व्योहारिक ज्ञान ----------(१)ज्ञानियों ,(शब्द ज्ञानियों नहीं अनुभवी तत्तवग ज्ञानियों )योगियों ,शाश्त्रयागों तथा मन को बस में करने वालों पर आसक्ति का प्रभाव उसीप्रकार नहीं पड़ता जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता है !
(२)जो व्यक्ति राग और द्वेष के बशीभूत होता है ! उसको काम अपनी और आकृष्ट कर लेता है ! फिर उसके मन में काम भोग की इक्छा जाग उठती है तत्पश्चात तृष्णा बढ़ने लगाती है ! तृष्णा सबसे बड़ी पापिन है और पाप कर्मों में प्रबृत्त कराने वाली है ! तृष्णा के द्वारा प्रायः सभी अधर्म और पाप कर्म होते हैं ! वह अत्यंत भयंकर पाप बंधन में डालने वाली है !
(३)खोटी बुद्धि वाले मनुष्यों के लिए जिसे त्यागना अत्यंत कठिन है !जो शरीर के जरा जीर्ण हो जाने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती है ! तथा जिसे प्राण नाशक रोग बताया गया है ! उस तृष्णा को जो त्याग देता है उसी को सुख मिलता है !
(४)यह तृष्णा यद्द्पि मनुष्य के शरीर के भीतर ही रहती है ! तो भी इसका कहीं आदि अंत नहीं है ! लोहे के पिंड की अग्नि के सामान यह तृष्णा प्राणियों का विनाश कर देती है !
(२)जो व्यक्ति राग और द्वेष के बशीभूत होता है ! उसको काम अपनी और आकृष्ट कर लेता है ! फिर उसके मन में काम भोग की इक्छा जाग उठती है तत्पश्चात तृष्णा बढ़ने लगाती है ! तृष्णा सबसे बड़ी पापिन है और पाप कर्मों में प्रबृत्त कराने वाली है ! तृष्णा के द्वारा प्रायः सभी अधर्म और पाप कर्म होते हैं ! वह अत्यंत भयंकर पाप बंधन में डालने वाली है !
(३)खोटी बुद्धि वाले मनुष्यों के लिए जिसे त्यागना अत्यंत कठिन है !जो शरीर के जरा जीर्ण हो जाने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती है ! तथा जिसे प्राण नाशक रोग बताया गया है ! उस तृष्णा को जो त्याग देता है उसी को सुख मिलता है !
(४)यह तृष्णा यद्द्पि मनुष्य के शरीर के भीतर ही रहती है ! तो भी इसका कहीं आदि अंत नहीं है ! लोहे के पिंड की अग्नि के सामान यह तृष्णा प्राणियों का विनाश कर देती है !
No comments:
Post a Comment