Friday, 1 July 2016

सॉउथ अफ्रीका में गांधी जी का जुलाई १९०५ से अक्टूबर १९०६ तक का जीवन बिरतांत    ---- यह समय गांधी जी के व्यक्तिगत जीवन और सॉउथ अफ्रीका के भारतीय समाज में महत्त्व पूर्ण परिवर्तन का था !गांधी जी अभी भी जोहानिस बर्ग में  वकालत कर रहे थे फिर भी उनके द्वारा स्थापित फिनिक्स आश्रम सहयोगियों के लिए घर बन गया था ! जोहानिस बर्ग में उनका पारिवारिक जीवन अब स्थिर हो गया था ! भोजन के बाद रात को बे तथा अन्य सदस्य धार्मिक अध्यन और दार्शनिक चर्चा करते थे ! उनकी वकालत सत्य निष्ठां पर आधारित थी और अच्छी चल रही थी ! जीवन में सादगी के साथ संयम और शारीरिक श्रम पर जोर बढ़ गया था ! घर से दफ्तर तक का ९ किलोमीटर का फासला बे आते जाते पैदल ही तय करते थे !उनके आहार सम्बन्धी प्रयोग भी चल रहे थे ! बड़े भाई लकछमी दास को उन्होंने २७ मई १९०६ को पत्र में लिखा था कि जो कुछ भी मेरा है वह अब मेरा नहीं है ! वह सब लोक सेवा में लगाया जा रहा है ! मुझे किसी भी प्रकार के दुनिया के सुख भोग की बिलकुल इक्छा नहीं है !सार्वजानिक कार्यकर्ता के जीवन में ब्रह्मचर्य की आवश्यकता पर उनका विश्वास अधिकाधिक बढ़ता जा रहा था !गांधी जी ने लिखा ---- मेरे मन में विचार उदित हुआ कि यदि में समाज सेवा में संलग्न होना चाहता हूँ तो मुझे धन और संतान की इक्छा छोड़ देनी चाहिए (आत्मकथा भाग ३ अध्याय ७) ! उन्होंने जीवन के ३७ बें वर्ष में आजन्म ब्रह्म चर्य का ब्रत ले लियाथा !अंततः उन्हें ११ सितम्बर १९०६ को सार्वजानिक सभा में ब्रह्मचर्य ब्रत की शक्ति का साकछात कार हुआ जब उन्होंने खूनी कानून के सामने ना झुकने के कारण मिलने वाले  दण्ड को अहिंसक ढंग से झेलने के लिए अपने आप को प्रस्तुत किया !उसी दिन उस सिद्धांत का जन्म हुआ जो बाद में सत्याग्रह कहलाया ! गांधी जी ने बार बार ब्रिटिश भारतीय संघ केमाध्यम से ट्रांसवाल के भारतीय समाज की समस्याओं को लेकर जोरदार ढंग से अपने पत्र इंडियन ओपीनियन के द्वारा प्रस्तुत की !साउथ अफ्रीका में जो भारतीयों को अपमानित करने वाले मसले थे उन को लगातार गांधी जी उठाते रहे !गांधी जी भारतीयों के साथ बरती जाने वाली रंग भेद की नीति  के विरुद्ध आंदोलन चलाने के अतिरिक्त उनका रचनात्मक मार्ग दर्शन भी करते थे ! भारत की घटनाओं से भी बे घनिष्ठ संपर्क बनाये रहे !उन्होंने बंग भंग आंदोलन के तीब्र होने पर संयुक्त विरोध और अंग्रेजी माल के बहिस्कार का आवाहन किया !स्वदेशी आंदोलन की प्रगति पर प्रसन्नता व्यक्त की और साम्प्रदायिक एकता पर जोर दिया !उन्होंने वन्दे मातरम् को भारत का राष्ट्र गीत और देश को एक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने के लिए हिन्दुस्तानी को राष्ट्र भाषा स्वीकार करने की सलाह दी !

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