जन्म , कर्म , च मे ,दिव्यम ,एवं यः बेत्ति तत्त्वतः ! त्यक्त्वा देहम
पुनर्जन्म नेति मामेति सो अर्जुन !४(९) भगवान का जन्म इसीलिए दिव्या होता
है क्योंकि उनका जन्म साधारण मनुष्यों की तरह नहीं होता है !सामान्य मनुष्य
भगवान को भी साधारण मनुष्य की तरह जन्म लेने वाला मानते हैं ! और बो उनको
ईश्वर के अवतार के रूप में ना मानकर महान योगी या महान पुरुष के रूप में
मानते हैं !उनका कहना है कि ईश्वर का न जन्म होता है और न मृत्यु होती है
!ईश्वर अजन्मा और अविनाशी है !किन्तु यहाँ भगवान स्वयं बता
रहे हैं की अविविवेकी मूढ़ मनुष्य परमात्मा के संपूर्ण ब्रह्माण्ड के महान
ईश्वर रूप परम भाव को ना जान ने के कारण मनुष्य देह धरी परमात्मा को मनुष्य
केरूप में ही मानते हैं तथा मनुष्य रूप में प्रगट परमात्मा का अनदर करते
हैं यद्द्पि परमात्मा अजन्मा है अविनाशी है और संपूर्ण ब्रह्माण्ड का महान
ईश्वर है फिर भी वह संसार में दुष्ट मोहग्रस्त भोग और अनैतिक साधनो से
संग्रह में लिप्त मनुष्यों को जो अपनी भोग लिप्सा और अवांछनीय कामनाओं की
तृप्ति के लिए प्राणिमात्र को कष्ट देते हैं साधु सज्जन पुरुषों का जीवन
दूभर कर देते हैं और बो किसी भी प्रकार से अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों को
छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते है और प्राणिमात्र का जीवन नारकीय बना देते
हैं तब ऐसे दुष्ट पापाचारी शक्ति संपन्न निशाचरों से जिनका नाश करना मानवीय
शक्ति से संभव नहीं हो पाटा है तब समाज को मुक्त को मुक्त कराने के लिए
और समाज को सुव्यबस्थित बनाने के लिए और प्राणियों को सह असितात्त्व अहिंसक
सदाचार युक्त करुणा प्रधान जीवन जीने की कला का विकास करने के लिए भगवान
अपनी प्रकृति को बस में करके प्रगट होते हैं !
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