Friday, 24 July 2015

आजकल देश और समाज में कर्मशंकर लोगों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ रही है !कर्मशंकर वे व्यक्ति होते हैं जो अपने कर्त्तव्य का पालन तो करते नहीं हैं !किन्तु अन्य कर्त्तव्य छेत्रों में व्याप्त गलतियों की चर्चा और आलोचना मै मशगूल रहते हैं ! प्राचीन भारत में जिन शव्दों का प्रयोग जिस व्यक्ति के लिये किया जाता था वह कर्मछेत्र में वैसा ही होता था !शव्दों का अवमूल्यन नहीं हुआ था! !कर्मशंकरता भी समाज में नहीं थी !इसलिए शब्द यथार्थ बोध कराते थे !जैसे ५००० बर्ष पहले कुलपति उसको कहा जाता था जो विद्वान ब्राह्मण अकेला ही १००००हजार जिज्ञासु व्यक्तियों का अन्न दानादि के द्वारा भरण पोषण कर उनकी जिज्ञासा की शांति ज्ञान और शिक्छण प्रदान कर करता था !और स्वयं उच्चकोटि का ज्ञानी और संपूर्ण भौतिक कामनाओ से बिरक्त होता था !उसके द्वारा दिया गया ज्ञान उसके स्वाध्याय के साथ उसके जीवन के अनुभव से जुड़ा और निकला हुआ होता था !इसीलिए बो समाज में भी और विद्यार्थियों में भी आदर और प्रतिष्ठा का पात्र होता था !तथा समाज में सदाचारी ज्ञानियो का बाहुल्य था !किन्तु वर्तमान समय में कुलपति शव्द में कर्मशंकरता का प्रवेश होने से इस शव्द का अवमूल्यन हो गया है !कुलपति वर्तमान समय में अधिकांश में राज्य का राज्यपाल होता है !जो केंद्रीय सरकार द्वारा उसी दल का कोई अवकाश प्राप्त राजनेता होता है !या फिर सत्ता धारी दल की पसंद का कोई तिकड़मी अवकाश प्राप्त अधिकारी होता है !फिर इसी कुलपति के द्वारा विश्विद्यालयों में उप कुलपति नियुक्त किये जाते हैं !जो कभी कभी पूर्व मंत्री या अवकाश प्राप्त प्रशाशनिक अधिकारी या फिर ऐसे डिग्री धारी विश्व विद्यालयों के प्रोफेसर्स  होते हैं ! जिनका घनिष्ठ सम्बन्ध सत्ता धारी नेताओं से या राज्यपाल से होते हैं ! इसलिए इस कर्मशंकरता के कारण शिक्छा में सदाचार और ज्ञान लुप्त हो जाता है !नैतिकता कुलपति और उपकुलपति के शव्दों में होती है ! किन्तु आचरण में अवसरवादिता और धनकमाने की प्रवृत्ति होती है !परिणाम  स्वरुप विश्विद्यालय ज्ञान के केंद्र ना होकर चांसलर और उपकुलपति  प्रोफेस्सोर्स कर्मचारियों आदि के भोग के केंद्र बन गए हैं !जहाँ से राजनेताओं, फिल्म अभिनेताओं ओर अवसरवादियों को मानद उपाधियाँ दी जाती हैं ! फर्जी डिग्री भी प्राप्त हो जाती हैं !और ये सभी न तो विद्यार्थियों के आदर के पात्र होते हैं !न विद्यार्थियों को इनसे सदाचरण की प्राप्ति होती है !और इन विश्वविद्यालयों से फर्जी और असली डिग्री प्राप्त युवक जब कर्त्तव्य छेत्र में उत्तरदायित्त्व ग्रहण करते हैं !तब इनमे से  अधिकाँश  युवक जिस पद पर आसीन होते हैं !इनमे भी कर्त्तव्य निष्ठा नहीं होती है !नैतिकता और सदाचार सिर्फ इनकी जबान पर होता है !किन्तु इनके आचरण में बेईमानी घूसखोरी ,आलास, प्रमाद आदि का बाहुल्य होता है !समाज में इस कर्मशंकरता के कारण प्रमाणिकता का नाश हो गया है !इसको बदलने की आवश्यकता है ! बदलाव बेईमानी से लाभ प्राप्त करने वाले समाज बिगाडक लोग नहीं करेंगे !बदलाव की व्यार की शुरुआत तो वहां से शुरू होगी जो ज्ञानी के साथ साथ सदाचारी भी होंगे !जैसे प्राचीन भारत में थे !और जिनके पदनाम के साथ उनकी आचरण निष्ठा की भी अभिव्यक्ति होती थी !

No comments:

Post a Comment