Wednesday, 6 July 2016

महाभारत का युद्ध द्वापर के संध्याकाळ में हुआ था ! अर्थात द्वापर का अंत होने वाला था और कलियुग का प्रारम्भ होने वाला था !भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के साथ ही कलियुग आगया था ! महाभारत काल आज जे युग से अधिक शक्ति संपन्न था !किन्तु वह शक्ति भौतिक पदार्थों के उपयोग और प्रयोग से निर्मित नहीं थी !वह शक्ति आत्मसाधना की शक्ति से प्राप्त थी !युधिस्ठर जब अपने भाईओं के साथ बनवास में थे तो उनके गुरु धौम्य ने सूर्य उपासना से उन्हें ताम्बे की बटलोई प्रदान करायी थी !जिसका पका हुआ भोजन तब तक ख़त्म नहीं होता था ! जब तक अंतिम भोजन करने वाले के रूप में द्रौपदी भोजन नहीं कर लेती थी !इसी प्रकार जब युधिस्ठर काम्यक बन में निवास कर रहे थे !तब उनको लोमश ऋषि का दर्शन हुआ था !और लोमश ऋषि ने उनको अनुस्मृति विद्या प्रदान की थी उस अनुस्मृति विद्या के प्रभाव से बे भूत भविष्य की सभी घटनाओं को प्रत्यक्छ देख लेते थे ! जब धृत राष्ट्र ने युधिस्ठर से युद्ध में मारे गए सैनिकों की संख्या पुंछी तो युधिस्ठर ने धृतराष्ट्र को संपूर्ण मृत सैनिको की संख्या और गायब हुए सैनिकों की संख्या भी बता दी थी ! धृतराष्ट्र के प्रश्न के उत्तत में उन्होंने यह भी बता दिया था ! कि मृत्यु के बाद किस सैनिक को कौन सी गति प्राप्त हुई थी !यह आत्मशक्ति से प्राप्त अनुस्मृति विद्या का प्रताप था !महाभारत ग्रन्थ इस तरह की आत्मसाधना से प्राप्त शक्तियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है !यह सिर्फ महाभारत युद्ध का वर्णन करने वाला मात्र कथानक ही नहीं है !इसमें अत्यंत गूढ आध्यात्मिक रहस्यों का भी वर्णन हुआ है !और इस ग्रन्थ में ८८०० ऐसे गूढ श्लोक हैं जिनका अर्थ सिर्फ व्यासदेव या सुखदेव ही जानते है !आत्मशक्ति के लिए जिस सत्त्व संशुद्धि की आवश्यकता है उसका ज्ञान कराने वाला गीता शाश्त्र भी महाभारत में ही है !

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