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यत्र
योगेश्वरः कृष्णः यत्र पार्थो धनुर्धरः !तत्र श्री विजयो भूतिः नीतिः मतिः
मम !१८(७८) अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान प्रत्येक युग
में अवतार लेते हैं !महाभारत में उत्तंक ऋषि को अपने अवतरण का रहस्य और
उद्देश्य बताते हुए श्री कृष्णा कहते हैं! कि मै धर्म की रक्षा और स्थापना
के लिए तीनो लोकों में बहुत सी योनियों में अवतार धारण करके उन उन रूपों और
वेशों द्वारा तदनरूप वर्ताव करता हूँ ! अधर्म में लगे हुए सभी मनुष्यों को
दंड देने वाला और अपनी मर्यादा से कभी च्युत ना होने वाला ईश्वर में ही
हूँ !जब जब युग का परिवर्तन होता है ! तब तब में लोगों की भलाई के लिए
भिन्न भिन्न योनियों में प्रविष्ट हो कर धर्म मर्यादा की स्थापना करता हूँ
!जब में देवयोनि में अवतार लेता हूँ ! तब देवताओं की ही भांति सारे आचार
विचार का पालन करता हूँ !जब में गन्धर्व योनि में प्रगट होता हूँ तब मेरे
सारे आचार विचार गन्धर्वों के ही समान होते हैं !जिस योनि में मेरा अवतार
होता है !उसी योनि के अनुसार मेरा आचार विचार और व्योहार होता है ! इस
समय में मनुष्य योनि में अवतीर्ण हुआ हूँ! इसलिए दुर्योधन आदि कौरवों पर
अपनी ईश्वरीय शक्ति का प्रयोग ना करके मेने दीनता पूर्वक ही धर्म मार्ग पर
चलने वाले पांडवों और अधर्मी कौरवों में संधि स्थापना के लिए प्रार्थना की
थी ! परन्तु कौरवों ने मोह और लोभ ग्रस्त होने के कारण मेरी हितकर बात
नहीं मानी ! इसके बाद मेने कौरवों को बड़े बड़े भय दिखाए और उन्हें डराया
धमकाया भी ! तथा यथार्थ रूप से युद्ध का भयानक परिणाम भी उन्हें बताया !
परन्तु बे अधर्म और काल से ग्रस्त थे ! अतः मेरी बात मानने को राजी नहीं
हुए ! इसिलए छत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए !जब
अधर्म और अधर्मी ,लोभी ,दुराचारी ,पापियों का विनाश हो जाता है ! और धर्म
की स्थापना हो जाती है ! और लोक व्यबस्था सदाचार परायण न्याय प्रिय
आत्मनिष्ठ शाशन प्रसाशन में प्रजा के साथ भेद भाव ना कर प्रजा की भलाई करने
वाले लोगों के हाथो में आजाती है ! तभी समाज में श्री अर्थात लक्ष्मी शोभा
संपत्ति आदि के दर्शन होते हैं !रुपया पैसा लक्ष्मी नहीं है !रुपया तो
नासिक के रुपया छापने के कारखाने में छपता है !किन्तु लक्ष्मी तो कृषि, गाय
की रक्षा और वाणिज्य से उत्पन्न होती है !आज समाज के सभी बर्ग नेता
अभिनेता कर्मचारी व्योपारी ,तथाकथित साधु सन्यासी आदि सभी रुपया कमाने में
लगे हुए हैं !और रुपयों के संग्रह के लिए घोर अनैतिक, धोखा धडी, बेईमानी,
गोवध, पाखंड, छल कपट, आदि अधार्मिक कार्य करने में संलग्न है !परिणाम
स्वरुप समाज में कही प्रचुर मात्रा में धन संपत्ति दिखाई देती है !और कही
भयानक गरीबी के दर्शन होते हैं! !संपूर्ण देश में गो पालन के अभाव के कारण
पशुओं की चर्वी से बना घी और केमिकल से निर्मित दूध और सभी खाद्य पदार्थ
मिलाबटी प्राप्त हो रहे हैं !देश में पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दुर्लभ
हो गए हैं ! जहाँ अधर्म का विनाश और धर्म की विजय होगी !वही वास्तविक विजय
कही जायेगी !आज जिस विजय का दर्शन होता है !उस विजय की प्राप्ति में लगे
हुए सभी पक्ष लोभ मोह पद प्रतिष्ठा प्राप्ति की होड़ में सभी प्रकार के
अनैतिक छलकपट युक्त अधार्मिक साधनो का प्रयोग करते हैं !इसीलिए व्यक्ति
जीतते ,और हारते रहते हैं ! किन्तु समाज को कष्ट देने वाली व्यबस्था नष्ट
नहीं होती है !जैसे नाग नाथ वैसे सांपनाथ वाली युक्ति चरितार्थ होती है
!ऐश्वर्य महत्ता, प्रभाव सामर्थ्य आदि सभी स्वार्थनिष्ठ अनैतिक अधार्मिक
व्यक्तियों के हाथ में चलीगयी है ! और उनके हाथ की काठ पुतली बन गयी है
!अटल न्याय, धर्म नीति के दर्शन देश और समाज के संचालन करने वालों में
दिखाई नहीं देते हैं !स्वार्थों का पोषण करना ही सभी छेत्रों में काम करने
वाले जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की अटल ना बदलने वाली नीति होगयी है
!देश में वास्तविक श्री, विजय, विभूति, और अचल नीति का दर्शन जभी होगा जब
श्री कृष्ण ऐसे नीति निर्माता और अर्जुन जैसे न्याय, नीति , सदाचार
,आत्मनिष्ठ, स्वार्थ रहित ,धर्मपरायण लोग सत्ता व्यबस्था संभाल कर तदनुसार
सदाचरण करेंगे !
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