स एवायं मया ते अद्द्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तोअसि में सखा चेति रहस्यम
हि एतत उत्तमम् !४(३) भगवान श्रीकृष्ण यहाँ कर्मयोग की अनादि परम्परा बता
रहे हैं ! जो विद्यायें कर्म का सम्पादन
करती हैं ! उन्ही के फल दिखाई देते हैं ! विद्या तथा कर्म में भी कर्म का
फल हीं प्रत्यक्छ देखने में आता है ! प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पीकर हीं
शांत होता है ! उसे जानकार नहीं ज्ञान का विधान भी कर्म को साथ लेकर ही है !
अतः ज्ञान में भी कर्म विद्यमान है ! जो कर्म से भिन्न कर्मों के त्याग को
श्रेष्ठ मानता है उसका कथन व्यर्थ ही है ! सूर्य देव आलस्य त्याग कर कर्म
द्वारा ही दिन रात का विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित होते हैं ! इसीलिए जीवन
के सभी छेत्रों में मनुष्यों के लिए कर्म करने की प्रधानता है ! यदि कोई
व्यक्ति सन्यासी हो गया है तो उसे भी अपने जीवन में भोग वासनाएं और कामनाओं
को नष्ट करने के लिए साधनाएं करनी पड़ती हैं ! और ये साधनाएं ही उसका जीवन
का प्रधान कर्म बन जाती हैं ! यदि सन्यासी वासनाओं और कामनाओं का नाश नहीं
करता है ! और सिर्फ सन्यासी का वेश धारण कर लेता है तो वह बस्तवीक सन्यासी
नहीं है ! उसी प्रकार कर्म की आवश्यकता आत्मज्ञानी को भी है ! कर्मके बिना
कोई भी व्यक्ति एक छन भी नहीं रह सकता है ! और ना हीं उस व्यक्ति का जीवन
चल सकता है ! इसीलिए किसी भी स्थिति में कर्मका त्याग संभव नहीं है !
हाँ कर्म को मोक्ष के लिए भी !और संसार में रहने के लिए भी ! और संसार को
व्यबस्थित रूप से चलाने के लिए भी कर्म को तदनुसार आचरणमे सतत उतारने की
आवश्यकता है ! और कर्म को सतत आचरण में उतारने की विधि गीता बताती है ! कि
सभी कर्म अनासक्त भाव से राग द्वेष से मुक्त होकर सुख दुःख से ऊपर उठकर
हानि लाभ की चिंता न कर सिर्फ कर्तव्य निर्वहन की दृष्टि से किये जाते हैं !
वही कर्म समाज को व्यबस्थित करते हैं ! और मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं !
और कर्म बंधन से मुक्त हो कर मोक्ष प्रद हो जाते हैं ! इसी अनादि कर्म
परंपरा का उपदेश गीता में दिया गया है
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