Tuesday, 5 July 2016

सत्या ग्रह का जन्म ------11सितम्बर १९०६ में एशियाटिक बिल (खूनी कानून )के विरोध में ट्रांसवाल में यहूदियों की नाटकशाला में सभा हुई ! उसमें गांधीजी ने प्रस्ताव पेश किया -----इस बिल के विरोध में सारे उपाय किये जाने के बाद भी यदि यह धारासभा में पास ही हो जाय तो हिन्दुस्तानी उसमें हार ना माने !हार ना मानने के फलस्वरूप जो दुःख भोगने पड़ें उन सबको बहादुरी से सहन करें !इस प्रस्ताव के समर्थन में सभी ने तीखे और जोशीले भाषण दिए !गांधी जी ने कहा कि आज तक हम लोगों ने जो प्रस्ताव जिस रीति से पास किये हैं !उन प्रस्तावों में और इस प्रस्ताव में बहुत बड़ा भेद है! क्योंकि इसके संपूर्ण अमल पर साउथ अफ्रीका में हमारी हस्ती का आधार है !हम सब एक ही ईश्वर में विश्वाश करते हैं !भले ही उसके नाम अनेक हों किन्तु उसका स्वरुप एक ही है !उस ईश्वर को साकछी रख कर हम प्रतिज्ञा करें या कसम खायें तो यह मामूली बात नहीं है !ऐसी कसम खाकर यदि हम अपनी प्रतिज्ञा पर डटे ना रहें तो हम कौम के और संसार तथा ईश्वर के अपराधी बनेंगे !इस बिल का विरोध करने में हमें बहुत कष्ट भी उठाने पड़ सकते हैं ! संभव है कि हमें जेल जाना पड़े और अपमान सहने पड़ें! जेल में हमें भूख ठण्ड और धुप का कष्ट भी झेलना पड़ सकता है !कड़ी मेहनत भी करने पड़ सकती हैं !जेल में हमें जेलर की मार भी खानी पड़ सकती हैं !हम पर जुर्माना भी हो सकता है और हमारी संपत्ति भी जब्त हो सकती है !भूखों मरते और जेल के कष्ट भोगते हुए कुछ लोग बीमार भी पड़ सकते हैं और मर भी सकते हैं !इसीलिए ऐसा मानकर ही हम कसम खायें !गांधी जी ने कहा अगर मुझ से कोई पूंछे की इस लड़ाई का अंत क्या होगा ?और कब होगा ?तो में कह सकता हूँ ,की यदि सारी कॉम प्रतिज्ञा का पालन करे तो लड़ाई का फैसला तुरत हो जायेगा !यदि हम में से बहुत लोग कष्टों से डरकर फिसल जायें  और प्रतिज्ञा भंग कर दें तो यह लड़ाई लम्बी चलेगी !फिर भी में निश्चय के साथ कह सकता हूँ कि जबतक मुट्ठी  भर लोग भी अपनी प्रतिज्ञा पर कायम रहेंगे तब तक हमारी इस लड़ाई का एक ही अंत आएगा कि हम इस लड़ाई में निश्चित विजय प्राप्त करेंगे !अब मै अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बता देना चाहता हूँ !मान लीजिये ऐसी स्थिति आजायेकि  सारे लोग अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दें और मै अकेला ही रह जाऊँ तब भी मेरा विश्वास है कि में अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं करूँगा !हम मेसे कोई यह नहीं जानता था  कि इस निश्चय को या आंदोलन को क्या नाम दिया जाय  ?!उस समय मेने इस आंदोलन को पेसिव रेसिस्टेंस नाम दिया था !इसिलए जो कोई इस संग्राम के लिए उत्तम शव्द खोज निकाले इसके लिए मेने इंडियन ओपिनियन में एक छोटे से इनाम की घोषणा की थी !श्री मगन लाल गांधी ने सदाग्रह नाम भेजा!यह नाम मुझे पसंद आया परन्तु जिस तत्त्व का समावेश में इस सुझाएँ हुए नाम में समावेश करना चाहता था वह इसमें नहीं आया था !इसलिए मेने इसमें द के स्थान पर त और या जोड़ दिया और इसका नाम सत्याग्रह बना दिया  !सत्य के भीतर शांति का समावेश मानकर और किसी भी वस्तु का आग्रह करने से उसमें बल उत्पन्न होता है ! इसीलिए आग्रह में  बल का समावेश करके मेने भारतीयों के इस आंदोलन को सत्याग्रह ------ अर्थात सत्य और शांति से उत्पन्न होने वाला बल ---- का नाम दिया !इस प्रकार जो तत्त्व सत्याग्रह के नाम से पहचाने जाने लगा उसका जन्म हुआ !

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