Friday, 12 February 2016

गीता ५(२) जीवन मन्त्र -वर्तमान समय में शरीरों को सजाने धन पद आदि से विभूषित करने के प्रयत्न सर्वत्र दृष्टिगत होते है राजनैतिक सामाजिक जीवन में तो यह विपुलता से दिखाई देता ही है किन्तु इसका प्रवेश धर्म में भी व्यापक और विस्तृत रूप में दिखाई देता है इसलिए धार्मिक क्रियाओं कथा वार्ता प्रवचनों की तो बृद्धि हो रही है किन्तु धर्म का लोप हो रहा है धार्मिक संगठन व्यापारिक संगठनो की तरह काम कर रहे हैं किन्तु इस सबके बाद भी मोक्ष के अभिलाषी भी विद्यमान है जो संसार शरीर और आत्मा के स्वरुप को समझ कर परमात्मा की प्राप्ति ही अपने जीवन का परम लक्ष्य मान कर जीवन जीते हैं ऐसे मोक्ष कामी साधकों के लिए निष्काम कर्म योग और कर्मसन्यास दो प्रकार की जीवन पद्धतियाँ गीता में बताई गयी है ये दोनों ही समान रूप से मोक्ष प्रदान करने वाली हैं ज्ञान योग और कर्म योग दोनों ही एक दूसरे की अपेक्छा न रखते हुए मनुष्य का कल्याण करने वाले हैं तथापि कर्म सन्यास की अपेक्छा कर्म योग श्रेष्ठ है इन दोनों मार्गों में कर्म छोड़ देने की अपेक्छा कर्म करने का पक्छ ही अधिक प्रशस्त है जो मन से इन्द्रियोँ का संयम करके केवल कर्मेन्द्रियों द्वारा अनासक्त बुद्धि से कर्म करता है उसकी योग्यता श्रेष्ठ है प्रत्येक मनुष्य को अपना कर्तव्य कर्म अवश्य करना चाहिए कर्म न करने से तो शरीर का भी पालन नहीं हो सकता है कर्म तो सन्यासी भी करता है किन्तु उसके कर्म सुक्छम और आंतरिक होते है जो दिखाई नहीं देते हैं कर्मो का सूत्रपात अंतःकरण में अर्थात मन बुद्धि चित्त और अहंकार में ही प्रथम होता है और अंतःकरण की बृत्ति का ही प्रकाशन स्थूल कर्मों में होता है अगर अन्तः करण शुद्ध है तो कर्म शुद्ध होंगे और अगर अन्तः करण काम क्रोध राग द्वेष आदि से युक्त है तो कर्म भी इन दोषों से युक्त होंगे इसीलिए कर्मसन्यासी अपने अन्तः करण की शुद्धि पहले करता है और उस शुद्धि से जो आत्मसुख उसे प्राप्त होता है वह समस्त भौतिक सुखों से श्रेष्ठ होने के कारण वह स्थूल कर्मों से उपराम हो जाता है जबकि कर्मयोगी अपनी कर्म सामग्री और प्रतिभा बुद्धि सामर्थ्य का उपयोग लोकहित के लिए अनासक्ति और राग द्वेष फलाकांछा रहित बुद्धि से युक्त हो कर समाज के कल्याण के लिए जीवन पर्यन्त्र करता है वह अन्तः करण की शुद्धि होने पर भी आत्मसुख से युक्त होकर कर्म करता रहता है कर्मयोगी यदि भक्ति मार्गी होता है तो वह सभी कर्मों को परमात्मा की सेवा पूजा समझ कर परमात्मा को समर्पण करता है इस प्रकार कर्म योगी के कर्म कर्मयोगी के लिए तो मोक्ष दायकहोते ही हैं बे समाज के लिए भीउपयोगीहो जाते हैं इसीलिए कर्मसन्यास और कर्मयोग दोनों ही मोक्ष प्रद होने के बाद भी कर्मयोग श्रेष्ठ है
Unfortunately tenets of Islam are not practiced by fundamentalists intolerant muslims through out the world .Most of the persons have not read Ouaran they do not know that ItIslam is the religion of brotherhood compassion peace etc but they see with naked eyes and mind the most brutal acts of Is and the treatment of muslims with religious minorities in muslim dominated areas and muslim countries wich is awesome cruel and most intolerant and frequent terrorist attacks and ki...
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The anti-Muslim sentiment in the United States isn't just rising, it's really high. An unwillingness and indifference on the part of individuals and institutions to put it in check is a large part of the problem.
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आज के लिए बस इतना ही.

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