महाभारत वैदिक धर्म का ग्रन्थ रत्न है !इसमें मोक्ष शाश्त्र ,राजनीति ,अर्थ
और काम तथा धर्म के सभी सामान्य और गूढ़ प्रकरण भरे हुए हैं !वेद व्यास ने
कहा है किजो ई ग्रन्थ में है वही अन्यत्र भी है ! और जो इसमें नहीं है वह
अन्यत्र भी नहीं है !कर्ण की मृत्यु के अनेक कारण थे !कर्ण से इन्द्र ने
उसके कवच कुण्डल ब्राह्मण का वेश धारण कर दान में ले लिए थे !भगवान सूर्य
ने उसको स्वप्न में इन्द्र को कवच कुण्डल न देने के लिए कहा था !क्योँकि
उनके रहते उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी !किन्तु कर्ण ने सूर्य
की सलाह न मानते हुए इन्द्र को अपने कवच कुण्डल दे दिए थे !इन्द्र से उसने
कवच कुण्डल के बदले वैजन्ती शक्ति प्राप्त की थी ! जिसको वह अपने प्रमुख
प्रतिद्वन्दी अर्जुन को मारने के लिए सुरक्छित रखे था !किन्तु उस शक्ति का
प्रयोग भी उसे अपनी प्राणरक्षा के लिए घटोत्कच को मारने के लिए करना पड़ा था
! भगवान परशुराम ने भी उसे शाप दिया था कि जीवन संकट के समय वह परशराम जी
द्वारा दिए गए अश्त्र सश्त्र संचालन के ज्ञान को भूल जाएगा !ब्राह्मण की भी
श्राप थी कि युद्ध भूमि में उसका पहिया पृथ्वी निगल लेगी !और तभी असहाय
दसा में उसकी मृत्यु हो जायेगी !किन्तु इन सब कारणों से बड़ा कारण यह था कि
वह दुराचारी अन्यायी दुर्योधन का साथ दे रहा था ! और अधर्म का समर्थन और
क्रियात्मक शक्ति से सहयोग कर रहा था !उसको पांडवों के पक्छ में जिनका वह
बड़ा भाई था करने का प्रयत्न कुंती ने भी किया ! श्री कृष्ण ने भी किया !और
सर सैया पर पढ़े हुए भीष्म ने भी किया !किन्तु उसने किसी की भी बात नहीं
मानी !अगर कर्ण दुर्योधन के अन्याय अत्याचार में शामिल होकर दुर्योधन का
साथ नहीं देता तो !महाभारत का यदुध नहीं होता और १८ अक्छोहनि सेना महाविनाश
से बच जाती !क्योँकि दुर्योधन को कर्ण के बल और शक्ति से युद्ध जीतने का
पूरा भरोसा था !अन्याय अत्याचार कभी भी अधिक समय तक कायम नहीं रहता !और
अन्याय अत्याचार का साथ और सहयोग देने वाले कितने भी शक्तिशाली हों बे एक
दिन काल के कराल गाल में समा ही जाते हैं !कर्ण की मृत्यु का एक यह भी कारण
था
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