गीता ५(१९) जीवन मन्त्र -जिनका मन मष्तिष्क ह्रदय समता में स्थित हो गया है
उन्होंने जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है अर्थात बे
मनुष्य को प्राप्त होने वाली दुर्लभ जीवन मुक्ति अवस्था को प्राप्त हो जाते
हैं ब्रह्म सम और निर्दोष है इसलिए जीवन मुक्त जीवित अवस्था में ही ब्रह्म
में स्थित हो जाते हैं सभी मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति कर सकते हैं और
सम्पूर्ण संसार पर विजय प्राप्त कर सकते हैं अर्थात जीवन मुक्त हो सकते हैं
मनुष्य अपने जीवन काल में ही संसार से मुक्त हो सकता है
संसार को जीतने का मतलब है संसार के बंधन में डालने वाले माया मोह राग
द्वेष से मुक्त होना जिसने राग द्वेष को जीत लिया है ऐसे समदर्शी महापुरुष
को संसार का बड़े से बड़ा प्रलोभन भी आकर्षित नहीं कर सकता और बड़े से बड़ा
दुःख भी विचलित नहीं कर सकता जिसने संसार से मुक्त होने की कला अपने में
विकसित करली है समता की प्राप्ति होने पर उस से अधिक कोई दूसरा लाभ उसके
ह्रदय मन मस्तिष्क में नहीं आता है सभी मनुष्यों को एक ही ब्रह्म की समता
की प्राप्ति होती है क्योँकि ब्रह्म अनेक नहीं एक है और धर्म तथा साधक और
ईश्वर प्राप्ति की साधनाएं अनेक हैं जिस ईश्वर की प्राप्ति शंकराचार्य
रामनुजा चार्य अरविंदो आदि महापुरुषों को हुई उसी परमात्म तत्त्व की
प्राप्ति सभी साधकों को होती है समत्त्व का आदर्श सामने रखकर व्योहार करने
पर समता का छेत्र धीरे धीरे गहरा और व्यापक होता जाता है और अन्ततः इसी
जीवन में ब्रह्म साम्य का अनुभव प्राप्त हो जाता है मुक्ति का अनुभव लेने
के लिए मरने की जरुरत नहीं है जिन्होंने समता आधारित अपना जीवन निर्माण
किया है बे ब्रह्म में ही स्थित हो गए हैं क्योँकि समता की परिपूर्णता ही
ब्रह्म है पाप और पुण्य ब्रह्म की समता प्राप्त व्यक्ति से नहीं होते हैं
क्योँकि समता प्राप्त व्यक्ति संसार के राग द्वेष मोह माया से मुक्त होकर
सम दृष्टि से न्याय युक्त व्योहार करता है ब्रह्म सम और निर्दोष है शुभ
अशुभ से अतीत है और समता प्राप्त व्यक्ति भी शुभ अशुभ से अतीत होता है
इसलिए वह ब्रह्म में ही स्थापित रहता है
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