Saturday, 23 July 2016

अभी ध्येयम परम साम्यम -----भारत की धर्म संस्कृति में, आचरण में, हमेशा समता का निबास रहा है !इस समता का आधार आत्मा की समता रहा है !किन्तु समय के दुष्चक्र ने भारत को गुलाम बना दिया !और १०००साल से अधिक गुलामी भारत को भुगतना पड़ी !इस गुलामी के कारण भारत की संस्कृति की आचरण पद्धति विकृत हो गयी !और कर्म व्यबस्था जो आत्मा के एकता पर आधारित थी ! उसमे दोष आने के कारण बिषमता उत्पन्न हो गयी !और भारतीय समाज उंच नीच की आत्मविरोधी क्रिया कलापों में फंस गया !परिणाम स्वरुप वैदिक सनातन धर्म आचरण और गुण बिहीन जड़वय्बस्था में बदल गया !परिणाम स्वरुप हिन्दू धर्म को त्यागकर बहुत से हिन्दू नवोदित धर्मों ईसाई और इस्लाम धर्म में प्रवेश कर गए ! ओर अपने मूल सनातन धर्म के कट्टर विरोधी हो गए !जिस तरह से धर्म का छेत्र दूषित होने के कारण धर्म में बिघटन हुआ !उसी प्रकार से आर्थिक विषमता के कारण विदेशी भूमि में जन्मे सामाजिक समता लानेवाले साम्यवादी और समाजवादी अवैज्ञानिक मतों का प्रवेश भारत भूमि में हुआ !और इन मतों के मान ने वाले बहुत से लोग देश में पैदा हुए !यद्द्पि जिस भूमि में इन मतों का जन्म हुआ वहां तो ये समाप्त प्राय है !किन्तु भारत में अभी भी ये विद्यमान हैं !और इनका स्वरुप पूंजी वादी व्यबस्था से भी अधिक प्रिय इन तथाकथित साम्यवादियों और समाजवादियों में संपत्ति के प्रति समर्पण और आकर्षण के रूप में दिखाई देता हैं !ये दोनों विचार वाह्य विषमता मिटाने के नाम पर बाह्य विषमता बढाते हैं ! सनातन धर्म बाह्य विषमता को उँगलियों की विषमता के समान स्वीकार करता है !किन्तु आत्मिक समता को स्वीकार करता है !क्योँकि आत्मिक समता यथार्थ है !जो आत्मा मनुष्य में है ! वही आत्मा हाथी और चींटी में भी है !इसलिए आत्मिक दृष्टि से सभी प्राणियों के प्रति मैत्री और सद्भाव तथा संरक्छण का भाव जन्मता है !यह देहगत विषमता के रहते हुए भी आत्मगत एकता के कारण परम साम्य है !ओर यही अभिध्येय वैदिक संस्कृति का रहा है j परम साम्य की प्राप्ति के लिए लिए इन्द्रियों और मन तथा चित्त की समस्त क्रियायों को लक्छ्य प्राप्ति के लिए संयमित प्रशिक्छित और संस्कारित करना पड़ता है ! परम साम्य में परम शब्द महत्त्व का है ! जहाँ परम साम्य का रूप क्रियायों को दिया जाता है! वहां आर्थिक और सामाजिक, मन का संतुलन या मानसिक साम्य है! उसकी भी प्राप्ति स्वतः होती है! आर्थिक साम्य हरेक कार्य में मदद गार होता है ! सामाजिक साम्य के आधार पर समाज में व्यबस्था रहती है ! मानशिक साम्य से मनुष्य के मन का नियंत्रण होता है ! जो कि बहुत आवश्यक है ! नहीं तो भूला भटका मनुष्य सुख की चाह में इधर उधर भटकता रहता है ! और बहुत से अवांछनीय कार्य सुख प्राप्ति के लिए करता है ! इसिलए मनोयोग की बहुत आवश्यकता है ! आर्थिक सामाजिक और मानसिक साम्य से भी श्रेष्ठ परम साम्य है ! यह वह बस्तु है जो वैज्ञानिक और नैतिक छेत्र से भी ऊँची जाती है ! यानी परम साम्य आध्यात्मिक अवस्था को प्राप्त कराता है !यही वैदिक धर्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है !जिसका बिस्मरण भारतीय समाज ने कर दिया है !जिसके कारण प्रकार प्रकार के दुष्चक्र में फंस कर हर नए दिन सुधार के नाम पर बिगाड़ को जन्म दे रहा है !

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