसी घोर परिस्थिति में भी कर्मयोग का पालन किया जा सकता है ! तीव्र वैराग्य और तीक्छण बुद्धि के द्वारा सन्यासी अहंकार और ममता को नष्ट करता है ! तथा कर्मयोगी निश्वार्थ भाव से लोक मर्यादा की कर्म परम्परा को सुरक्छित रखने के लिए लोकहित के कर्म करता है ! जिस कर्म में व्यक्तिगत स्वार्थ और सुख प्राप्ति की इक्छा नहीं है ! वह क्रिया मात्र है कर्म नहीं है ! जैसे यंत्र में कर्तत्त्व नहीं होता है ! ऐसे ही कर्मयोगी में भी क्रिया मात्र रहती है कर्तात्त्व नहीं रहता ! संन्यास या ज्ञान योग में तो संसार के मिथ्यात्त्व का बोध होता है ! तथा सन्यासी आत्मनिष्ठ होकर कर्म से उदासीन हो जाता है !तथा कर्मों का त्याग कर देता है ! इसलिए सन्यासी आत्म लाभ प्राप्त कर अपने लिए उपयोगी होता है ! किन्तु कर्म योगी संसार मात्र के लिए उपयोगी होता है ! जो संसार के लिए उपयोगी होता है ! वह अपने लिए भी उपयोगी होता है ! इसलिए संन्यास और कर्मयोग दोनों साधन कल्याणकारक होने पर भी कर्म योग श्रेष्ठ है !

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