Tuesday, 2 February 2016

अर्जुन विषाद योग -------------श्री मदभगवद्  गीता का प्रथम  अध्याय अर्जुन विषाद योग कहलाता है !विषाद से चित्त में अशांति और हलचल उत्पन्न हो जाती है !और चित्त सभी प्रयत्नो के बाद शांत नहीं होता है !जबकि योग में एकाग्रता और चंचलता रहित चित्त की आवश्यकता होती है !जैसे दिन और रात कभी एक नहीं हो सकते हैं ! ऐसे ही विषाद युक्त चित्त और योग भी कभी एक साथ नहीं हो सकते हैं !फिर भी अर्जुन का विषाद युक्त चित्त योग युक्त  कैसे हो गया ? योग का अर्थ है जोड़ना !अर्जुन यद्द्पि विषाद युक्त हो गया है !किन्तु वह परमात्मा श्री कृष्ण से जुड़ा हुआ है !उसका विषाद भी उसको परमात्मा से बिलग नहीं करता है ! वह विषाद का समाधान परमात्मा श्री कृष्ण से ही चाहता है !महाभारत में सभी पात्रों को अनेक अवसरों पर विषाद होता है !किन्तु उनका विषाद योग नही बनता है !किन्तु जब युधिस्ठर को विषाद होता है ! तो उसका समाधान भी अर्जुन परमात्मा श्रीकृष्ण के योग से ही करता है ! युधिस्ठर ने जब यह जान लिया कि युद्ध अब किसी भी स्थिति में रोका नहीं जा सकता है ! तब वह विषाद युक्त होकर कहने लगे कि युद्ध छिड़ने पर अवध्य पुरुषों का भी वध करना पड़ेगा ! तब उन्होंने लम्बी स्वांशे खींचते हुए भीमसेन और अर्जुन से कहा कि जिस युद्ध से बचने के लिए हमने बनवास का कष्ट स्वीकार किया और अनेक प्रकार के भीषण कष्ट सहन किये वही अनर्थ कारी महान युद्ध हमारे प्रयत्न से टल नहीं सका ! यद्द्पि उसे टालने का हमारी और से पूरा प्रयत्न किया गया  किन्तु हमारे प्रयास से उसका निवारण नहीं हो सका  ! और जिस युद्ध के लिए हमने कोई प्रयास नहीं किया था वह महान युद्ध अपने आप हम लोगों के सर पर आगया ! जो लोग मारने योग्य नहीं हैं उनके साथ युद्ध करना कैसे उचित होगा ? युधिस्ठर की यह बात सुनकर शत्रुओं को संताप देने वाले अर्जुन ने कहा कि भगवान श्री कृष्णा और माता कुंती ने भी तथा ज्ञानी विदुर ने भी जो कुछ कहा है वह सब आपको ज्ञात है ! ये सभी लोग कोई भीे अधर्म की बात नहीं कहेंगे ! इसीलिए हम लोगों को युद्ध से निब्रत्त हो जाना उचित नहीं है ! कौरवों की युद्ध भूमि में विशाल सेना देख कर युधित्ठार  को फिर संताप होता है ! और बे विषाद युक्त बचन बोलते हुए कहते हैं -----अर्जुन जिनके प्रधान योद्धा भीष्म हैं उन कौरवों के साथ हम युद्ध भूमि में कैसे युद्ध कर सकते हैं ? हमलोग अपनी सेना के साथ प्राणसंकट की स्थित में पुहंच गए हैं  !तब शत्रुओं का नाश करने वाले अर्जुन ने कहा विजय की इक्छा रखने वाले शूरवीर अपने बल और पराक्रम से वैसी विजय नहीं पाते हैं  जैसी की सत्य ,सज्जनता , धर्म तथा उत्साह से प्राप्त कर लेते हैं ! अधर्म, लोभ और मोह त्यागकर उद्द्यम का सहारा ले कर अहंकार शून्य होकर युद्ध करने वाला कभी पराजित नहीं होता है !

1 जहाँ धर्म है उसी पक्छ की विजय होती है ! हमारी विजय निश्चितहोगी क्योँकि जहाँ श्री कृष्णा है वहीं विजय है ! विजय तो श्री कृष्ण का एक गुण है ! अतः वह उनके पीछे पीछे चलता है ! जैसे विजय गुण है उसी प्रकार विनयभी उनके द्वितीय गुण है !अर्जुन सभी प्रकार के सभी विषादों का समाधान परमात्मा श्री कृष्णा के आश्रय में ही खोजता है !इसीलिए उसका विषाद भी परमात्मा से जुड़ कर योग हो गया है !और इस विषाद का भी समाधान परमात्मा श्री कृष्णा ने गीता के अविनाशी उपदेश से किया है !इस गीतोक्त उपदेश को समझकर  और ग्रहण कर कोई भी व्यक्ति  विषाद मुक्त हो सकता है !

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