गीता
२(२४)जीवनमंत्र- आत्मा काटा नहीं जा सकता जलाया नहीं जा सकता गीला नहीं
किया जा सकता और सुखाया भी नहीं जा सकता यह हमेशा रहने वाला सब में
परिपूर्ण स्थिर स्वाभाव बाला और अनादि अजर अविनाशी है सभी प्राणिओं में
आत्मा का निवास है किन्तु शरीरों और आत्मा के धर्म एक दूसरे से भिन्न और
विरुद्ध है आत्मा अमर है और शरीरों की मृत्यु होती है भौतिकबादी शरीर को
ही आत्मा मानते हैं बे तर्क प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि शरीर रूपी आत्मा
का विनाश प्रत्यक्छ देखने में आता है सम्पूर्ण संसार इसका साक्षी
है फिर भी यदि कोई शाश्त्र प्रमाण की ओट लेकर शरीर से अलग आत्मा की सत्ता
का प्रतिपादन करता है तो वह प्रत्यक्ष प्रमाण के विरुद्ध है शरीर की मृत्यु
के साथ ही आत्मा की भी मृत्यु हो जाती है किन्तु आत्मा को अविनाशी मानने
वाले इस मत को सही नहीं मानते हैं उनका कथन है की मृत्यु होने के बाद भी
शरीर जैसा का तैसा पड़ा रहता है किंतु उसमे से चेतना या आत्मा निकल जाती है
यदि आत्मा ही शरीर होती तो मृत्यु के साथ आत्मा की तरह शरीर को भी लुप्त हो
जाना चाहिए था किन्तु ऐसा नहीं होता है इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने सनातन
सत्य का उद्घाटन करते हुए कहा है कि आत्मा परिपूर्ण स्थिर स्वाभाव बाला
अनादि और अविनाशी है जबकि सभी शरीर परिवर्तन शील जन्म मरण से युक्त हैं
शरीरों और आत्मा की पृथकता और भिन्न स्वाभाओं का ज्ञान होने से कठोर से
कठोर कर्तव्य पालन में भी कठिनाई नहीं होती है अर्जुन मोहग्रस्त होकर
कर्तव्य पालन से विमुख हो रहा था वह शरीरों में उलझ कर अपने युद्ध रूप
कर्तव्य से विरत हो गया था उसको शरीर और आत्मा का भेद बता कर कर्तव्य में
प्रवृत्त करने के लिए शरीर और आत्मा की पृथकता का यतार्थ ज्ञान कराया गया
है समाज और संसार में शरीर की रक्षा सुरक्षा पुष्टि इत्यादि के लिए अनेक
साधन निर्मित किये जाते हैं किन्तु प्राणिमात्र के लिए निर्मित इन सभी
साधनों का न्याय युक्त उपयोग हो इसके लिए जीवन तो आत्मदृष्टि से ही जिन
पड़ता है सभी शरीरों में अजर अमर एक ही आत्मा का वास है जब यह बोध हो जाता
है तब कर्म में निष्पक्छता अपने आप आ जाती है कर्तव्य पालन के लिए
निष्पक्छता होना आवश्यक है आत्मा की सर्व व्यापकता के बोध ने ही भारत भूमि
में उद्घोष हुआ था कि सभी प्राणी सुखी हों सभी प्राणी रोग मुक्त हों सभी
प्राणी शुभ दर्शन करे और किसी को भी कभी भी दुःख की प्राप्ति ना हो
आज के लिए बस इतना ही.
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